सियासी पहुंच का फायदा उठा प्रोफेसर, कुलपति बनते जा रहे हैं 'चोरगुरू', प्रमाण सहित शिकायतों के बाद भी नहीं हो रही कार्रवाई

सियासी पहुंच का फायदा उठा प्रोफेसर, कुलपति बनते जा रहे हैं चोरगुरू, प्रमाण सहित शिकायतों के बाद भी नहीं हो रही कार्रवाई



नई दिल्ली । संसद के मानसून सत्र में राज्यसभा में एक सांसद के लिखित सवाल के जवाब में मानव संसाधन विकास राज्य मंत्री सतपाल सिंह ने बताया कि एपीजे अब्दुल कलाम प्राविधिक विश्वविद्यालय, लखनऊ के कुलपति प्रो. विनय कुमार पाठक (2018), महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ, वाराणसी के पत्रकारिता विभाग के प्रो. अनिल कुमार उपाध्याय (2017), पांडिचेरी विश्वविद्यालय की कुलपति चन्द्रा कृष्णमूर्ति (2015) के विरुद्ध विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने नकल करके पीएच.डी. थिसिस लिखने का मामला पाया है। मंत्री ने बताया कि चन्द्रा को जुलाई 2016 में बर्खास्त कर दिया गया, जबकि प्रो. विनय पाठक और प्रो. अनिल कुमार उपाध्याय के विरुद्ध कार्रवाई करने को कहा गया है।

तमाशा यह है कि जिस दिन मंत्री ने राज्यसभा में लिखित सवाल के जवाब में यह कहा, उसके दूसरे दिन ही उ.प्र. के राज्यपाल रामनाईक ने एपीजे अब्दुल कलाम प्राविधिक विश्वविद्यालय, लखनऊ के कुलपति प्रो. विनय पाठक को तीन वर्ष के लिए एक टर्म और दे दिया। महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ, वाराणसी के प्रो. अनिल कुमार उपाध्याय की हालत यह है कि वह जुलाई 2018 में सेवानिवृत होने के बाद सत्र के बीच में सेवानिवृत्त होने का लाभ लेते हुए अभी पढ़ा रहे हैं, नौकरी पर बने हुए हैं। इस तरह इन 'चोरगुरूओं' की पौ बारह है। लगता है कि अन्य चोरगुरूओं की फाइल को या तो दबा दिया गया है या उनके आका किसी राजनीतिक या अफसर की सिफारिश या दबाव के चलते उन पर कोई कार्रवाई ही नहीं करना चाहते। वरना ऐसे दर्जनों चोरगुरूओं के विरूद्ध कई वर्षों से प्रमाण सहित शिकायतें विश्वविद्यालय अनुदान आयोग और मानव संसाधन विकास मंत्रालय में पड़ी हुई हैं। यह शिकायत तबके सांसद हर्षवर्धन व राजेन्द्र सिंह राणा ने की है। जिन लोगों के विरुद्ध प्रमाण सहित शिकायत की गई है, उनमें प्रमुख हैं- महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्व विद्यालय के पत्रकारिता विभाग के प्रोफेसर अनिल कुमार राय "अंकित" उर्फ अनिल के.राय "अंकित"। जिस पर देश-विदेश के विद्वानों की पुस्तकों, पत्रिकाओं आदि से हूबहू कट-पेस्ट करके शोधपत्र, आधे दर्जन से अधिक अंग्रेजी व हिन्दी में पुस्तकें अपने नाम से छाप लेने का प्रमाण सहित आरोप है। महामना मदन मोहन मालवीय पत्रकारिता संस्थान, महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ, वाराणसी के तबके प्रोफेसर राममोहन पाठक, जिसपर नकल करके पीए.डी. थिसिस लिखने, काशी विद्यापीठ में रीडर पद पर फुल टाइम नौकरी करते हुए बीएचयू में फुल टाइम एम.जे. करने का प्रमाण सहित आरोप है। जामिया मिलिया में रीडर रहे दीपक केम को नकल करके पुस्तकें लिखने के प्रमाण सहित आरोप पर बर्खास्त कर दिया गया, लेकिन वह अभी भी अन्य जगह पढ़ा रहे हैं। इसी तरह वीर बहादुर सिंह पूर्वांचल वि.वि. जौनपुर के तत्कालीन प्रो. रामजी लाल, इसी वि.वि. के पूर्व कुलपति प्रो. पीसी पातंजलि, दिल्ली वि.वि. के विवादित प्रो. रमेश चन्द्रा व अन्य कई प्राध्यापकों पर नकल करके पुस्तकें लिखने का प्रमाण सहित आरोप है। इन सबके बारे में प्रमाण सहित लिखित शिकायत विश्वविद्यालय अनुदान आयोग व मानव संसाधन विकास मंत्रालय में कई वर्ष पहले किया गया था। जिस पर आज तक कोई कार्रवाई नहीं हुई। ऐसे चोरगुरू प्रोन्नत होकर, जुगाड़ लगाकर आगे बढ़ते जा रहे हैं, नौकरी करके सेवानिवृत होते जा रहे हैं।

