आखिरकार प्रियंका के रूप में कांग्रेस ने चलाया बहुप्रतीक्षित ' ब्रह्मास्त्र '..लम्बे समय से पार्टी के भीतर उठ रही थी मांग

आखिरकार प्रियंका के रूप में कांग्रेस ने चलाया बहुप्रतीक्षित  ब्रह्मास्त्र ..लम्बे समय से पार्टी के भीतर उठ रही थी मांग


नई दिल्ली। लोकसभा 2019 में भारतीय जनता पार्टी की धुंआधार प्रचार रणनीति और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के सियासी कद को चुनौती देने के लिए आखिरकार कांग्रेस ने प्रियंका गांधी के रूप में अपना बहुप्रतीक्षित " ब्रह्मास्त्र " चला ही दिया जिसकी लम्बे समय से पार्टी के भीतर मांग उठ रही थी।

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने अपनी बहन प्रियंका गांधी को राष्ट्रीय महासचिव नियुक्त करने के साथ ही उन्हें पूर्वी उत्तर प्रदेश का प्रभार देकर एक साथ कई निशाने साधे हैं। एक ओर देश के सबसे बड़े सूबे उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री आदित्यनाथ की घेरेबंदी के लिए जहां उनके गढ़ पूर्वांचल का प्रभार प्रियंका को दिया गया है तो दूसरी ओर सूबाई राजनीति में हालिया सपा-बसपा गठबंधन की राह रोकने का काम भी कांग्रेस ने अपने इस दांव से किया है।

पूर्वांचल एक समय में कांग्रेस का मजबूत गढ़ हुआ करता था। पूर्वांचल की तकरीबन तीन दर्जन सीटों पर कांग्रेस का पताका लम्बे समय से लहराती रही है । ब्राह्मण बहुल सीटों वाले इस इलाके के बूते ही कांग्रेस उत्तर प्रदेश और दिल्ली की सत्ता पर काबिज होती रही। प्रियंका को इलाके का प्रभार देकर कांग्रेस नेतृत्व ने अपनी सियासी जमीन को एकबार फिर उर्वर बनाने की कवायद की है। ऐसा कर कांग्रेस ने जहां एक ओर लोकसभा चुनाव के दौरान मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को उनके ही इलाके में घेरे रखने की चाल चली है। इतना ही नहीं कांग्रेस के इस कदम को 2022 विधानसभा चुनाव के मद्देनजर भी महत्वपूर्ण समझा जा रहा है। उल्लेखनीय है कि 2009 लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश से 22 सीटें जीती थी जिनमें से ज्यादातर पूर्वांचल से थी। वहीं 2014 में पूर्वांचल की एकमात्र आजमगढ़ सीट को छोड़कर सभी सीटें भाजपा के खाते में गई थी।

प्रियंका के राजनीतिक कैरियर की बात की जाए तो वह अभी तक केवल मां सोनिया गांधी और भाई राहुल गांधी के लिए प्रचार करती रही हैं। कांग्रेस कार्यकर्ता उनमें पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की छवि देखते हैं। राहुल गांधी के नेतृत्व में एक के बाद एक चुनाव हारने के दौरान अक्सर उनको पार्टी में लाए जाने की मांग उठती रही है। 2017 में उनके सक्रिय राजनीति में उतरने के कयास भी लगाये जा रहे थे। अब जब राहुल गांधी पार्टी के अध्यक्ष बन गए हैं और पार्टी ने हाल के तीन राज्यों में चुनावी जीत दर्ज की है तो उनकी तुलना राहुल गांधी से नहीं की जा रही है। हालांकि विपक्षी भाजपा इसे राहुल की विफलता के रूप में दर्शा रही है। प्रियंका ने अभी कोई चुनाव नहीं लड़ा है। मां सोनिया गांधी की सेहत कमजोर होने के चलते उनपर रायबरेली सीट में चुनावी कामकाज वही देखेंगी। यह भी हो सकता है वह रायबरेली से चुनाव लड़े। सक्रिय राजनीति में प्रियंका एक छवि रखती हैं। लोगों से घुलना-मिलना और कार्यकर्ताओं को प्रेरित करना उनका बड़ा राजनीतिक गुण माना जाता है।

सपा-बसपा गठबंधन के बाद उत्तर प्रदेश में अलग-थलग पड़ी कांग्रेस को प्रियंका के नेतृत्व में नई उर्जा मिलनी तय है। इसके साथ ही अब तक सुप्तास्था में पड़े कांग्रेसी कार्यकर्ता में भी उत्साह का संचार होना भी तय माना जा रहा है। सपा-बसपा गठबंधन द्वारा कांग्रेस को नजरअंदाज किए जाने के बाद जिस तरह से ताजपोशी हुई है। उससे समझा जा रहा है कि अब कांग्रेस इन दोनों दलों से दूरी बनाकर अपनी लकीर खींचेगी।

इसके साथ कांग्रेस ने ज्योतिरादित्य सिंधिया को महासचिव बनाने के साथ ही पश्चिमी उत्तर प्रदेश का प्रभार सौंपा है। सपा-बसपा गठबंधन का सर्वाधिक प्रभाव इसी इलाके में समझा जा रहा है। सिंधिया को प्रियंका के समानांतर पद और उत्तर प्रदेश के पश्चिमी क्षेत्र का प्रभार देकर राहुल गांधी ने पार्टी में ज्योतिरादित्य का कद भी ऊंचा कर दिया है। ऐसी चर्चा थी कि मध्यप्रदेश में कमलनाथ को मुख्यमंत्री बनाए जाने के बाद से सिंधिया असंतुष्ट हैं। किंतु उनको नया दायित्व देकर राहुल ने साफ कर दिया है कि वह उनके करीबी नेताओं में शुमार हैं।

इसके साथ ही कर्नाटक के प्रभारी केसी वेणुगोपाल को अशोक गहलोत की जगह राष्ट्रीय महासचिव संगठन का दायित्व देकर उन्हें हाल ही में कर्नाटक में उठे सियासी भूचाल को थामने का पुरस्कार दिया गया है।


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