सपा समर्थकों की हालत 'इश्क में धोखा खाए आशिकों जैसी

'लखनऊ। लोकसभा चुनाव के परिणाम के बाद समाजवादी पार्टी के समर्थकों की हालत 'इश्क में धोखा खाए आशिकों जैसी' हो गयी है। चुनाव से पहले समर्थक जिस गर्मजोशी से 'अखिलेश भईया पर जवानी कुर्बान' कहते नहीं थकते थे, वही परिणाम के बाद मानों गम के रसातल में जा डूबे हैं। 'भईया' पर तो अपनी जवानी कुर्बान कर दिए लेकिन इस कुर्बानी को अखिलेश संभाल नहीं पाए। समर्थकों की कुर्बानी बर्बाद हो गई। ऐसे में गली-चौराहा, नुक्कड़ से लेकर सोशल मीडिया पर इनकी खामोशी को महसूस किया जा सकता है। वह अपने दर्द को किसी से साझा करने की भी हिम्मत नहीं जुटा पा रहे हैं। महागठबंधन के बैनर तले बसपा के साथ सपा का आना और चुनाव में बुरी हार को देखा जाए तो इन पर बत्ती गुल मीटर चालू फिल्म का एक गीत सटीक बैठ रहा है कि ''क्या से क्या हो गए देखते देखते।''

मशहूर शायर जिगर मुरादाबादी का एक शेर है कि ''ये इश्क़ नहीं आसाँ इतना ही समझ लीजे, इक आग का दरिया है और डूब के जाना है।'' हालांकि शायर आश्वस्त नहीं है कि इश्क के इस दरिया में डूब के जाने के बाद कुछ हासिल होगा भी या नहीं। ठीक ऐसा ही हाल रहा अबकी लोकसभा चुनाव में सपा-बसपा गठबंधन का। यह गठबंधन भी एक दरिया था। जिसमें सपा व बसपा को डूबकर पार जाना था। लेकिन जा नहीं पाए। मायावती का पीएम बनने का सपना एकबार फिर चूर-चूर हो गया। वहीं, अखिलेश यादव के मनमुताबिक भी कुछ हो नहीं पाया। वह नरेन्द्र मोदी के इतर न जाने किसे पीएम बनाने का सपना संजोए थे।

नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा की एनडीए सरकार दोबारा 30 मई को गठित हो जाएगी। मोदी के हिन्दुत्व, राष्ट्रवाद, विकासवाद के आगे सभी दल धराशायी हो गये। 'मांगे मौत नहीं मिलती' जैसी सभी का हाल हो गया है। होना लाजमी भी है। सपा-बसपा गठबंधन से महापरिवर्तन का दावा करने वाले सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव मोदी की सुनामी में कहीं दूर बहकर टिक गए गये हैं। वह मात्र अपनी (आजमगढ़) और अपने पिता पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव (मैनपुरी) की ही लाज जैसे-तैसे बचा पाए हैं। जबकि कन्नौज से चुनावी मैदान में उतरी उनकी पत्नी डिम्पल यादव, बंदायू से धमेन्द्र यादव और फिरोजाबाद से अक्षय कुमार हार गये हैं। मुलायम परिवार के इन तीन महारथियों को शिकस्त मिलने से समर्थकों में काफी मायूसी है। खास तौर से कथित भाभी डिम्पल व भईया धमेन्द्र यादव की हार से। वैसे तो पूरी सपा का प्रदर्शन खराब है, लेकिन आम चर्चा तो यही है कि कम से कम अपना परिवार तो बचा लिए होते।

ऐसे में पार्टी के खिलाफ चल रही चर्चाओं से निपटने की शक्ति सपा समर्थकों में दिख नहीं रही है। सोशल मीडिया से तो ऐसे गायब हैं, जैसे गदहा के कान में मधुमक्खी डाल देने पर गदहा सरपट यहां-वहां भागने लगता है। सोशल मीडिया पर अखिलेश यादव की भी सक्रियता खास नहीं है। 24 मई के बाद उन्होंने कल यानी 27 मई को एक ट्वीट किया। जबकि इससे पहले भाजपा को घेरने के लिए अखिलेश दिनभर में दो-चार पोस्ट साझा कर देते थे। अखिलेश की खामोशी भी समर्थकों के लिए चिंता का सबब है।

आजमगढ़ से अखिलेश के खिलाफ मैदान में उतरे भाजपा उम्मीदवार मशहूर अभिनेता दिनेश लाल यादव निरहुआ का दावा है ​कि सपा को करारी हार उनके वजह से मिली है। ​वह अखिलेश को आजमगगढ़ में उलझाकर बाकी के सीटों से उनका ध्यान हटाने में कामयाब हो गये हैं। वहीं, सपा समर्थक निरहुआ के भाजपा से चुनाव लड़ने को लेकर भी काफी हतोत्साहित हैं, उनका तर्क है कि सपा यादवों के हित के लिए है और निरहुआ को यहीं रहना चाहिए। लेकिन भाजपा के बहकावे में आकर निरहुआ ने धोखा दे दिया। निरहुआ को भाजपा में जाना भी इनके लिए परेशानी का सबब है।

बलिया निवासी सपा के कट्टर समर्थक विष्णु यादव अखिलेश को आईना दिखाते हुए सोशल मीडिया पर लिखते हैं कि ''मोदी से लाख विरोधाभास है, लेकिन प्रधानमंत्री रहते बिजी शेड्यूल में भी अपनी पार्टी को बढ़ाने के लिए जितनी मेहनत करते हैं, जितना समय देते हैं, क्या अखिलेश और मायावती खाली समय रहते पार्टी के लिए इतना मेहनत करते हैं? बंगले में रहकर मोदी का मुकाबला कैसे करोगे? बात कड़वी है, मगर सच है।''

विष्णु आगे लिखते हैं कि ''बीजेपी ने अपने हर नेता को काम पर लगाया। वह प्रदेश भर में घूम-घूमकर लोगों के बीच बने रहे। लेकिन स्वयं अखिलेश यादव मुख्यमंत्री पद से हटने के बाद कितने जिले में कार्यकर्ताओं और लोगों के बीच गये? चुनाव में रैली करके मंच से भाषण देकर चले जाने से न कार्यकर्ता मजबूत होता है और न मतदाता। सामाजिक न्याय फार्चुनर से आयेगा भाषण देगा और चला जायेगा, इससे कुछ नहीं होगा। अब हमको मोदी भक्त न बोल देना।''


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