मलेहटा गांव है फौजियों का गढ़, अभी भी 40 से ज्यादा लोग कर रहे देश की पहरेदारी

मलेहटा गांव है फौजियों का गढ़, अभी भी 40 से ज्यादा लोग कर रहे देश की पहरेदारी


-अकेले मलेहटा गांव से ही तीन सौ लोगों ने देश की सुरक्षा में बिताया पूरा जीवन

-भारत-चीन युद्ध में इस गांव के दो जांबाज हुये थे शहीद, फिर भी नहीं मिला सम्मान

-शहीदों के परिवार ने उपेक्षा के कारण छोड़ा गांव, पैतृक गांव और मकान भी सन्नाटे में


हमीरपुर। उत्तर प्रदेश के हमीरपुर जिले में एक ऐसा गांव है जहां के चालीस से ज्यादा लोग अभी भी भारतीय सैनिक सीमा पर देश की पहरेदारी कर रहे हैं। यहां के दो सैनिक भारत-चीन युद्ध में शहीद भी हो चुके हैं। शहीद ज्ञान पाल सिंह राजपूत की रविवार को पुण्यतिथि है लेकिन उनके पैतृक गांव में सन्नाटा पसरा है। शहीद के पारिवारिक लोगों को सरकार से शिकायत है कि देश की सुरक्षा के लिये सैकड़ों जवान देने वाले गांव में किसी भी शहीद की याद में स्मारक या अन्य शिलालेख की पट्टी तक नहीं लगवाई जा सकी। भारत-चीन युद्ध में देश के खातिर प्राण न्योछावर करने वाले दो शहीदों को अब तक शहीद का दर्जा नहीं मिला। शहीदों का यह गांव आज भी बदहाली के दौर से जूझ रहा है।

जिले के राठ क्षेत्र का मलेहटा गांव सैनिकों का गढ़ माना जाता है क्योंकि इसी गांव से करीब चार सौ लोगों ने फौज की सेवा में अपना सारा जीवन गुजारा है। तीन हजार की आबादी वाले इस गांव के रहने वाले प्रकाश सिंह सेकेण्ड राजपूत रेजीमेंट में सिपाही थे। वह वर्ष 1962 में भारत-चीन युद्ध के दौरान चीनी सैनिकों से मोर्चा लेते हुये नेफा में घायल हो गए और 21 अक्टूबर 1962 को शहीद हो गए थे। इनके पिता शिवपाल सिंह ने भी भारतीय सेना में रहकर वर्मा के साथ युद्ध में अहम भूमिका अदा की थी।

मलेहटा गांव के रहने वाले फौज से रिटायर्ड रणवीर सिंह ने रविवार को बताया कि शहीद प्रकाश सिंह के चाचा मंगली सिंह भी भारतीय सेना में तोपखाना शाखा में कार्यरत थे। उनके भाई हरी सिंह ने भी 16 राजपूत रेजीमेंट में नौकरी कर वर्ष 1965 व 1971 में युद्ध के दौरान दुश्मनों से मोर्चा लिया था। इसी परिवार के फौजी केशव सिंह व धीरज सिंह ने भी भारतीय सेना में नौकरी की। उनका परिवार निरंतर तीन पीढ़ियों से भारतीय फौज में रहकर हमीरपुर जनपद का गौरव बढ़ा रहा है। राठ के सिकन्दरपुरा व मलेहटा गांव निवासी लांस नायक रामनिवास सिंह व हवलदार हरी सिंह ने वीरता की अद्भुत मिसाल कायम की है। राजपूत रेजीमेंट के लांसनायक रामनिवास सिंह ने वर्ष 1962 के युद्ध में अपनी दोनों टांगें गंवाई हैं।

मलेहटा के हवलदार हरी सिंह भी वर्ष 1971 में आपरेशन कैक्टस लिली में शामिल होकर वीरता से मोर्चा लेते हुये विकलांग हो गये थे। गांव के ग्राम प्रधान प्रतिनिधि काजू ने बताया कि इस गांव की आबादी 3100 है लेकिन विकास के नये आयाम तक यह गांव अभी तक नहीं पहुंचा है। इस गांव से लगभग तीन सौ लोगों ने फौज की नौकरी की और अभी भी चालीस से ज्यादा गांव के लोग भारतीय सैनिक सेवा में नौकरी कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि इस गांव में शहीदों के सम्मान के लिये काफी दिनों से एक इण्टर कालेज की स्थापना कराये जाने की मांग की जा रही है।

शहीद के गांव बदहाली के भंवर में फंसा

रिटायर्ड फौजी रणवीर सिंह ने बताया कि मलेहटा गांव के तीन सौ लोगों ने देश की सुरक्षा में जीवन बिताया लेकिन रिटायर होने के बाद उनके सम्मान में आज तक गांव में न तो स्मारक बनवाया जा सका और न ही एक इण्टर कालेज की स्थापना करायी जा सकी। भारत-चीन युद्ध में शहीद हुये दोनों सैनिकों के परिवार सरकारी मदद और सम्मान से उपेक्षित हैं। गांव की गलियों और मुहल्लों का भी बुरा हाल है।

शहीद के परिजनों ने छोड़ा गांव, घर सन्नाटे में

भारतीय सैनिक सेवा से रिटायर होने के बाद रणवीर सिंह मलेहटा गांव में रह रहे हैं। ये शहीद ज्ञान पाल सिंह के सगे भतीजे हैं। इनका सगा भाई विजय सिंह भी भारतीय सेना से रिटायर हो चुका है। उन्होंने बताया कि शहीद ज्ञान पाल सिंह के पारिवारिक नाती हर्ष प्रकाश सिंह गांव में रहते हैं। इनके दो पुत्रियां श्यामा व सुरजा कानपुर में रहती हैं। दोनों की शादी हो चुकी है। शहीद की पत्नी शिवदेवी बेटियों के साथ हंसपुरम कानपुर में रहती है। उनका पैतृक घर वीरान पड़ा है।

द्वितीय विश्वयुद्ध के 105 सैनिकों के परिवार को मिल रही पेंशन

सैनिक एवं पुनर्वास विभाग से मिली जानकारी के मुताबिक द्वितीय विश्वयुद्ध में भाग लेने वाले हमीरपुर जिले के 105 पूर्व सैनिकों, उनके आश्रितों को पेंशन मिल रही है। जिले के नौ सौ से ज्यादा पूर्व सैनिकों के अलावा सैकड़ों सैनिकों के आश्रित भी पेंशन पा रहे हैं। सैनिकों के लिये हमीरपुर कलेक्ट्रेट में 1944 में सैनिक परिषद की स्थापना हुई थी। शहीद के भतीजे रणवीर सिंह ने बताया कि भारत-चीन युद्ध में शहीद ज्ञान पाल सिंह की पत्नी शिवदेवी को विभाग से पेंशन मिल रही है।


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