चार बार के निर्दलीय सांसद बनर्जी ने जमानत जब्त होने पर छोड़ दिया था कानपुर

चार बार के निर्दलीय सांसद बनर्जी ने जमानत जब्त होने पर छोड़ दिया था कानपुर


- माकपा की सुभाषिनी अली 1989 में अंतिम बार श्रमिक नेता के रूप में जीती थीं

कानपुर। क्रिकेट को तो अनिश्चितताओं का खेल कहा ही जाता है पर राजनीति भी उससे कम नहीं है। इसका उदाहरण कानपुर के लगातार चार बार निर्दलीय सासंद रहे एसएम बनर्जी हैं। कानपुर की जनता ने बनर्जी को लगातार चार बार सिर आंखों पर बैठाया लेकिन पांचवें चुनाव में ऐसा नीचे उतारा कि उनकी जमानत ही जब्त हो गई। ऐसी बुरी हार से आहत होकर बनर्जी कानपुर छोड़ अपने गृह राज्य पश्चिम बंगाल चले गये। इसके बावजूद वह अपनी हार को नहीं भुला पाये और बीमारी के चलते 10 साल में इस दुनिया से भी अलविदा हो गये।

पश्चिम बंगाल के रहने वाले एसएम बनर्जी कानपुर में नौकरी करने आये थे। श्रमिकों का लगातार ख्याल रखने के चलते श्रमिक उन्हें अपना नेता मानने लगे। इसी बीच देश की पहली लोकसभा के लिए 1952 में जब कानपुर सीट पर मतदान हुआ तो उन्होंने श्रमिकों की अगुवाई की और श्रमिक नेता व कांग्रेस के उम्मीदवार हरिहरनाथ शास्त्री का समर्थन किया। इस चुनाव में हरिहरनाथ शास्त्री की जीत हुई लेकिन हवाई दुर्घटना में उनकी मौत के बाद उप चुनाव हुए। इस चुनाव में श्रमिक नेता और कांग्रेस के उम्मीदवार शिवनारायण टंडन 1953 में सांसद चुने गये। हिंदी को लेकर उनकी सरकार से पटरी नहीं खाई और उन्होंने इस्तीफा दे दिया। टंडन के इस्तीफे के बाद 1954 में राजाराम शास्त्री सांसद बने।

जेल जाने से गई थी नौकरी

मजदूर नेता आशीष पाण्डेय बताते हैं कि एसएम बनर्जी श्रमिकों के साथ सदैव खड़े रहते थे और धीरे-धीरे श्रमिक बहुल औद्योगिक नगरी कानपुर के शीर्ष श्रमिक नेताओं में शुमार होने लगे थे। 1955 में हुई लगातार 80 दिन की कपड़ा मजदूरों की हड़ताल में सक्रिय भाग लेकर वह जेल भी जा चुके थे। इस कारण जहां वह नौकरी करते थे, वहां से उन्हें निकाल दिया गया। इसके बावजूद वह डिगे नहीं और मजदूर आंदोलनों में सक्रिय रहे। उनकी भूमिका शहरवासियों के बीच बहुत सराही गयी और वह गैर मजदूर वर्ग में भी लोकप्रिय हो गये। ऐसे में जब वह लोकसभा चुनाव लड़ने उतरे तो उन्हें न केवल श्रमिकों और उनकी यूनियनों बल्कि कम्युनिस्ट पार्टी और प्रजा सोशलिस्ट पार्टी जैसे राजनीतिक दलों ने भी समर्थन दे दिया था।

दूसरी लोकसभा के लिए जब 1957 में चुनाव हुए तब तक एसएम बनर्जी की पहचान कानपुर ही नहीं भारत में श्रमिक क्षेत्र के जाने-माने ट्रेड यूनियन नेता के रूप में हो चुकी थी। इसी वजह से श्रमिक यूनियनों ने उन्हें निर्दलीय चुनाव लड़ाने के लिए तैयार कर लिया। उनकी लोकप्रियता को देखते हुए कम्युनिस्ट पार्टी और प्रजा सोशलिस्ट पार्टी का भी समर्थन प्राप्त हो गया। इसके बाद उन्होंने 1957 का लोकसभा चुनाव निर्दलीय के रूप में लड़ा। चुनाव में श्रमिक बहुल शहर कानपुर से श्रमिक नेता एसएम बनर्जी भारी बहुमत से जीते और दूसरी लोकसभा में कानपुर का प्रतिनिधित्व किया।

