पूर्वांचल में प्रियंका की बोट यात्रा और नरम हिंदुत्व की कड़ी अग्नि परीक्षा

पूर्वांचल में प्रियंका की बोट यात्रा और नरम हिंदुत्व की कड़ी अग्नि परीक्षा


भदोही। पूर्वांचल की सियासी जमीन से गायब हो चुकी कांग्रेस क्या फिर लौट पाएगी। पूर्वी उत्तर प्रदेश की कमान संभालने वाली नेहरु गांधी परिवार का करिश्माई चेहरा प्रियंका गांधी वाड्रा क्या अपनी रणनीति में कामयाब होंगी। वाराणसी को पावर पालिटिक्स का सेंटर बनाकर क्या वह प्रधानमंत्री मोदी से दो-दो हाथ कर पाएंगी। पिछले दिनों उनकी बोट यात्रा सियासी गलियारों और मीडिया में सुर्खियां बनी थी लेकिन अब कांग्रेस और प्रियंका के नरम हिंदुत्व और बोट यात्रा की कड़ी अग्नि परीक्षा है।

कांग्रेस प्रियंका वाड्रा को पूर्वी उत्तर प्रदेश की कमान देकर नई जमीन तलाशने में लगी है। उन्होंने प्रयागराज से वाराणसी तक गंगा में बोट यात्रा की और मंदिर-मंदिर मत्था टेककर भाजपा के उग्र हिंदुत्व का रणनीतिक जबाब भी दिया था। उन्होंने बोट यात्रा के जरिए गंगा, गांव, किसान, बुनकर, दलित और शोषित समाज के बीच पहुंच कर उनकी जमीनी हकीकत पहचानने की कोशिश की थी। बोट यात्रा के दौरान उन्होंने छात्रों से बात भी की थी। गंगा घाट पर चुनावी सभा के बाद पवित्र धार्मिक स्थल सीमामढ़ी में मां सीता और हमुमान लला के दर्शन-पूजन कर भाजपा को संदेश देने का भी काम किया था। रात्रि में यहां विश्राम भी किया था। बाद में मिर्जापुर की यात्रा के दौरान गोपीगंज में रोड शो भी किया।

अब सवाल उठता है कि प्रियंका गांधी वाड्रा की यह यात्रा पूर्वांचल में खास तौर पर प्रयागराज, भदोही, मिर्जापुर और वाराणसी की सियास को साधने में कितनी कामयाब होगी। मिर्जापुर में उन्होंने मां विंध्यवासिनी दरबार में पहुंच माथा भी टेका था। वह हिन्दुओं के साथ मुस्लिम मतों को साधने के लिए मजार और मस्जिद भी गईं थीं। मिर्जापुर मंडल में उनका मुकाबला भाजपा-अपना दल गठबंधन से है।

प्रियंका प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सामने वाराणसी से चुनाव मैदान में उतरकर मुस्लिम, दलित और ओबीसी मतों की एक जुटता से मुश्किल पैदा कर सकती हैं। मिर्जापुर की सियासी जमीन से कांग्रेस 1984 से गायब है। यहां से कांग्रेस के अंतिम सांसद पंडित उमाकांत मिश्र हुए लेकिन इसके बाद कांग्रेस फिर यहां वापसी नहीं कर पायी। प्रयागराज में भी कांग्रेस के लिए कड़ी चुनौती है लेकिन उनकी गंगा और बोट यात्रा के साथ नरम हिंदुत्व को भुनाने का यह वक्त है। भदोही में कांग्रेस 37 सालों से वनवास में हैं।

भदोही पहले मिर्जापुर-भदोही संयुक्त संसदीय क्षेत्र था। बसपा सुप्रीमो मायावती और सपा मुखिया अखिलेश यादव कांग्रेस पर चुनावी सभाओं में सीधा वार कर रहे हैं, फिर पूर्वांचल में उसकी जंग कैसे आसान होगी? भदोही में कांग्रेस ने आजमगढ़ के बाहुबली रमाकांत यादव को मैदान में उतारा है। वह आजमगढ़ में चार बार सांसद और विधायक रह चुके हैं। उनके एक बयान से ब्राह्मण तिलमिलाए हैं। कांग्रेस का कैडर बेस वोट भाजपा और बसपा की झोली में हैं। संगठन की हालत पतली है फिर प्रियंका गांधी की पूर्वांचल साधने की रणनीति कैसे कामयाब होगी।

हालांकि रामाकांत यादव दलित, ओबीसी और अल्पसंख्यकों को साधने की जमीन तैयार करने में जुटे हैं। यादवों पर उनका खासा असर पड़ रहा है जिसकी वजह से सात मई को पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव और पूर्व सीएम मायावती एक साथ भदोही में चुनावी सभा करने वाले हैं। कांग्रेस अगर बोट यात्रा से जुड़े संसदीय क्षेत्र में अगर कुछ करिश्मा दिखा पाती है तो इसे प्रियंका की राजनीतिक जीत माना जाएगा।


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