रायबरेली: अपने गढ़ में ही कम नहीं है कांग्रेस के लिए मुश्किलें, महागठबंधन का ही भरोसा

रायबरेली: अपने गढ़ में ही कम नहीं है कांग्रेस के लिए मुश्किलें, महागठबंधन का ही भरोसा


रायबरेली। आगामी 2019 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस भले ही भाजपा के लिए मुश्किलें पैदा करने का दावा कर रही है, लेकिन अपने गढ़ रायबरेली में ही उसकी मुश्किलें कम नहीं हैं। भाजपा की सक्रियता ने कांग्रेस को और परेशान कर दिया है। स्थानीय स्तर पर अब पार्टी नेतृत्व भी अपने कार्यकर्ताओं से ज्यादा महागठबंधन पर निर्भर है।

स्थानीय स्तर पर भाजपा काफी अरसे बाद मजबूत हुई है। 2017 के चुनाव में पार्टी के तीन विधायक जीते थे। इसके अलावा जिला पंचायत अध्यक्ष,एक विधान परिषद सदस्य व कांग्रेस के ही एक विधायक को औपचारिक रूप से अपनी ओर करके पार्टी ने अपनी नींव काफी मजबूत कर ली है। हाल के दिनों में हुए पंचायत प्रतिनिधियों के जमावड़े ने इस बात पर बल दिया है कि रायबरेली में भाजपा काफी मजबूत है।

भाजपा का नेतृत्व भी सोनिया गांधी को उनके घर में घेरने की हर मुमकिन कोशिश कर रहा है। लगातार केन्द्रीय मंत्रियो का रायबरेली में आना और केन्द्रीय मंत्री अरुण जेटली द्वारा रायबरेली को नोडल के रूप में चुनना यह साबित करता है की पार्टी रायबरेली को लेकर कितनी गंभीर है।

दूसरी ओर कांग्रेस के नेतृत्व की परेशानी यह है कि पार्टी का संगठन स्थानीय स्तर पर जनाधार वाले नेताओं से तालमेल नहीं बैठा पा रहा है। पार्टी के कार्यक्रमों में स्थानीय नेता औपचारिक रूप से ही शामिल होते हैं। इसका कारण कांग्रेसी ही दबी जुबान से सोनिया गांधी के स्थानीय प्रतिनिधि को बताते हैं। हालांकि अरसे बाद स्थानीय विधायक अदिति सिंह को राष्ट्रीय महिला कांग्रेस की महामंत्री बनाकर जनाधार वाले नेताओं को सम्मान देने की बात जरूर की गई।

यदि लोकसभा और विधानसभा के चुनावी आंकड़ों की बात करे तो ये भी कांग्रेस के लिए बहुत आशाजनक नहीं है। लोकसभा के चुनावों में लगातार कांग्रेस के वोट प्रतिशत में कमी होना और 2017 के विधानसभा के चुनाव में पार्टी का प्रदर्शन औसत से कम होना हाईकमान के लिए चिंता बढ़ाने वाला है। लोकसभा के 2006 के उपचुनाव के परिमाणों के मुताबिक जहां कांग्रेस की अध्यक्ष सोनिया गांधी को 80.49 प्रतिशत वोट मिले थे, वहीं 2009 के आम चुनाव में यह घटकर 72.23 प्रतिशत रह गया।

2014 के चुनाव में कांग्रेस को 63.80 प्रतिशत मत ही मिल पाए थे,जबकि 2014 में भाजपा का वोट बढ़कर 21.05 प्रतिशत तक पहुंच गया था। इसमें एक बात गौर करने लायक है कि लोकसभा के भाजपा प्रत्याशी सोनिया गांधी के मुकाबले राजनीतिक कद में कहीं नहीं ठहरते थे। 2014 के लोकसभा प्रत्याशी अजय अग्रवाल रायबरेली के लोगों के लिए पूरी तरह से अनजान थे।

हालांकि रायबरेली में मोदी फैक्टर ने बड़ा रोल भी अदा किया है। इससे भाजपा को अपनी नींव मजबूत करने में काफी मदद मिली, जिसका परिणाम 2017 के विधानसभा चुनाव में भी दिखा। जिले में जहां भाजपा ने तीन सीट जीती हैं और उसकी हारी हुई सीटों का भी अंतर बहुत कम रहा है,जबकि कांग्रेस ने दो सीट जीती, जिसमें एक हरचंदपुर से विधायक कांग्रेस का साथ छोड़ चुके हैं।

रायबरेली सदर भी जीतने के पीछे कांग्रेस से कहीं ज्यादा निर्दलीय विधायक अखिलेश सिंह का हाथ रहा है। उनकी बेटी अदिति सिंह कांग्रेस की उम्मीदवार थी। विधानसभा के चुनाव परिणामों ने कांग्रेस के लिए चिंता और बढ़ा दी है। 2007 के बाद से लगातार पार्टी का वोट प्रतिशत घटा है और 2017 में तो औसत वोट उनको चौथे नंबर पर कर रहें हैं।

इन सबके बीच रायबरेली की जमीनी हकीकत से दूर कांग्रेस का नेतृत्व बाहर मोदी को घेरने में जुटा है,लेकिन अगर सभी बातों पर गौर करें तो सोनिया गांधी के ही गढ़ में मोदी फैक्टर काफी प्रभावी है। पिछले चुनाव परिणामों और जमीनी मजबूती से उत्साहित भाजपा ने रायबरेली को गंभीरता से लेना शुरू कर दिया है। पार्टी के वरिष्ठ नेताओं का विशेष रूचि लेना जिले के पार्टी कार्यकर्ताओं को उत्साहित करने वाला है। दूसरी ओर कांग्रेस ने पिछले चुनाव परिणामों और संगठन और स्थानीय नेताओं की बातों से कोई सबक अभी तक नहीं लिया है।

रायबरेली में भी पार्टी का हाईकमान सपा और बसपा के स्थानीय बड़े नेताओं पर ज्यादा भरोसा कर रहा है। महागठबंधन की दशा में ये नेता उनके लिए महत्वपूर्ण साबित हो सकते हैं। सोनिया गांधी का हाल के दिनों में एक पूर्व मंत्री से गुपचुप मिलना, इसी दिशा में कवायद है। इन सबसे एक बात तो तय है कि कांग्रेस के लिए मुश्किलें बहुत हैं।


Share it
Top