इसके बाद 1962 और 1967 में हुए लोकसभा चुनावों में भी बनर्जी निर्दलीय ही मैदान में उतरे और कांग्रेस सहित अन्य सभी दलों को धूल चटाते हुए जीत कर संसद पहुंचे। वर्ष 1971 के चुनाव में कम्युनिस्ट व कांग्रेस के बीच राजनीतिक रिश्ते बने तो कांग्रेस ने भी बनर्जी के सामने अपना उम्मीदवार नहीं उतारा। इस बार भी कम्युनिस्ट पार्टी और प्रजा सोशलिस्ट पार्टी ने बनर्जी का समर्थन किया। इस चुनाव में भी बनर्जी ने भारतीय जनसंघ के उम्मीदवार को भारी अंतर से पराजित किया और चौथी बार संसद पहुंचे।

वर्ष 1975 में देश में इमरजेंसी लगने के कारण छठी लोकसभा का चुनाव निर्धारित पांच वर्ष के बजाय एक वर्ष देर से यानी 1976 के स्थान पर 1977 में हुआ। उस समय पूरे देश में कांग्रेस विरोधी लहर थी। उधर, कानपुर के श्रमिक वर्ग के साथ-साथ अन्य वर्ग में भी बनर्जी के खिलाफ नाराजगी पनप चुकी थी। कांग्रेस के विरोध में एक हुए विरोधी दलों ने मिल कर भारतीय लोकदल के मनोहर लाल को मैदान में उतारा। बनर्जी भी पांचवी बार संसद जाने के लिए मैदान में उतरे लेकिन अब तक देश का राजनीतिक दृश्य बदल चुका था। कानपुर के लोगों के अंदर इमरजेंसी को लेकर पैदा हुआ गुस्सा मनोहर लाल को मिले वोटों के रूप में फूटा और मनोहर लाल भारी मतों से विजयी घोषित हुए। पांचवी बार बनर्जी न केवल चुनाव हार गये बल्कि मात्र 5,035 वोट पाकर जमानत भी गवां बैठे। इस हार से बनर्जी इस कदर आहत हुए कि कुछ समय बाद उन्होंने कानपुर ही छोड़ने का फैसला ले लिया और अपने गृह जनपद कोलकाता में जा बसे। इसके बावजूद उन्हें अपनी हार का सदमा सताता रहा और दस साल बाद 1987 में इस दुनिया से भी अलविदा हो गये।

बनर्जी के बाद श्रमिक नेताओं में सुभाषिनी बनी सांसद

1980 में कांग्रेस ने वापसी कर ली। कांग्रेस के आरिफ मोहम्मद खान सांसद बनने में कामयाब रहे। इसके बाद 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद उपजी सहानुभूति में भी यह सीट कांग्रेस के खाते में गयी और नरेश चन्द्र चतुर्वेदी सांसद चुने गये। इस दौरान श्रमिक नेताओं की राजनीति कमजोर होती गयी। इसके बाद 1989 में आजाद हिन्द फौज की कैप्टन लक्ष्मी सहगल की बेटी सुभाषिनी अली श्रमिक नेता के रूप में मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) से चुनाव मैदान में उतरीं तो एक बार फिर श्रमिक नेता सक्रिय हो गये और सुभाषिनी अली को संसद पहुंचाने में कामयाब हो गये। इसके बाद से तो कानपुर में श्रमिक नेताओं की राजनीति पूरी तरह से धीरे-धीरे खत्म होने लगी। इसके पीछे 1991 का राम मंदिर आंदोलन था और भाजपा को जगतवीर सिंह द्रोण ने पहली जीत दिलाई थी। 1991 से लेकर 17 वीं लोकसभा चुनाव तक कानपुर नगर सीट में भाजपा बनाम कांग्रेस का चुनाव देखने को मिल रहा है।

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