रावण के नाम पर बागपत में बसा है एक 'गांव'

रावण के नाम पर बागपत में बसा है एक गांव

बागपत। लंकापति दशानन रावण एक ऐसा चरित्र है, जिससे भारतीय जनमानस भली-भांति परिचित है। हर साल दशहरा पर रामलीला के बाद रावण के पुतले का दहन किया जाता है, लेकिन वेस्ट यूपी में भी ऐसे कई स्थान है, जहां पर रावण के पुतले का दहन नहीं किया जाता। बागपत जनपद में तो रावण के नाम पर एक गांव 'रावण उर्फ बड़ागांव' भी बसा हुआ है। यहां भी रावण का पुतला नहीं फूंका जाता।
पश्चिमी उत्तर प्रदेश के गौतमबुद्ध नगर जनपद के बिसरख में लंकेश्वर रावण की जन्मस्थली मानी जाती है। रावण के पिता महर्षि विश्रवा मुनि का यहां पर आश्रम था और लंकापति का जन्म यहीं पर हुआ। इस गांव में रावण का एक मंदिर मौजूद है और दशहरे पर उसके पुतले का दहन नहीं किया जाता। एमएम काॅलेज मोदीनगर के इतिहास विभागाध्यक्ष एवं इतिहासकार डाॅ. कृष्णकांत शर्मा का कहना है कि बिसरख में रावण का मंदिर आज भी मौजूद है। इसी तरह से बागपत जनपद की खेकड़ा तहसील में लंकापति के नाम पर एक गांव भी बसा हुआ है।
किवदंती है कि रावण ने इस गांव में मंशा देवी मंदिर की स्थापना की थी, जो आज भी मौजूद है। इस मंदिर में गुप्तकाल की भगवान विष्णु की दशावतार की मूर्ति विराजमान है। इस गांव का नाम सरकारी अभिलेखों में 'रावण उर्फ बड़ागांव' दर्ज है। रावण गांव में लंकापति के पुतले का दहन नहीं किया जाता।रावण से जुड़े कई स्थलइतिहासकार डाॅ. विघ्नेश त्यागी का कहना है कि वेस्ट यूपी में रावण से जुड़े कई स्थल मौजूद हैं। मेरठ को रावण की ससुराल बताया जाता है। प्राचीन काल में मेरठ का नाम मयराष्ट्र था। यहां पर रावण के ससुर मय दानव की राजधानी थी। रावण की पत्नी मंदोदरी अपने महल से चलकर सदर बाजार स्थित बिल्वेश्वर महादेव मंदिर में पूजा करने के लिए जाती थी।
यह प्राचीन मंदिर आज भी मौजूद है। इसी तरह से मंदोदरी सूरजकुंड स्थित एक मंदिर में भी पूजा करती थी। इससे साफ होता है कि रावण का मेरठ में भी आना-जाना रहा है। गाजियाबाद स्थित दूधेश्वर महादेव मंदिर में बाल्यकाल में रावण अपने पिता विश्रवा मुनि के साथ पूजा करने के लिए आता था। गौरतलब है कि रावण भगवान महादेव का अनन्य भक्त था और उसने शिव स्तोत्र की भी रचना की थी।

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