मलिक बिहार में कुछ वर्ष और रहे होते तो उच्च शिक्षा में होता सुधार

मलिक बिहार में कुछ वर्ष और रहे होते तो उच्च शिक्षा में होता सुधार


नई दिल्ली। सत्यपाल मलिक जम्मू-कश्मीर में कितना कर पायेंगे यह तो भविष्य बतायेगा, लेकिन वह बिहार में कुछ वर्ष और राज्यपाल रह गये होते तो उच्च शिक्षा की स्थिति में कुछ सुधार हो जाता। वैसे उनको यदि एक पूर्व गृह सचिव पर तरजीह देकर जम्मू-कश्मीर का राज्यपाल बनाया गया है और वह भी जबकि वहां राष्ट्रपति शासन है, जिसमें राज्य का पूरा कामकाज, प्रशासन राज्यपाल के जिम्मे है, तो जरूर कुछ महत्वपूर्ण जिम्मेदारी की योजना व उम्मीद से बनाया गया होगा। यह कहना है बिहार के वरिष्ठ पत्रकार सुरेन्द्र किशोर का। अभी जिन राज्यपालों की नियुक्ति हुई है, उनके बारे में पूर्व सांसद हरिकेश बहादुर का कहना है कि मेरे एक मित्र थे जो उ.प्र. में विधायक थे। वह कहा करते थे कि इन दिनों मनोनयन का प्रचलन बढ़ गया है। जिसका अर्थ वह बताते थे कि मन में जो आया वह नयन के सामने। यानि जिसको मन किया उसको राज्यपाल या राज्यसभा सांसद या मंत्री या राष्ट्रपति या उपराष्ट्रपति बना दिया। तो यही चल रहा है। जो भी नये राज्यपाल बनाये गये हैं या जो इधर से उधर किये गये हैं, उनमें से सत्यपाल मलिक और लालजी टंडन के अलावा अन्य किसी को कितने लोग जानते हैं। बहुत कम ही लोग अन्य के बारे में जानते हैं।

वरिष्ठ पत्रकार सुरेन्द्र किशोर का कहना है कि सत्यदेव नारायण आर्य जिनको हरियाणा का राज्यपाल बनाया गया है वे बिहार के हैं, दलित हैं और विधायक रहे हैं। यह पूछने पर कि उनको राज्यपाल बनाने से क्या भाजपा को बिहार में दलित वोट का लाभ होगा, उनका कहना है, आर्य का इस तरह का कोई असर नहीं है। मलिक से लगायत कई राज्यपालों व राजनीतिकों के विश्वस्त रहे प्रो. सुरेन्द्र प्रताप सिंह का कहना है कि जिस बेबी रानी मौर्य को उत्तराखंड का राज्यपाल बनाया गया है, उनका उ.प्र. के मौर्य जाति व ओबीसी में असर नहीं है। ऐसे में इन्हें प्रतीकात्मक ही माना जाना चाहिए। यह कि इस जाति के इतने लोग राज्यपाल बनाये गये हैं। अब लालजी टंडन को ही लीजिए, उनका बेटा उ.प्र. में योगी सरकार में मंत्री है, लेकिन पिता टंडन को बिहार का राज्यपाल बना दिया गया। क्या यह परिवारवाद, जातिवाद नहीं है? वह उस वैश्य समाज के हैं जिसके भाजपा सत्ता व संगठन शीर्षद्वय हैं। इसलिए किसको किस आधार पर बनाया गया है, इसका कोई पैमाना नहीं है। सच्चाई यह भी है कि इनमें से किसी के राज्यपाल बनाये जाने से, ये जिस जाति के ये हैं उस जाति का मतदाता इनके कारण भाजपा को उमड़ कर वोट नहीं देगा। वोट का समीकरण ही अलग होता है। इसलिए यह कहना कि फलां को राज्यपाल बनाये जाने से उस जाति के मतदाता बहुत खुश हो जायेंगे, सच्चाई से मुंह मोड़ना है।

गुजरात के वरिष्ठ पत्रकार डा. हरि देसाई का कहना है कि कोई पार्टी, उसका सत्ताधारी सर्वेसर्वा, किसी को भी राज्यपाल बनाता है तो कई समीकरण देखकर बनाता है। कई बार किसी को कहीं एडजस्ट करने के लिए बनाया जाता है। जैसे गुजरात की मुख्यमंत्री रहीं आनंदीबेन पटेल को मुख्यमंत्री पद से हटाया गया तो कुछ माह बाद म.प्र. का राज्यपाल बना दिया गया। इसी तरह से वाजूभाई बाला को कर्नाटक का राज्यपाल बना दिया गया। लेकिन इससे गुजरात के पटेल आंदोलन नहीं कर रहे हैं या खुश हो गये, ऐसा नहीं है।


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