म.प्र : चंडी माता की पूजा के साथ शुरू हुआ गोटमार मेला, पत्थरबाजी में अब तक सौ लोग घायल

म.प्र : चंडी माता की पूजा के साथ शुरू हुआ गोटमार मेला, पत्थरबाजी में अब तक सौ लोग घायल


छिंदवाड़ा। जिले के पाढुंर्णा में परम्परागत गोटमार मेला शनिवार को चंडी माता की पूजा और झंडा गाड़ने के साथ शुरू हो गया। इस दौरान यहां का नजारा देखने लायक था। कुछ उपद्रवियों पर काबू करने के लिए पुलिस ने सख्ती की है, लेकिन प्रशासन की सख्ती से आम जनता गुस्साई हुई है। लगातार गली-मोहल्लों में पुलिस की गश्त जारी है। इसके बावजूद पत्थरबाजी के लिए बिछाए गए पत्थरों से पांढुर्णा और सावरगांव के लोग आमने-सामने से एक-दूसरे पर पत्थर बरसा रहे हैं। गोफन पर प्रतिबंध इस बार भी जारी है। इस पत्थरबाजी में अब तक 100 से अधिक लोग घायल हुए हैं।

पोला त्यौहार के दूसरे दिन मनाया जाता है विश्व विख्यात गोटमार मेला

मध्यप्रदेश के छिन्दवाड़ा जिला मुख्यालय से लगभग 100 किलोमीटर दूरी पर पांढुर्णा नगर में सैकड़ों वर्षों से चली आ रही परंपरा के अनुसार पोला त्यौहार के दूसरे दिन विश्व विख्यात गोटमार मेला मनाया जाता है। इस अद्भुत गोटमार मेले के बारे में कोई इतिहास संबंधी विवरण तो उपलब्ध नहीं है, लेकिन मराठी भाषा बोलने वाले नागरिकों की इस क्षेत्र में बहुलता है और मराठी भाषा में गोटमार का अर्थ पत्थर मारना होता है। इसीलिए इस मेले में दो गांवों के बीच पत्थरबाजी होती है। इसमें हजारों लोग सूर्योदय से सूर्यास्त तक विपक्षी योद्धाओं पर पत्थर रूपी शस्त्रों की बौछार कर बड़ी शान से एक-दूसरे का लहू बहाते हैं। इस एक दिवसीय अघोषित युद्ध में प्रति वर्ष अनगिनत लोग घायल हो जाते हैं तो कई अपने प्राणों से भी हाथ धो बैठते हैं।

इस मेले को घातक बताकर कई लोगों ने इसे बंद करने की कोशिशें भी की, लेकिन जगत जननी मां चंडिका के भक्तों द्वारा इस मेले को बंद कराने में कई बाधाओं के आने पर भी अनवरत परंपरागत ढंग से इसे संपन्न कराने की परिपाटी चली आ रही है। प्रति वर्षानुसार इस वर्ष भी विश्व प्रसिद्ध अनोखा गोटमार मेला शनिवार को बड़े उत्साह के साथ शुरू हुआ। पांढुर्णा नगर के लोगों ने पलाश का वृक्ष जंगल से लाकर पूजा-अर्चना करने के पश्चात शनिवार को प्रातः चार बजे दोनों पक्षों की सहमति से जाम नदी के बीच झंडा गाड़ा गया। इसके बाद पत्थरबाजी शुरू हुई। पत्थरों का युद्ध दोपहर दो बजे से शाम पांच बजे तक पूरे शबाब पर होता है। इस दौरान सैकड़ों की संख्या में लोग घायल होते हैं। ऐसी मान्यता है कि मां चंडिका के मंदिर की भभूत लगाने पर चोट तत्काल ठीक हो जाती है। शाम छह बजे तक शांति समिति और पुलिस प्रशासन के हस्तक्षेप से खेल को रोका जाता है । खेल को रोकते समय पुलिस के जवान भी घायल होते है। पलाश वृक्ष के झंडे को मां के चरणों में अर्पित करते हैं और इसी के साथ गोटमार मेला समाप्त हो जाता है। पुलिस ने भी सुरक्षा की कड़ी व्यवस्था की है। मौके पर भारी संख्या में पुलिस बल तैनात है।

मेले को लेकर कई कई किवदंतियां हैं प्रचलित

मेले के संबंध में कई किवदंतियां प्रचलित हैं। एक मान्यता के अनुसार अति प्राचीनकाल में पांढुर्णा नगर का एक युवक पड़ोसी ग्राम सावरगांव की एक युवती पर मोहित हो गया, लेकिन इन दोनों के प्रेम-प्रसंग को विवाह बंधन में बदलने के लिए कन्या पक्ष के लोग राजी नहीं हुए। युवक ने अपनी प्रेमिका को अपना जीवन साथी बनाने के लिए सावरगांव से भगाकर पांढुर्णा लाने का प्रयत्न किया। लेकिन रास्ते में स्थित जाम नदी को पार करते समय जब बात सावरगांव वालों को मालूम हुई तो उन्होंने इसे अपनी प्रतिष्ठा पर आघात समझ कर लड़के पर पत्थरों की बौछार कर दी। जैसे ही वर पक्ष वालों को यह खबर हुई तो उन्होंने भी लड़के के बचाव के लिए पत्थरों की बौछार शुरू कर दी। पांढुर्णा पक्ष एवं सावरगांव पक्ष के बीच इस पत्थरों की बौछारों से इन दोनों प्रेमियों की मृत्यु जाम नदी के बीच ही हो गई। सावरगांव एवं पांढुर्णा के लोग जगत जननी मां चंडिका के परम भक्त थे, इसी कारण दोनों प्रेमियों की मृत्यु के पश्चात दोनों पक्षों के लोगों ने अपनी शर्मिंदगी मानकर इन दोनों प्रेमियों के शवों को उठाकर किले पर मां चंडिका के दरबार में ले जाकर रखा और पूजा-अर्चना करने के बाद दोनों का अंतिम संस्कार कर दिया गया। संभवतः इसी घटना की याद में मां चंडिका की पूजा-अर्चना कर गोटमार मेला मनाए की परम्परा चली आ रही है।


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