हरिद्वार में कांग्रेस, भाजपा में दावेदारों की होड़ जारी

हरिद्वार में कांग्रेस, भाजपा में दावेदारों की होड़ जारी

हरिद्वार। उत्तराखंड में चुनाव के लिहाज से काफी मायने रखने वाली हरिद्वार संसदीय सीट पर 2014 में काबिज हुए भाजपा के चर्चित नेता रमेश पोखरियाल निशंक ने भाजपा का परचम लहराया था। इस बार उन्हें यहां से टिकट पाने के लिए लामबंदी करनी पड़ रही है। डॉ. पोखरियाल ने पिछली बार इस सीट से कांग्रेस के तत्कालीन मुख्यमंत्री हरीश रावत की पत्नी रेणुका रावत को हराया था। हालांकि मोदी युग की शुरूवात में उन्हें पार्टी की लहर और कांग्रेस की सत्ता विरोधी रूझान के कारण चुनाव प्रचार में कोई मशकत नहीं करनी पड़ी। वर्ष 2009 में हरिद्वार संसदीय सीट पर कांग्रेस ने जीत दर्ज की थी। उस समय कांग्रेस के दिग्गज नेता हरीश रावत ने अपनी परंपरागत अल्मोड़ा तथा नैनीताल सीट को छोड़ कर हरिद्वार से चुनाव लड़ा था और भारी मतों से जीत दर्ज करी थी। राज्य के मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने यह सीट छोड़ दी थी। बाद में उनकी पत्नी ने यहां से चुनाव लड़ा और डॉ पोखरियाल से हार गयी। हरिद्वार की सीट इस मायने में भी खास है कि यहां देश विदेश से सैलानी आते है। देश की धार्मिक राजधानी कहेे जाने वाली इस सीट पर हमेशा बाहरी प्रत्याशी थोपे जाते रहे हैं, यही कारण है कि यहां हमेशा स्थानीय प्रत्याशियों को ही टिकट देने की मांग की जाती रही है। हरिद्वार ऋषिकेश डोईवाला और रुडकी तहसील की कुल आबादी में से इस बार कुल 18 लाख तीन हजार 510 मतदाता इस बाद वोट देने के हकदार है। इनमें से नौ लाख 61 हजार 706 पुरुष तथा आठ लाख 37 हजार 111 महिला मतदाता है। जो प्रत्याशियों के भविष्य को निधारित करेंगे। इस लोकसभा सीट के अन्तर्गत कुल 11 विधानसभा सीट शामिल हैं। जिनमें अधिकांश पर भाजपा के विधायक जीत कर आये है। हरिद्वार संसदीय सीट में कुल मिलाकर धार्मिक आर्थिक, रोजगार के मुद्दे हमेशा हावी रहे है। यहां मिश्रित आबादी जिसमें हिन्दू, अल्पसंख्यक एवं पंजाबी, जाट, सैनी और अनुसूचित जाति के वोटों के समीकरण प्रत्याशी के लिए हार जीत का सबग बन सकते है। जिस कारण यहां समय के साथ समीकरण बदलने से अलग-अलग पार्टियों के उम्मीदवार जीतते रहे है। इसलिए धर्म जाति समुदाय के सम्पूर्ण पैकेज ही प्रत्याशी को जीत दिला सकता है। हरिद्वार ससंदीय सीट 1977 में अस्तित्व में आयी यहां प्रारंभ में कांग्रेस का दब दवा रहा और बाद में 1991 से 1998 में यहां भाजपा का लगातार कब्जा बना रहा। हालांकि 2004 में यहां दंगे के कारण यहां अप्रत्याशित रूप से समाजवादी पार्टी को जीत मिल थी। वर्ष 2009 में कांग्रेस प्रत्याी हरीश रावत की जीत के बाद 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा की झोली में यह सीट चली गयी । हालांकि यहां विभिन्न पार्टियों के टिकट पाने की होड़ में घमासान मचा हुआ है। भाजपा की और से यहां से एक बार पुन: डॉ. पोखरियाल दावा हो रहे है वहां उनके अलावा यहां मेयर रह चुके मनोज गर्ग और लक्सर विधायक कुवर प्रणव सिंह चैम्पियन भी अपनी पत्नी देवयानी के लिए टिकट मांग रहे है। कांग्रेस के जहां हरीश रावत के समर्थक उन्हें टिकट देने की मांग कर रहे है। वहीं उन्ही की पार्टी के लोग बहारी प्रत्याशी बता कर उनका विरोध कर रहे है। उनके अलावा यहां काग्रेस के नेता संजय पालीवाल और प्रदेश अध्यक्ष प्रीतम सिंह का गुट अपने खेमे के लिए पैरवी कर रहा है। परन्तु उनकी टिकट भी मांग में गम्भीरता कम अपितु श्री रावत का विरोध ज्यादा नजर आती है। बसपा पहले ही अपना प्रत्याशी घोषित कर चुका है। कुल मिलाकर यहां पुराने चुनावी रिकार्ड पर यदि गौर करें तो यहां पिछले 20 सालों से कांग्रेस और भाजपा के बीच ही मुकाबला सिमट कर रह गया है। बसपा भी त्रिकोणीय मुकाबले में नजर आती है। परन्तु यहां बसपा में एक जुटता न होने और नेताओ के पार्टी छोडऩे और वापस आने की परंपरा ने बसपा अपने परंपरागत एससी, एसटी वोटों तक सिमट कर रह गयी है। इस बार कांग्रेस भाजपा के उम्मीदवार घोषित होने के बाद तस्वीर साफ हो सकेगी की यहां कौन सी पार्टी का पलड़ा भरी रहेगा। हालांकि दोनों ही पार्टियों में तगडी गुटबाजजी के कारण दोनों ही दलों के प्रत्याशियों को बाहरी के साथ-साथ भीतरी चुनौतियों से भी जुझना पड़ेगा।

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