...जब इंदिरा से नाराज सुरेन्द्र दत्त बाजपेई ने फाड़कर फेंक दिया था राज्यसभा का टिकट



-इन्दिरा से नाराज सुरेन्द्र दत्त बाजपेई को मनाने आये थे सूबे के मुख्यमंत्री गोविन्द बल्लभ पंत

-तत्कालीन मुख्यमंत्री गोविन्द बल्लभ पंत से मिला बंगला और करोड़ों की जमीन की थी दान


हमीरपुर। उत्तर प्रदेश के हमीरपुर लोकसभा क्षेत्र में आजादी के बाद सुरेन्द्र दत्त बाजपेई लगातार तीन बार विधानसभा चुनाव में शानदार वोटों से निर्वाचित हुये लेकिन उनकी तमन्ना सांसद बनने की अधूरी रह गयी। इसके बावजूद उनकी ईमानदारी पर देश की तत्कालीन प्रधानमंत्री स्व. इन्दिरा गांधी को भी नाज था। वह एक मामले में इन्दिरा गांधी से नाराज हो गये थे जिस पर उन्हें मनाने के लिये सूबे के मुख्यमंत्री गोविन्द बल्लभ पंत के हाथों राज्यसभा का टिकट भिजवाया गया था जिसे उन्होंने वहीं पर फाड़कर फेंक दिया था। वह जीवन भर इन्दिरा गांधी से नाराज रहे।

उन्नाव से आकर हमीरपुर जिले में बसे थे बाजपेई

सुरेन्द्र दत्त बाजपेई मूल रूप से उन्नाव जिले के दरौली गांव के रहने वाले थे। उनका जन्म 1912 में हुआ था। उनके पिता पं. बल्लभ प्रसाद बाजपेई प्राथमिक विद्यालय में हेडमास्टर थे। उनका 31 अगस्त 1979 में लखनऊ में निधन हो गया था। माता-पिता का सिर से साया उठने के बाद चचेरे भाई रामगोपाल बाजपेई ने सुरेन्द्र दत्त बाजपेई को खूब पढ़ाकर उन्हें ईमानदारी से जीवन जीना सिखाया था। रामगोपाल बाजपेई रिश्ते में चन्द्रशेखर आजाद के भांजे थे। इसी वजह से बचपन में ही सुरेन्द्र दत्त आजादी की जंग में कूद पड़े थे। अंग्रेजों से लोहा लेने पर उन्नाव के दरौली में उनका घर ढहाया गया तब रामगोपाल बाजपेई सुरेन्द्र दत्त को लेकर अपनी ससुराल हमीरपुर जिले की सुमेरपुर तहसील आ गये थे। उन्होंने सुमेरपुर में बसने के बाद भी अंग्रेजों से जंग जारी रखी। अंग्रेजों से जंग में यहां भी जूनियर हाईस्कूल के पास बना मकान अंग्रेजी फौज ने ढहा दिया था।

शीर्ष राजनीति में बाजपेई की थी अच्छी पैठ

सुरेन्द्र दत्त बाजपेई ने 1952 का विधानसभा चुनाव कांग्रेस से चुनाव लड़ा था जिसमें 8860 वोट पाकर शिवनाथ सिंह को हराया था। वर्ष 1957 में फिर कांग्रेस से विधानसभा चुनाव लड़कर उदित नारायण शर्मा को हराया। उन्हें 16863 वोट मिले थे। वर्ष 1962 के विधानसभा चुनाव में तीसरी बार विधायक बने जिसमें उन्हें 21226 वोट मिले थे। उनके सामने सोशलिस्ट पार्टी आगे नहीं बढ़ सकी। वर्ष 1967 के विधानसभा के चुनाव में सुरेन्द्र दत्त बाजपेई जनसंघ के उम्मीदवार बजरंग बली ब्रम्हचारी से चुनाव हारे थे। उन्हें 20274 वोट मिले थे।

गृहमंत्री देते थे सुरेन्द्र दत्त को 100 रुपये

परिजनों के मुताबिक सुरेन्द्र दत्त बाजपेई की सादगी से गोविन्द बल्लभ पंत प्रभावित हुये थे। 1947 से 1952 तक बाजपेई उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री गोविन्द बल्लभ पंत के पर्सनल सेक्रेटरी रहे थे। वह तत्कालीन प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री के मित्र भी थे। रूम पार्टनर होने के कारण सुरेन्द्र दत्त बाजपेई को देश के पहले गृहमंत्री सरदार बल्लभ भाई पटेल हर महीने सौ रुपये देते थे। लेकिन उनकी ईमानदारी भी देखिये कि यह रुपये, सुरेन्द्र दत्त बाजपेई तत्कालीन प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री की पत्नी ललिता शास्त्री को दे देते थे। देश के पहले प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री भी सुरेन्द्र दत्त के घर आये थे तब बरसात के कारण चारों ओर कीचड़ होने पर शास्त्री दुखी हुये थे।

