कर्नाटक जनादेश गैर भाजपा दलों के लिए सबक

कर्नाटक जनादेश गैर भाजपा दलों के लिए सबक

बेंगलुरु । कर्नाटक विधानसभा चुनाव के आए जनादेश का राज्य के लाेगों तथा बाहर रहने वाले मतदाताओं ने न केवल स्वागत किया है बल्कि 2019 के आम चुनाव की तैयारी करने वाले गैर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) दलों के लिए सबक बताया है।
हरियाणा में काम करने वाले तथा चुनाव में मतदान करने बेंगलुरु आये बांकेर बिनु माइकल ने कहा," यह अच्छा जनादेश है। हम इसका सम्मान करते हैं। भाजपा के फिर से सत्ता में आने को लेकर ईसाई और मुसलमान भयभीत हो सकते हैं लेकिन बेंगलुरु तथा राज्य के अन्य हिस्सों में सक्रिय नागरिक समाज ऐसी चुनौतियों का सामना करने में सक्षम है।"
माइकल की तरह बेंगलुरु के कई अन्य निवासी ऐसे हैं जो राज्य के बाहर विभिन्न स्थानों पर काम करते हैं लेकिन चुनावी राजनीति में भाग लेने की प्रतिबद्धता के तहत उन्होंने गत 12 मई को हुए मतदान में भाग लिया।
आंध्र प्रदेश सरकार के सार्वजनिक उपक्रम के कर्मचारी शिबू हेगडे ने कहा," यह महत्वपूर्ण चुनाव था। लंबे अंतराल के बाद सभी लोग सिद्दारामैया के प्रदर्शन पर निगाहें गड़ाये हुये थे कि क्या वह फिर से सत्ता में लौट सकते हैं? इसलिए हम अपने शांतिनगर निर्वाचन क्षेत्र में मतदान करने आये और मैंने आप (आम आदमी पार्टी) उम्मीदवार को वोट दिया। इस सीट पर हालांकि कांग्रेस ने जीत दर्ज की।"
दिल्ली में काम करने वाली प्रीति शर्मा ने कहा," कर्नाटक के परिणामों से साफ है कि अब सभी धर्मनिरपेक्ष दलों को एकसाथ आगे आना चाहिए। कांग्रेस को यथार्थवादी होना चाहिए। कर्नाटक के परिणाम सभी भाजपा विरोधी पार्टियों को एकजुट करने में मदद करेंगे।"
सिकंदराबाद की एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में काम करने वाले कांग्रेस के एक समर्थक रॉबिन रेवाना ने कहा," कर्नाटक में सत्ता से बेदखल होने के बाद कांग्रेस की चुनौती दिन ब दिन बढ़ती जा रही है। पार्टी अब केवल पंजाब और मिजोरम में सिमट कर रह गयी है। राज्य में कांग्रेस की जीत महत्वपूर्ण थी क्योंकि इससे इसके कार्यकर्ताओं को राष्ट्रीय स्तर पर प्रोत्साहन मिलता।" वह हालांकि कहते हैं,"राहुल गांधी ने कर्नाटक में उत्साही लड़ाई का नेतृत्व किया।"
जनता दल (सेक्युलर) और कांग्रेस के बीच गठबंधन सरकार बनाये जाने के अटकलों के बीच बेंगलुरु रेलवे स्टेशन तथा वसंतनगर के आस-पास के इलाके के कुछ लोगों की राय थी कि इस प्रकार के प्रयासों का कोई भी नतीजा सामने नहीं आ पाएगा क्योंकि केंद्र में भाजपा सत्ता में है तथा राज्यपाल वजुभाई वाला निश्चित रुप से 'सबसे बड़ी पार्टी' को आमंत्रित करने की परंपरा का निर्वाह करेंगे।
केंद्र सरकार के विभाग के कर्मचारी और स्थानीय निवासी अविनाश धार ने कहा," जद(एस) भी इस बात से अवगत है कि भाजपा कांग्रेस-जद(से) गठबंधन को सत्ता में नहीं आने देना चाहेगा लेकिन असल इरादा 2019 में जद (से) को तीसरे मोर्चा की राजनीति में प्रासंगिक बनाये रखना है।"
कुछ अन्य लोगों ने भी इस बात पर सहमति व्यक्त की तथा याद किया कि वर्ष 1996 में पूर्व प्रधानमंत्री और जद (से) नेता एच डी देवेगौडा धर्मनिरपेक्ष राजनीति के 'चेहरे' के तौर पर उभरे। इसलिए इतिहास के दोहराये जाने की प्रबल संभावना की उम्मीद भी बंधी हुयी है। वैसे भी अगले वर्ष होने वाले आम चुनाव को लेकर क्षेत्रीय नेताओं ममता बनर्जी और के चंद्रशेखर राव के नेतृत्व में भाजपा के खिलाफ गैर राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन ताकतों को एकजुट करने के प्रयास जारी हैं।

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