प्रणब मुखर्जी को संघ ने बुलाया और वह सिर उठाकर वहां गए और सिर ऊंचा कर वहां से लौटे, यही महत्वपूर्ण है

प्रणब मुखर्जी को संघ ने बुलाया और वह सिर उठाकर वहां गए और सिर ऊंचा कर वहां से लौटे, यही महत्वपूर्ण है

(सहारनपुर) सुरेंद्र सिंघल/गौरव सिंघल। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ प्रमुख डा. मोहन भागवत ने देश की शीर्ष शख्सियतों में से एक प्रणब मुखर्जी को नागपुर में संघ के कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में बुलाकर देश में एक नई बहस छेड़ दी है। मीडिया में बहस का मुद्दा यह है कि प्रणब दा ने वहां क्या कहा और क्या नहीं कहा। जबकि इसका कोई महत्व नहीं है।
महत्वपूर्ण यह है कि आदर और श्रद्धा के साथ डा. भागवत ने पूर्व राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी को अपने कार्यक्रम में बुलाया और उसी मान-सम्मान के साथ मुखर्जी वहां गए। उनकी संघ में उपस्थिति ही अपने आप में बहुत कुछ कहती है।
1925 में डा. हेडगेवार द्वारा स्थापित राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ समय-समय पर ऐसे कदम उठाता आया है जिससे देशभर में उस पर नए सिरे से लोग विचार करें और उन सबका ध्यान इस संस्था की ओर आकर्षित हो। संघ राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के उनके बीच जाने को अपनी सबसे बड़ी उपलब्धियो में से एक के रूप में गिनता और मानता आया है। महात्मा गांधी 1934 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शिविर में गए थे, जहां उन्होंने आरएसएस के अनुशासन की सराहना की थी। यदि गांधी वहां जा सकते हैं तो फिर किसी ओर के लिए वहां जाना या ना जाना समीक्षा से परे की बात है।
नीलम संजीव रेड्डी राष्ट्रपति के पद पर रहते हुए भी संघ के कार्यक्रम में शामिल हुए थे। एक और राष्ट्रपति डा. एपीजे अब्दुल कलाम के भी संघ नेतृत्व के साथ मधुर संबंध थे। लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने भी अपनी सहमति संघ और उसकी विचारधारा के पक्ष में जता दी थी। जनसंघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष पं. दीनदयाल उपाध्याय ने बतौर राजनीतिज्ञ समाजवादी पुरोधा डा. राममनोहर लोहिया और गांधी जी के साथ लंबे अर्से तक काम कर चुके आचार्य जेबी कृपलानी के साथ घनिष्ठ संबंध रहे और उन्होंने साथ-साथ काम भी किया। इसलिए संघ कभी भी राष्ट्र की मुख्यधारा से अलग नहीं दिखा।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भारत के हिंदुओं का सबसे बड़ा सामाजिक और सांस्कृतिक संगठन है जो पहले भारतीय जनसंघ और बाद में 1980 में स्थापित भारतीय जनता पार्टी के मार्गदर्शक की भूमिका में रहा है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को लेकर उसके विरोधियों की सबसे बड़ी आपत्ति यह है कि वह असहिष्णु और संकीर्ण मानसिकता रखता है और उसकी कार्यशैली अन्य संगठनों से बिल्कुल अलग दिखाई देती है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के दुश्मनों ने उस पर सबसे बड़ा हमला उस पर यह आरोप चस्पा कर किया था कि 30 जनवरी 1948 को महात्मा गांधी की हत्या में कहीं न कहीं उसकी भूमिका थी। यह आरोप कभी साबित नहीं हुआ। लेकिन इससे इस संगठन को सबसे ज्यादा नुकसान और आरोप लगाने वालों को सबसे ज्यादा फायदा हुआ।
आरएसएस भाजपा का मातृ संगठन है। भाजपा के शीर्ष नेताओं अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी और यहां तक कि मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गैर भाजपाई राजनीतिक दलों के साथ मिलकर चुनाव लड़े और सरकारों में भागीदारी की। इसलिए आरएसएस को किसी भी दृष्टि से स्पृश्य मान लेना कानूनी, धार्मिक और नैतिक दृष्टि से उचित नहीं होगा।
यह अलग बात है कि आरएसएस पर दो बार प्रतिबंध लगे। एक बार महात्मा गांधी जी की हत्या के बाद और दूसरी बार 1975 में आपातकाल में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के जमाने में। पर संघ कभी नहीं सिकुड़ा। उसका विस्तार और स्वीकार्यता उत्तरोत्तर बढ़ती ही गई। 2014 के लोकसभा चुनाव में भारत राष्ट्रª की जनता ने संघ परिवार के महत्वपूर्ण सदस्य भारतीय जनता पार्टी को अभूतपूर्व समर्थन देकर साबित कर दिया कि भारत में राष्ट्रªीय स्वयंसेवक संघ संपूर्णता में स्वीकार्य है। उसके तमाम विरोधियों को संघ के बारे में अपना मूल्यांकन दोबारा करने की आवश्यकता है। ऐसे लोगों को महात्मा गांधी और हाल में प्रणब मुखर्जी जैसे देश के दिग्गज स्टेटसमैंनों से सबक लेना चाहिए।
मोहन भागवत और प्रणब मुखर्जी जी की मुलाकात को लेकर देश के मीडिया में गप-शप और अटकलों को खूब हवा दी जा रही है और इसे सियासत से जोड़कर देखा जा रहा हैं। जबकि इसमें कोई सच्चाई नहीं है। प्रणब दा सियासत में अपनी पारी खेलकर रिटायर हो चुके हैं। जो लोग यह सोचते हैं कि प्रणब मुखर्जी के मोहन भागवत से मिलने से कांग्रेस में फूट पड़ जाएगी या 2019 के लोकसभा चुनाव में किसी भी दल को बहुमत नहीं मिलने की स्थिति में मुखर्जी नरेंद्र मोदी के स्थान पर एनडीए की ओर से प्रधानमंत्री बन जाएंगे यह पूरी तरह से बेमतलब की बात है और तिल को ताड़ बनाने जैसा है।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की कार्य प्रणाली पूरी तरह से पारदर्शी है और वह भारत के हिंदुओं का संगठन है जो लोगाें राष्ट्र प्रेम की भावना को और सुदृढ़ करने का काम करता हैं। इसलिए वहां पर किसी भी सर्वोच्च व्यक्ति के जाने को एक सामान्य प्रक्रिया के हिस्से के रूप में ही देखा जाना चाहिए। ना कि इसे लेकर ऊल-जुलूल बातें की जाए।
प्रणब दा देश के बेहद परिपक्व एवं जाने-माने स्टेट्समैन हैं। उन्होंने ने संघ के कार्यक्रम में हिस्सा लेकर एक सामान्य शिष्टाचार का ही पालन किया है। प्रणब मुखर्जी ने वहां जाकर इतना संकेत जरूर दिया कि संघ भारत की मुख्य धारा का एक राष्ट्रवादी, सामाजिक एवं देश भक्त संगठन है जो 1925 में उसके संस्थापक डा. हेडगेवार जी की सोच को निरंतर आगे बढ़ाने में लगा हुआ है। आज इस संगठन की हैसियत विश्वव्यापी है और दुनिया के बड़े से बड़े लोग संघ प्रमुख मोहन भागवत से मिलने को आतुर रहते हैं। भारतीय राजनीति और शासन व्यवस्था में भी संघ की बात को नजरंदाज नहीं किया जा सकता है। इसलिए संघ को सभी को गंभीरता और गरिमा के साथ लिया जाना चाहिए।

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