जेएनयू में तोड़ी गई स्वामी विवेकानंद की प्रतिमा..आसपास लाल स्याही से बहुत ही भद्दे और निंदनीय नारे भी लिखे

स्टेच्यू कमेटी के बुद्ध सिंह ने कहा- नक्सलियों के कब्जे में है शिक्षा केन्द्र

नई दिल्ली। भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के जन्मदिन पर उनके ही नाम से देश की राजधानी में स्थापित विश्वविद्यालय के छात्रों ने जो कृत्य किया, वह बेहद शर्मनाक है। पिछले तीन दिनों से फीस में बढ़ोत्तरी को लेकर जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) में चल रहे विरोध प्रदर्शन का आज एक वीभत्स चेहरा सामने आया। विश्वविद्यालय के प्रशासनिक भवन पर कब्जा जमाए बैठे छात्र संगठन के लोगों ने वहां स्थापित स्वामी विवेकानंद की प्रतिमा को न केवल खंडित कर दिया बल्कि उसके आसपास लाल स्याही से बहुत ही भद्दे और निंदनीय नारे भी लिखे जो उनकी माओवादी-नक्सलवादी-अलगाववादी मानसिकता को दर्शाते हैं।

इस सारे घटनाक्रम को बेहद निंदनीय बताते हुए विश्वविद्यालय के प्राध्यापक व विवेकानंद स्टेच्यू कमेटी के अध्यक्ष बुद्ध सिंह ने कहा कि विश्वविद्यालय परिसर में स्वामी विवेकानंद की मूर्ति की स्थापना के प्रस्ताव के समय से ही वामपंथी-माओवादी-नक्सली विचार से प्रभावित छात्र इसका विरोध करते आ रहे थे। इसके बावजूद स्वामी विवेकानंद की विश्वस्तर पर ख्याति और भारतीय संत परम्परा को यशस्वी बनाने में उनके योगदान को देखते हुए उनकी प्रतिमा स्थापित कराई गई। जल्द ही इस प्रतिमा का अनावरण होने वाला था। विश्वविद्यालय के प्रशासनिक भवन पर कब्जा जमाए बैठे वामपंथी-नक्सली कथित छात्रों को कल रात मौका मिल गया। उन्होंने न केवल स्वामी विवेकानंद जी की प्रतिमा खंडित की बल्कि उस पर लिपटे भगवा वस्त्र को नुकसान पहुंचाया और प्रतिमा के आसपास और दीवारों पर लाल स्याही से बेहद आपत्तिजनक व घृणित वाक्य और नारे लिखे। यह उनकी मानसिकता को ही दर्शाता है और बताता है कि फीस में बढ़ोतरी तो एक बहाना है, असली मकसद तो देश की अस्मिता को चोट पहुंचाना है।

बुद्ध सिंह ने कहा कि हम रात के अंधेरे में कायरों द्वारा किए गए इस कृत्य की पुरजोर निंदा करते हैं। यह उनका एक घृणित कृत्य है। इसकी जेएनयू की नियमावली के तहत जांच होगी और दोषियों को हम किसी हालत में बख्शेंगे नहीं। फिलहाल तो हमारा प्रशासनिक भवन नक्सली सोच के लोगों से भरा पड़ा है। प्रशासनिक भवन में जो नारे लिखे गए हैं, वे भी इस बात की गवाही हैं कि यह कोई छात्र आंदोलन नहीं है। यह एक भटकाव है और विकृत मानसिकता को प्रकट करता है। इसीलिए अब हम प्रशासन से हस्तक्षेप करने को कहेंगे ताकि वह नक्सलियों-माओवादियों के कब्जे से प्रशासनिक भवन को मुक्त कराए।

जेएनयू से जो तस्वीरें प्राप्त हुई हैं, वे बताती हैं कि फीस की बढ़ोतरी के विरोध में चलाए गए आंदोलन का असली मकसद कुछ और ही था। वहां लिखे नारों में फॉसिज्म का विरोध किया जा रहा है और भाजपा को गाली दी जा रही है। इसके अलावा बहुत से नारे उर्दू में लिखे गए हैं। उल्लेखनीय है कि जेएनयू में ही 'भारत तेरे टुकड़े होंगे' जैसे नारे लगे थे । अब उसी जेएनयू परिसर में स्वामी विवेकानंद की प्रतिमा से घृणा करने वाली मानसिकता प्रकट हो रही है, जिन्होंने विश्व बंधुत्व का संदेश दिया और विश्व स्तर पर भारतीय संत परम्परा का मान बढ़ाया। ऐसे युवा संन्यासी से घृणा करने वाली मानसिकता का प्रकटीकरण बताता है कि जेएनयू को ऐसे ही टुकडे-टुकड़े गैंग का केन्द्र नहीं माना जाता है।


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