मेरठ: पुराने साथियों से रालोद को मजबूत करने की कवायद...जाट-मुस्लिम ताने-बाने को फिर से एक साथ जोडऩे की कोशिश

मेरठ: पुराने साथियों से रालोद को मजबूत करने की कवायद...जाट-मुस्लिम ताने-बाने को फिर से एक साथ जोडऩे की कोशिश

मेरठ। मुजफ्फरनगर हिंसा के बाद से टूटे जाट-मुस्लिम ताने-बाने की वजह से बेहद कमजोर हो गई राष्ट्रीय लोकदल में अजित सिंह और जयंत चौधरी जान फूंकने की कोशिश में है। 2019 में खुद की नैया पार लगाने के लिए पुराने साथियों को संग लाने की कवायद जारी है। मुजफ्फरनगर के पूर्व सांसद अमीर आलम और उनके पुत्र पूर्व एमएलए नवाजिश आलम को शामिल करके यही संदेश देने की कोशिश की गई।
मुजफ्फरनगर हिंसा के बाद आरएलडी का बेस कहे जाने वाले जाट-मुस्लिम में पड़ी दरार का सीधा असर पार्टी पर पड़ा था। 2013 में हुए दंगे के बाद 2014 में लोकसभा चुनाव में पिता अजित सिंह और पुत्र जयंत चौधरी को हार का मुंह देखना पड़ा। 2017 के विधानसभा चुनाव में भी पार्टी का सिर्फ एक एमएलए ही जीत सका था और उनके करीबी भी पार्टी से अलग हो गए थे। दरअसल, अजित और जयंत पहले अपने घर वेस्ट यूपी को मजबूत करना चाहते हैं। जयंत चौधरी भले ही एक बार मथुरा से एमपी रहे हों, लेकिन उनका मन मुजफ्फरनगर सीट में अटका हुआ है। मुजफ्फरनगर हिंसा से पहले उन्होंने इस सीट पर खुद की जीत की संभावना तलाशकर बिसात बिछानी शुरू कर दी थी। उस वक्त मुश्ताक अहमद को एमएमली बनाकर भी जिले में जाट मुस्लिम गठजोड़ को मजबूत करने की ही कोशिश थी, लेकिन सब गड़बड़ हो गया।
अब अजित सिंह नए सिरे से पुराने समीकरण को बनाने में जुट गए हैं। 1985 में लोकदल से टिकट पर एमएलए बनकर राजनीति शुरू करने वाले अमीर आलम 1989 और 1996 मे भी एमएलए रहे और 1999 में लोकदल के टिकट पर ही सांसद भी बने। एसपी में जाने के बाद 2006 में वह राज्यसभा के लिए चुने गए। एसपी से उनके बेटे नवाजिश आलम 2012 में बुढ़ाना से एमएलए बने। मुजफ्फरनगर हिंसा के बाद एसपी में अलग-थलग कर दिए गए अमीर आलम बाद में बीएसपी में चले गए। कुछ दिन पहले ही पिता-पुत्र ने बीएसपी को छोड़ दिया था। अब चौधरी अजित सिंह के साथ पुरानी पार्टी रालोद में शामिल हो गए। रालोद इसी तरह अन्य नेताओं को भी पार्टी में शामिल कर अपना पुराना इतिहास लौटाने का प्रयास लगातार कर रहा है |

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