इस बारे में चोरगुरूओं के विरूद्ध कड़ी कार्रवाई करने, उनको बर्खास्त करने के लिए संबंधित कुलपतियों, राज्यपालों, वि.वि.अनुदान आयोग, केन्द्रीय शिक्षा मंत्री, प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति को लगातार प्रमाण सहित पत्र लिखने वाले, 5 बार सांसद रहे और गुजरात भाजपा के दो बार अध्यक्ष रह चुके वरिष्ठ भाजपा नेता राजेन्द्र सिंह राणा का कहना है कि नकल करके पुस्तकें, शोधपत्र, पीएच.डी, डी.लिट. आदि लिखने वाले ऐसे चोरगुरूओं, ऐसी पुस्तकें छापने-बेचने वाले प्रकाशकों-वितरकों, उनको प्रश्रय देने वाले कुलपतियों, रजिस्ट्रार, शिक्षा मंत्रालय- विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के अफसरों का रैकेट इतना मजबूत हो गया है कि जब तक प्रधानमंत्री के आदेश से ऐसे लोगों के विरूद्ध कड़ी कार्रवाई का कोई बड़ा अभियान नहीं चलेगा, तब तक कुछ नहीं होने वाला है। क्योंकि ऐसे चोरगुरूओं में ज्यादातर ऐसे हैं जो जब जिसकी सरकार आती है, उसके नेताओं, संगठन पदाधिकारियों से जुगाड़ लगा, उनके संगठन में पदाधिकारी बनकर, किसी भी कार्रवाई से बचने का उपाय कर लेते हैं। इस तरह के कई उदाहरणों में से एक प्रमुख उदाहरण है म.गां.अं.हि.वि.वि. का प्रोफेसर अनिल कुमार अंकित। जिसने आधा दर्जन से अधिक पुस्तकें नकल करके अंग्रेजी में (हिन्दी पढ़ा यह आदमी अंग्रेजी में) विज्ञान की सेटेलाइट, प्रकाश आदि पर, विदेशी विश्वविद्यालयों, संस्थानों, विद्वानों ,वैज्ञानिकों आदि की पुस्तकों से हूबहू चैप्टर का चैप्टर जस का तस उतारकर अपने नाम से पुस्तकें अपने नाम बना, छपवा लिया है। उनके विरूद्ध प्रमाण सहित विश्वविद्यालय अनुदान आयोग, जिस विश्वविद्यालय में लेक्चरर रहते हुए उन्होंने नकल करके पुस्तकें लिखी थी, अब जिस वि.वि. में है, उसके कुलपतियों, राज्यपाल, केन्द्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री तक को प्रमाण सहित कार्रवाई के लिए लिखा गया। उस समय उनको नियुक्त करने वाले सजातीय कुलपति ने बचाया, अब यह किसी और के मार्फत जुगाड़ लगाकर बच रहे हैं। ऐसे लोगों के विरूद्ध मानव संसाधन विकास मंत्री जावडेकर को कड़ी कार्रवाई करनी चाहिए। अचरज है कि जावडेकर जैसे मंत्री ने अब तक इस पर कार्रवाई क्यों नहीं की ?


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