मेरठ: 1902 में दिया था मेरठ ने देश को पहला शॉपिंग मॉल...मॉल को देखने दूर-दूर से आते थे लोग, आर्मी हेडक्वार्टर से अनुमति लेकर बनवाई गई थी शानदार बिल्डिंग, आज जर्जर

मेरठ। छोटे-बड़े शहरों में शॉपिंग मॉल संस्कृति तो अब आयी है, लेकिन देश में इसकी शुरुआत 11 मार्च 1902 से ही शुरू हो गई थी और वह भी मेरठ से। कैंट क्षेत्र के लालकुर्ती के घोसी मोहल्ले में यह शॉपिंग मॉल ब्रिटिश सैन्य अफसरों ने तैयार करवाया था।
इसका उद्देश्य यही था कि खाने-पीने का सामान एक ही छत के नीचे मिले और सरकार का रेवेन्यू भी बढ़े। इसमें सैनिकों के साथ-साथ सिविलियंस को भी खरीदारी की छूट दी गई थी। शॉपिंग मॉल में ज्यादा से ज्यादा लोग आएं, इसके लिए यहां का खाने का सामान कंट्रोल रेट पर उपलब्ध कराया जाता था। शहर व कैंट के अन्य बाजारों के मुकाबले यहां दूर-दूर से भी काफी लोग खरीदारी के लिए आते थे। आर्मी हेडक्वार्टर से अनुमति लेने के बाद यहां ब्रिगेड कमांड ऑफिस की ओर से इस शॉपिंग मॉल को नाम दिया गया मेरठ कैंटोनमेंट मार्केट, यह ब्रिटिश इंफ्रेंटी मार्केट (बीआई मार्केट) के नाम से भी मशहूर था। घोसी मोहल्ले में इस शॉपिंग मॉल की इमारत बड़ी खूबसूरत बनाई गई थी। मॉल की दीवारें रेड ब्रिक कल्प की दो फुट चौड़ी और छत ब्लैक स्टोन की थी। बाहर लॉन में हरी घास और पेड़-पौधे थे और इसकी चार दीवारी दस फुट की थी, ताकि खरीदारी वाले ही अंदर आ सकें, गैरजरूरी नहीं। इस शॉपिंग मॉल में छोटी-बड़ी 40 दुकानें बनाई गई थी। इसके लिए दुकानदारों को निश्चित धनराशि पर लाइसेंस दिया गया था। इसका उद्घाटन 11 मार्च 1902 को आगरा एवं अवध प्रोविंस के गवर्नर जेजे डिगेस लेटौचे ने किया था। इसमें सैन्य अफसर, कैंट बोर्ड के अफसर व कर्मचारी और अन्य गणमान्य लोग शामिल थे। इसमें उन दुकानदारों ने अपना काम शुरू किया, जिन्होंने अलग-अलग क्षेत्रों में दुकानें खोल रखी थी। लालकुर्ती के मदरसा इस्लामिया की दुकानें भी इसमें शिफ्ट हुई थी।
ब्रिटिश सैन्य अफसरों ने इस मॉल को तैयार करवाने से पहले ही निर्देश दे दिए थे कि इस मॉल में जो सामान बेचा जाएगा, कैंट में कहीं भी उसकी बिक्री नहीं होगी। इसलिए इस मॉल में सुबह से लेकर शाम तक खरीदारों की काफी भीड़ रहती थी। यहां कंट्रोल रेट पर सब्जी, फल, दूध, दही, ब्रेड, मक्खन, मछली, मुर्गा, मीट, अंडा व अन्य खाद्य पदार्थ बेचे जाते थे। इस मॉल के खुलने से सरकार का रेवेन्यू भी काफी बढ़ गया था।
देश में ब्रिटिश राज खत्म होने के बाद भी यह मॉल खूब चला, लेकिन फिर इसके बाद स्थिति बदलती चली गई। मेंटीनेंस का अभाव और ज्यादा मुनाफा कमाने के फेर में यहां से दुकानदार जाने लगे। फिर यहां अवैध कब्जे शुरू हो गए। बाहरी दीवार टूट गई, लोगों ने कैंपस में पहुंचना शुरू कर दिया। कैंट बोर्ड यहां आज भी उन दुकानदारों की पीढिय़ों से किराया वसूल रहा है। मॉल की छत भी टूट-फूट गई है, लेकिन रिपेयर नहीं करवाई गई। कैंट बोर्ड के कार्यालय अधीक्षक एमए जफर का कहना है कि शॉपिंग मॉल में ही खाने की वस्तुओं की व्यवस्था थी। कैंट में अन्य जगह बिक्री प्रतिबंधित कर दी गई थी। बोर्ड के पूर्व मेंबर अजमल कमाल का कहना है कि इस शॉपिंग मॉल की जो स्थिति है, बोर्ड किराया तो ले रहा है, लेकिन मेंटीनेंस नहीं कर रहा।

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