सेना की 2 लाख एकड़ वाली 62 कैंटोनमेंट की खाली जमीन पर उद्योगपतियों की निगाह , सेना के पूर्व अफसरों व सैनिकों में रोष

सेना की 2 लाख एकड़ वाली 62 कैंटोनमेंट की खाली जमीन पर उद्योगपतियों की निगाह , सेना के पूर्व अफसरों व सैनिकों में रोष



सेना के पूर्व अफसरों व सैनिकों में रोष, ऐसा हुआ तो करेंगे देशव्यापी आंदोलन
नई दिल्ली। सेना को अपने 2 लाख एकड़ वाले 62 छावनियों (कैंटोनमेंट) के रखरखाव पर सालाना खर्च हो रहा 476 करोड़ रुपये इतना भारी पड़ रहा है कि इसके खाली जमीन के रखरखाव को स्थानीय नगर निगमों को सौंपने का विचार करने लगी है। आशंका जताई जाने लगी है कि उसके बाद उन जमीन को केन्द्र व राज्य सरकारों के सत्ताधारी नेताओं के दबाव में अंबानी,अडानी, टाटा, गोदरेज, लोढ़ा जैसे देश के बड़े उद्योगपतियों, जो बिल्डर भी बन गये हैं, के हवाले किया जा सकता है। सूत्रों का कहना है कि इसके लिए तथाकथित ऊपर से संकेत के बाद, सेना ने एक प्रस्ताव रक्षा मंत्रालय के पास भेजा है कि कैंटोनमेंट को मिलिट्री स्टेशन में बदल दिया जाए। उस पर नियंत्रण तो सेना का रहेगा ,लेकिन इसके रखरखाव की जिम्मेदारी स्थानीय नगर निकायों की होगी।
1971 के युद्ध के पाकिस्तान जेलों में कैद भारतीय सैनिकों की रिहाई, उनके आश्रितों को सुविधा देने के लिए लंबे समय से मुहिम चला रहे कर्नल पट्टू का कहना है कि क्या भारत सरकार के पास सेना के कैंटोनमेंट के रखरखाव के लिए सालाना 476 करोड़ रुपये नहीं हैं? क्या यह खर्चा उसे इतना भारी पड़ रहा है कि कैंटोनमेंट के रखरखाव की जिम्मेदारी स्थानीय नगर निकायों को देने के बारे में विचार की जरूरत पड़ गई है? यह कत्तई नहीं होना चाहिए, क्योंकि सवाल मात्र 476 करोड़ रुपये सालाना खर्च का नहीं, देश की सुरक्षा का है। इसके रखरखाव की जिम्मेदारी नगरपालिकाओं को देने के बाद, कैंटोनमेंट की सुरक्षा के लिए बहुत बड़ा खतरा पैदा हो जाएगा। नगरपालिकाओं में काम करने वाले कौन होंगे, वे क्या करेंगे, उसमें कौन विदेशी खुफिया एजेंसियों या दुश्मन देशों के लिए काम करने लगें, इस पर किसी का लगाम नहीं रह जाएगा। स्थानीय नगरपालिकाएं भी कोई मुफ्त में तो कार्य करेंगी नहीं। वे भी किसी न किसी तरह से सालाना 476 करोड़ रुपये से अधिक वसूलेंगी।
बाद में यह भी हो सकता है कि कैंटोनमेंट की खाली पड़ी जमीन को देश के बड़े बिल्डरों को बेच दिया जाए। इस पर बहुत समय से तमाम बड़े उद्योगपति बिल्डरों की कुदृष्टि लगी हुई है। इसलिए कैंटोनमेंट के रखरखाव की जिम्मेदारी सेना के ही जिम्मे बनी रहने देनी चाहिए। जो पहले से चला आ रहा है, उसी तरह आगे भी रहने देना चाहिए। जहां तक इसके रखरखाव पर आ रहे सालाना 476 करोड़ रुपये खर्च का सवाल है, तो सरकार भ्रष्टाचार पर रोक लगा कर इसकी भरपाई करे। यह नहीं करके सरकार व सेना, कैंटोनमेंट का नाम व अधिकार बदलने, उसका रखरखाव स्थानीय नगर निकायों को देने की कैसे सोचने लगी है। यह कतई जायज नहीं है। यह होगा तो हम पूर्व सैनिक इसके विरूद्ध देशव्यापी धरना प्रदर्शन व आंदोलन शुरू करेंगे।
इस बारे में रक्षा मंत्रालय में निदेशक पद पर रहते हुए 7 रक्षा मंत्रियों के साथ कार्य कर चुके का कहना है कि जो पहले से चला आ रहा है, उसे ही कायम रखना चाहिए। इसमें कोई भी परिवर्तन देश व सेना की सुरक्षा के लिए घातक हो सकता है।
इस पर एक पूर्व रक्षा मंत्री ने कहा कि यह कतई नहीं होना चाहिए। यदि इस तरह की कोई फाइल आगे बढ़ाई गई है, तो यह पता लगाया जाना चाहिए कि किसके कहने पर यह फाइल बढ़ाई गई है। उसके पीछे की असली मंशा क्या है? कैंटोनमेंट पर रखरखाव पर आ रहा सालाना खर्च 476 करोड़ रुपये बचाने के लिए यदि ऐसा कुछ भी किया जाता है, तो यह देश व सेना की रक्षा से खिलवाड़ करने वाला साबित होगा। सवाल यह भी उठने लगेगा कि देश की सेना पर भी तो बहुत खर्च आ रहा है, तो क्या उसको खत्म कर देंगे? अथवा देश की सुरक्षा का जिम्मा भी, किसी बड़े उद्योगपति या किसी शक्तिशाली देश को ठेके पर दे देंगे, उसके हवाले कर देंगे?

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