जीवन भर इन्दिरा गांधी से रहे थे नाराज

सुरेन्द्र दत्त बाजपेई ने अपने पौत्र अवधेश के बीटीसी प्रशिक्षण के लिये स्वतंत्रता संग्राम सेनानी का आश्रित प्रमाण पत्र मांगने पर इंकार किया था। उन्होंने पौत्र को फटकारते हुये कहा था कि अपने बलबूते ही पढ़ाई कर आगे बढ़ो। उनकी यह बातें सुनकर परिवार वाले दुखी हुये थे। किसी बात पर सुरेन्द्र दत्त बाजपेई स्व. इन्दिरा गांधी से नाराज हो गये तो फिर जीवन पर्यन्त उन्हें माफ भी नहीं किया था। उन्हें मनाने के लिये 1969 में इन्दिरा गांधी ने गोविन्द बल्लभ पंत के हाथों राज्यसभा का टिकट भेजा था जिसे सुरेन्द्र दत्त ने फाड़कर फेंक दिया था।

बाजपेई की जिद पर हटे थे मुख्यमंत्री के दामाद

1967 में उत्तर प्रदेश की चौ. चरण सिंह की सरकार में सुरेन्द्र दत्त बाजपेई का अच्छा खासा जलवा कायम था। उस समय हमीरपुर के जिलाधिकारी दशरथ सिंह सूबे के तत्कालीन मुख्यमंत्री चौ. चरण सिंह के दामाद थे। दैवीय आपदा के समय जिलाधिकारी से गरीबों की मदद आपदा राहत बजट से करने को कहा गया लेकिन जिलाधिकारी ने मना कर दिया। जिलाधिकारी ने विधायक सुरेन्द्र दत्त से कहा कि वह मुख्यमंत्री के दामाद हैं, आप जानते नहीं हैं। इस पर विधायक सुरेन्द्र दत्त ने तत्काल जिलाधिकारी को हटाने के लिए मुख्यमंत्री को पत्र लिख दिया। ईमानदार विधायक ने मुख्यमंत्री से यह भी अपेक्षा की थी कि इस जिलाधिकारी को अब किसी भी जिले की कमान न दी जाये। मुख्यमंत्री चौ. चरण सिंह ने विधायक की सलाह मानी और उन्हें दोबारा चार्ज नहीं दिया गया था। मुख्यमंत्री ने भी जिलाधिकारी को कड़ी हिदायत दी कि दामाद बनना है तो घर बैठ जाओ और नौकरी करना है तो जनप्रतिनिधियों का सम्मान करो।

लोकसभा चुनाव में एक संत से हारे थे सुरेंद्र

सदर विधानसभा क्षेत्र के सुमेरपुर कस्बे के सुरेन्द्र दत्त बाजपेई लगातार वर्ष 1952 से 1962 तक तीन बार विधायक रहे। वर्ष 1967 में विधानसभा के चुनाव में सुरेन्द्र दत्त बाजपेई बजरंगबली ब्रह्मचारी पराजित हो गये थे। इसके बाद उन्होंने विधानसभा का चुनाव नहीं लड़ा। इस हार से वह बेहद दुखी हुये थे। सुरेन्द्र दत्त बाजपेई ने वर्ष 1971 के लोकसभा चुनाव में हमीरपुर-महोबा संसदीय क्षेत्र से कांग्रेस (ओ) के टिकट से चुनावी महासमर में किस्मत आजमाई थी जिसमें उन्हें पराजय का सामना करना पड़ा था। उन्हें 24849 मत मिले थे जबकि स्वामी ब्रह्मानन्द 139704 मत पाकर निर्वाचित हुये थे। तेज प्रताप सिंह 84044 मत पाकर दूसरे स्थान पर रहे थे।

सुरेन्द्र दत्त बाजपेई की ऐसी थी कार्यशैली

वीर भूमि बुन्देलखण्ड के हमीरपुर जिले में ईमानदारी के लिये विख्यात रहे सुरेन्द्र दत्त बाजपेई को प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री गोविन्द बल्लभ पंत ने लखनऊ में 10 बीघे में बना बंगला और नैनीताल की 100 एकड़ जमीन दी थी लेकिन यह पूरी सम्पत्ति सुरेन्द्र दत्त बाजपेई ने राष्ट्र के नाम पर दान कर दी थी। उन्होंने जीवन भर स्वतंत्रता संग्राम सेनानी और विधायक की भी पेंशन तक नहीं ली। उन्होंने अपनी ईमानदारी कायम रखने के लिये परिवार को कोई मदद नहीं की थी। सुरेन्द्र दत्त बाजपेई के पौत्र अशोक बाजपेई गल्ला मंडी सुमेरपुर में ट्रांसपोर्ट व्यवसाय से जुड़े हैं। पूरा घर इसी से चलता है। उनका एक पौत्र मोहित बाजपेई मौदहा में राजस्व अमीन है। परिजनों के मुताबिक दादा सुरेन्द्र दत्त बाजपेई एक जोड़ी धोती व कुर्ता से ही काम चलाते थे।


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