रावण ने दिया था राम को 'लंका विजय का आशीष

रावण ने दिया था राम को

प्रयागराज,। लंकाधिपति रावण ने अयोध्यापति श्रीराम का धुर विरोधी होने के बावजूद ब्राह्मण आचार्य पद का सम्मान रखते हुए 'लंका विजय यज्ञ का आर्शीवाद दिया था। जब श्रीराम वानरों की सेना लेकर लंका पर चढाई करने के लिए रामेश्वरम समुद्र तट पर पहुंचे। 'लंका विजय यज्ञ के लिए देवताओं के गुरु बृहस्पति को बुलावाने भेजा गया, मगर उन्होंने आने में अपनी असमर्थता व्यक्त की तब विजय यज्ञ पूर्ण कराने के लिए जामवंत को रावण के पास आचार्यत्व का निमंत्रण देने के लिए लंका भेजा गया। स्वयं रावण को उन्हें राजद्वार पर अभिवादन का उपक्रम करते देख जामवन्त ने मुस्कराते हुए कहा था 'मैं अभिनंदन का पात्र नहीं हूँ। मैं वनवासी राम का दूत बनकर आया हूँ। उन्होंने तुम्हें सादर प्रणाम कहा है। रावण ने सविनय कहा कि आप हमारे पितामह के भाई हैं। इस नाते आप हमारे पूज्य हैं। आप आसन ग्रहण करें। शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के उत्तराधिकारी शिष्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने बताया कि बाल्मीकि रामायण और तुलसीकृत रामायण में इस कथा का वर्णन नहीं है, पर तमिल भाषा में लिखी महर्षि कम्बन की 'इरामावतारम रामायण में इस कथा का उल्लेख मिलता है। इसके अलावा कम्ब रामायण और बंगाल में प्रचलित कृत्तिवास रामायण में भी इसका वर्णन मिलता है। कम्ब रामायण तमिल साहित्य की सर्वोत्कृष्ट कृति एवं एक बृहत ग्रंथ है। उन्होंने तमिल भाषा में लिखी रामाण के आधार पर कहा कि जामवन्त ने आसन ग्रहण कर रावण से कहा कि वनवासी राम ने सागर-सेतु निर्माण उपरांत अब यथाशीघ्र महेश्व-लिंग-विग्रह की स्थापना करना चाहते हैं। इस अनुष्ठान को सम्पन्न कराने के लिए उन्होने ब्राह्मण, वेदज्ञ और शैव रावण को आचर्य पद पर वरण करने की इच्छा प्रकट की है। मैं उनकी ओर से आपको आमंत्रित करने आया हूँ। प्रणाम प्रतिक्रिया, अभिव्यक्ति उपरान्त रावण ने मुस्कान भरे स्वर में पूछ ही लिया कि क्या राम द्वारा महेश्व-लिंग-विग्रह स्थापना लंका-विजय की कामना से किया जा रहा है। सीता से कहा कि राम लंका विजय की कामना समुद्रतट पर महेश्वर लिंग विग्रह की स्थापना करने जा रहे हैं और रावण को आचार्य वरण किया है। यजमान का अनुष्ठान पूर्ण हो यह दायित्व आचार्य का भी होता है। तुम्हें ज्ञात है कि अद्र्धांगिनी के बिना गृहस्थ के सभी अनुष्ठान अपूर्ण रहते हैं। विमान आ रहा है, उस पर बैठ जाना। जानकी जी ने दोनों हाथ जोड़कर मस्तक झुका दिया। स्वस्थ कण्ठ से सौभाग्यवती भव कहते रावण ने दोनों हाथ उठाकर भरपूर आशीर्वाद दिया। सीता और अन्य आवश्यक उपकरण सहित रावण आकाश मार्ग से समुद्र तट पर उतरा। आदेश मिलने पर आना कहकर सीता को उसने विमान में ही छोड़ा और स्वयं राम के सम्मुख पहुँचा। वनवासी श्रीराम सम्मुख होते ही आचार्य दशग्रीव को हाथ जोड़कर प्रणाम किया। दीर्घायु भव, लंका विजयी भव। दशग्रीव के इस आशीर्वचन के शब्द ने सबको चौंका दिया। उसने कहा यह आर्शीवाद आचार्य ब्राह्मण रावण ने अपने यजमान वनवासी राम को दिया न कि लंकाधिकपति राजा रावण ने अपने धुर विरोधी अयोध्यापति श्रीराम को दिया है। रामायण में प्रसंग है कि भूमि शोधन के उपरान्त रावणाचार्य ने कहा कि यजमान, अद्र्धांगिनी कहाँ है, उन्हें यथास्थान आसन दें। श्रीराम ने मस्तक झुकाते हुए हाथ जोड़कर अत्यन्त विनम्र स्वर से प्रार्थना की कि यदि यजमान असमर्थ हो तो योग्याचार्य सर्वोत्कृष्ट विकल्प के अभाव में अन्य समकक्ष विकल्प से भी तो अनुष्ठान सम्पादन कर सकते हैं। आचार्य आवश्यक साधन, उपकरण अनुष्ठान उपरान्त वापस ले जाते हैं। स्वीकार हो तो किसी को भेज दो, सागर सन्निकट पुष्पक विमान में यजमान पत्नी विराजमान हैं।

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