लोक सभा चुनाव: फर्रुखाबाद में नया गुल खिला सकती है जोड़ तोड़ की राजनीति..कांग्रेस और प्रसपा के बीच बन सकते हैं सियासी समीकरण

लोक सभा चुनाव: फर्रुखाबाद में नया गुल खिला सकती है जोड़ तोड़ की राजनीति..कांग्रेस और प्रसपा के बीच बन सकते हैं सियासी समीकरण




फर्रुखाबाद। फर्रुखाबाद संसदीय क्षेत्र की सीट पर कब्जा करने के लिए सभी दलों ने जोड़ तोड़ और काट छांट की राजनीति शुरु कर दी है। लोक सभा चुनाव में नये चेहरे के रुप में सपा-बसपा गठ बन्धन के प्रत्याशी मनोज अग्रवाल का चुनाव लड़ना तय माना जा रहा है।

इस गठबंधन की गांठ को कमजोर करने के लिए प्रगतिशील समाजवादी पार्टी (प्रसपा) के राष्ट्रीय अध्यक्ष शिवपाल सिंह यादव चुनावी समर में प्रमुख भूमिका निभाने जा रहे हैं। राजनीति के गलियारों में चर्चा है कि इस सीट से दो बार सांसद रह चुके कांग्रेस के सलमान खुर्शीद और प्रगतिशील के राष्ट्रीय अध्यक्ष शिवपाल यादव का मिलन जिले की राज नीति में नया गुल खिला सकता है।

आजादी के बाद से वर्ष 2014 में हुए लोक सभा चुनाव के नतीजों पर यदि नजर डाली जाए तो इस सीट पर सर्वाधिक राज कांग्रेस ने किया है। वर्ष 1952 में हुए चुनाव में पीएसपी के भारत सिंह को हराकर कांग्रेस के मूलचंद दुबे ने विजय दर्ज कराई थी। 1957 और 1962 के लोक सभा चुनाव में भी कांग्रेस के मूलचन्द्र दुबे लगातार विजयी हुए। 1962 में ही यहां हुए मध्यावधि चुनाव में सोशलिष्ट पार्टी से डॉक्टर राममनोहर लोहिया ने अपनी जीत दर्ज कराई।

1967 के आम चुनाव में कांग्रेस के अवधेश चंद्र सिंह राठौर ने फिर इस सीट पर कब्जा कर लिया। 1971 में हुए चुनाव में दूसरी बार अवधेश चंद्र सिंह सांसद चुने गए। 1977 में इस सीट पर हुए चुनाव में जनतापार्टी के दयाराम शाक्य ने कांग्रेस के अवधेश चंद्र सिंह को हरा कर कब्जा कर लिया। 1980 में हुए चुनाव में जनता पार्टी के दयाराम शाक्य ने पुनः जीत दर्ज कराई। 1984 में हुए चुनाव में कांग्रेस के खुर्शीद आलम ने जनता पार्टी के दयाराम शाक्य को हरा कर फिर कांग्रेस की पताका फहरा दी। 1989 में जनता दल के सन्तोष भारती ने कांग्रेस को हरा कर कब्जा कर लिया।

1991 में हुए चुनाव में कांग्रेस के सलमान खुर्शीद ने अपने पिता खुर्शीद आलम की हार का बदला लिया और फिर कांग्रेस से जीत दर्ज कराई। 1996 में हुए चुनाव भाजपा के सच्चिदानन्द हरि साक्षी ने कांग्रेस से यह सीट छीन कर केशरिया ध्वज पहरा दिया।

वर्ष 1998 में हुए मध्यावधि चुनाव में सपा प्रत्याशी रविंद्र प्रताप सिंह को हरा कर भाजपा के सच्चिदानन्द हरि साक्षी ने फिर जीत दर्ज कराई। इस चुनाव में साक्षी के सामने सिर मुड़ाते ओले गिरे वाली कहावत चरितार्थ हो गई। नतीजतन 1999 में फिर लोक सभा चुनाव हुए।इस चुनाव में भाजपा के प्रत्याशी सच्चिदानन्द हरि साक्षी को करारी हार का मुंह देखना पड़ा। नजीजतन यह सीट सपा के खाते में चली गई। सपा प्रत्याशी चंद्रभूषण सिंह को विजयी घोषित किया गया।

वर्ष 2004 में हुए चुनाव सपा के चंद्रभूषण सिंह उर्फ मुन्नू बाबू ने फिर जीत दर्ज कराई। वर्ष 2009 में हुए चुनाव में कांग्रेस के सलमान खुर्शीद ने जीत दर्ज कराई। 2014 में हुए चुनाव में भाजपा के मुकेश राजपूत ने सपा के रामेश्वर सिंह यादव को हराकर इस सीट पर कब्जा कर लिया।

वर्ष 2019 में होने जा रहे लोक सभा चुनाव में कयास लगाए जा रहे हैं कि यदि प्रगतिशील समाजवादी पार्टी के मुखिया शिवपाल सिंह और कांग्रेस के बीच चुनावी गठबन्धन होता है। तो आने वाला चुनाव जिले की राजनीति में नया गुल खिला सकता है। फिलहाल सभी दलों के नेता इस समय जोड़-तोड़ और काट छांट की राजनीति में जुटे हुए हैं हर हाल में सीट अपने कब्जे में लेने के लिए यहां साम दाम और दंड भेद की सियाशत शुरु हो चुकी है।

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