विलुप्त हो रही दुर्लभ प्रजाति की गंगा की गाय मानी जाने वाली डाँल्फिन मछली की गणना का महत्त्वपूर्ण अभियान हुआ आरम्भ

विलुप्त हो रही दुर्लभ प्रजाति की गंगा की गाय मानी जाने वाली डाँल्फिन मछली की गणना का महत्त्वपूर्ण अभियान हुआ आरम्भ


सहारनपुर (गौरव सिंघल)। विलुप्त हो रही दुर्लभ प्रजाति की गंगा की गाय मानी जाने वाली डाँल्फिन मछलियों की इस वर्ष की गणना का काम शुरू कर दिया गया है। सहारनपुर परिक्षेत्र के वन संरक्षक वीरेंद्र कुमार जैन ने आज बताया कि डाँल्फिन की इस वर्ष की गणना का काम ''मेरी गंगा डाॅल्फिन अभियान'' विश्व प्रकृति निधि और केंद्रीय एवं उत्तर प्रदेश, वन विभाग के संयुक्त तत्वावधान में एचएसबीसी के सहयोग से शुरू किया गया है।

वीरेंद्र जैन ने आछ बताया कि 10 अक्टूबर की शाम को शुरू हुआ अभियान 15 अक्टूबर को समाप्त होगा। इस अभियान के तहत बिजनौर गंगा बैराज से नरोरा तक के 224.8 किलोमीटर के गंगा नदी के क्षेत्र में डाँल्फिन की गिनती होगी। उन्होने बताया कि इस क्षेत्र में पिछले वर्ष तक कुल 36 डाँल्फिन पायी गयी थी। वर्ष 2015 में इस क्षेत्र में उनकी संख्या 22 थी और वर्ष 2016 में बढ़कर 30 हो गयी थी। उनके मुताबिक संख्या बढ़ने से साफ संकेत मिलते है कि डाँल्फिन के रहने के लिये गंगा का यह क्षेत्र पूरी तरह से उपयुक्त है। उम्मीद है इस बार उनकी संख्या में और वृद्धि होगी।

वीरेंद्र जैन ने बताया कि अभियान की शुरूआत के मौके पर मुख्य वन संरक्षक, मेरठ क्षेत्र ललित वर्मा, बिजनौर वन प्रभाग के प्रभागीय निदेशक एम सिम्भरण, मुजफ्फरनगर वन प्रभाग के प्रभागीय निदेशक सूरज और वह स्वयं उपस्थित रहें। उन्होंने बताया कि गणना अभियान दल में डाँल्फिन विशेषज्ञ संजीव यादव, शाहनवाज और उनके साथी शामिल है। संजीव यादव ने बताया कि पिछले 24 घंटे के दौरान 10 डाँल्फिन की गिनती हुई है।

वन संरक्षक सहारनपुर क्षेत्र, सहारनपुर वीरेंद्र कुमार जैन ने बताया कि गांगेय डाँल्फिन मनुष्य की तरह स्तनधारी जीव है जो भारत में गंगा नदी के गहरे जल में पायी जाती है। इसकी उमर 30 से 32 वर्ष तक होती है और 10 वर्ष की उमर में यह बच्चे देना शुरू करती है और एक वर्ष में एक बच्चे को जन्म देती है। यह नदी की सतह पर आकर श्वास लेती है और उसके श्वास की आवाज ''सूँस-सूँस की तरह होती है और इसलिये इसे सुसु के नाम से भी जानते है। भारत में उनकी संख्या अब केवल 3000 है पानी की उपलब्धता घटने और प्रदूषित होने से उनके जल में विचरण करने का क्षेत्र सिकुड़ता जा रहा है। वर्तमान में गांगेय डाँल्फिन भारत, नेपाल, बंगलादेश के गंगा-ब्रहमपुत्र-मेघना एवं करनाफुल्ली नदी तंत्रों में पायी जाती है। संयोग से इसका 80 प्रतिशत वितरण क्षेत्र भारत की सीमा में आता है। गंगा नदी के पास रहने वाले लोग गंागेय डाँल्फिन को माँ गंगा की गाय मानकर श्रद्धा रखते है। भारत में इससे संरक्षण देने के लिये भारतीय वन्य जीव (संरक्षण) अधिनियम 1972 के तहत कानूनी संरक्षण के साथ-साथ राष्ट्रीय जलीय जीव का दर्जा भी प्राप्त है। यह हमारे राष्ट्र की धरोहर है और उसका संरक्षण करना हमारा कत्र्तव्य है।

वीरेंद्र जैन बताया कि ऐसी मान्यता है कि गंगा के पृथ्वी के उतरने के अवसर पर भगवान शिव ने सूँस की आवाज करने वाली इस मछली की उत्पत्ति की थी और वह तभी से गंगा में नित्य सहचर के रूप में देखी जाती है। 2200 वर्ष पूर्व सम्राट अशोक महान ने डाँल्फिन के महत्त्व को देखते हुए उसके संरक्षण हेतु उसके शिकार पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया था। उस समय डाँल्फिन को पुपुतकास के नाम से जाना जाता था। यह अपनी तरह का विश्व का पहला वन्य जीव संरक्षण है।

वी के जैन के मुताबिक उत्तर प्रदेश में डाँल्फिन आवास संरक्षण की पहल करते हुए विश्व प्रकृति निधि और केंद्रीय एवं राज्य वन विभाग के संयुक्त प्रयासों से वर्ष 2005 में गढ़मुक्तेश्वर से नरोरा बैराज के बीच 100 किलोमीटर लम्बी गंगा नदी में की थी। 5 अक्टूबर 2009 को केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय गंगा नदी बेसिन प्राधिकरण की पहली बैठक में गंागेय डाँल्फिन को भारत का राष्ट्रीय जलीय जीव घोषित किया गया और 10 मई 2010 को पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने इसकी अधिसूचना जारी की थी।

Share it
Top