कैराना उपचुनाव के सहारे वापसी की जमीन तैयार करने में जुटा रालोद

कैराना उपचुनाव के सहारे वापसी की जमीन तैयार करने में जुटा रालोद

बागपत। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में प्रभावशाली राष्ट्रीय लोकदल (रालोद) कैराना लोकसभा उपचुनाव के जरिये अपनी खोई जमीन वापस पाने के लिये कमर कस चुका है। रालोद को पश्चिमी क्षेत्र में बेहद प्रभावशाली माना जाता रहा है। सरकार चाहे जो भी रही हो मगर हर दल ने इसकी जरूरत महसूस की है। पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह के बेटे चौधरी अजित सिंह रालोद के संस्थापक और अध्यक्ष हैं। 2002 में बसपा की सरकार में रालोद के दो विधायकों को मंत्रिमंडल में शामिल किया गया था। मगर यह सरकार ज्यादा लंबी दूरी तय नहीं कर सकी। इसके बाद 2003 में समाजवादी पार्टी सत्ता में आई और 2007 तक चली। इस सरकार में भी रालोद को विशेष स्थान दिया गया। पार्टी के 6 विधायकों को मंत्री पद से नवाजा गया।
इस दौरान रालोद ने 2004 के लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी के साथ मिलकर चुनाव लड़ा। रालोद को उसके परंपरागत वाले क्षेत्रों से चुनाव लड़ाया गया जिसमें रालोद ने तीन सीटों पर जीत दर्ज की मगर इसके बाद के विधानसभा चुनाव में रालोद अपनी सीटों में कोई खास इजाफा नहीं कर सका।
हालांकि, वोट बैंक उसका पहले से मजबूत हुआ। रालोद की स्थिति को देखते हुए 2009 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने उससे गठबंधन किया। इस गठबंधन में रालोद ने लोकसभा चुनाव में पांच सीटों पर जीत दर्ज की। 12 दिसंबर 2011 को रालोद संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) में शामिल हो गई।
2014 में लोकसभा चुनाव में एक बड़ा बदलाव देखने को मिला। रालोद ने एक व्यवस्था के तहत सप्रंग के साथ उत्तर प्रदेश की आठ सीटों पर लोकसभा चुनाव लड़ा मगर इस बार उसे किसी भी सीट पर जीत नहीं मिली। छह बार लोकसभा सदस्य रहे चौधरी अजीत सिंह को बागपत लोकसभा सीट से भाजपा के डॉक्टर सतपाल सिंह के हाथों हार झेलनी पड़ी। वहीं उनके बेटे जयंत चौधरी भी मथुरा लोकसभा सीट से चुनाव हार गए। 2017 का विधानसभा चुनाव बदलाव के संकेत दे रहा था। मगर इस बार भी रालोद कोई चमत्कार नहीं कर सका।
पूरे पश्चिमी उत्तर प्रदेश में रालोद केवल एक ही सीट पर जीत हासिल कर सका था, जो फिलहाल वह भी रालोद के हाथ से फिसल गई। रालोद की पुश्तैनी सीट छपरोली से रालोद के टिकट पर चुनाव जीतकर आए सहेंद्र सिंह रमाला भी रालोद को अलविदा कहकर भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो गए। इसी के साथ विधानसभा और लोकसभा में रालोद का प्रतिनिधित्व शून्य पर पहुंच गया।
हाल ही में कैराना उपचुनाव में कांग्रेस सपा रालोद व बसपा मिलकर महागठबंधन के सहारे अपनी नैया पार लगाने की जुगत में लगे हैं। कैराना से रालोद प्रत्याशी बेगम तबस्सुम हसन को जिताने के लिए चारों राजनीतिक पार्टियां एक साथ मिलकर जी तोड़ मेहनत कर रही है। वही रालोद भी अपनी खोई हुई जमीन को तलाशने के लिए युवाओं को रिझाने का काम कर रहा है।
युवा रालोद के जिलाध्यक्ष परमेन्द्र तोमर का कहना है तबस्सुम बेगम महागठबंधन की प्रत्याशी है। उनकी क्षेत्र में बेहतर पकड़ होने के साथ ही अच्छी छवि के चलते जीत निश्चित है। उन्होंने कहा कि तबस्सुम बेगम के चुनाव में महागठबंधन का हर कार्यकर्ता मन से लगा हुआ है। हालांकि यह तो परिणाम ही बताएगा कि जीत किसकी होगी। अगर सफलता मिली और सब कुछ ठीक-ठाक रहा तो कैराना उपचुनाव 2019 में होने वाले लोकसभा चुनावों की पश्चिम में हवा को तय करने का काम करेगा।

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