भारतीय भाषाओं की सृजनात्मकता को विश्व मंच पर ले जाने की जरूरत : प्रणव

भारतीय भाषाओं की सृजनात्मकता को विश्व मंच पर ले जाने की जरूरत : प्रणव

नयी दिल्ली पूर्व राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने क्षेत्रीय भाषाओं के प्रचार-प्रसार की वकालत करते हुये आज कहा कि उनकी सृजनात्मकता को विश्व मंच पर ले जाने की जरूरत है क्योंकि वहाँ भी इनके लिए बड़ी संख्या में पाठक मौजूद हैं।

श्री मुखर्जी ने हिंदी दैनिक अमर उजाला द्वारा साहित्य के क्षेत्र में उत्कृष्ट काम योगदान के लिए शुरू किये गये पुरस्कार प्रदान करने के बाद यह बात कही। इस 'शब्द सम्मान' अलंकरण समारोह को संबोधित करते हये उन्होंने कहा कि भारत में अपनी भाषाओं की अस्तित्व रक्षा के साथ ही विदेशी भाषाओं को सहजता से अपने-आप में समाहित करने की क्षमता रही है। हमें सभी भाषाओं के प्रभावों के प्रति उन्मुक्त भाव रखने के साथ ही अपनी स्थानीय भाषाओं के प्रचार-प्रसार के लिए भी प्रयास करना चाहिए तथा उनकी सृजनात्मकता को वैश्विक स्तर पर ले जाना चाहिए। वहाँ उनके लिए बड़ी संख्या में पाठक मौजूद हैं।

उन्होंने कहा "हमारे यहाँ लेखकों, कवियों, विचारकों और बुद्धिजीवियों की समृद्धि विरासत रही है जिन्होंने देश को विश्व गुरू की पदवी दिलाने का काम किया था। देश में 121 भाषाएँ और 270 बोलियाँ हैं। भाषाओं के बीच संवाद के लिए बहुआयामी मंच तैयार करने की जरूरत है। कला एवं साहित्य को बढ़ावा देने में केवल सरकारी प्रयास पर्याप्त नहीं हो सकते और इसलिए इसमें परोपकारी संस्थाओं को आगे आने की आवश्यकता है।"

'आकाश दीप' सम्मान के लिए हिंदी में प्रसिद्ध आलोचक नामवर सिंह को तथा एक अन्य भारतीय भाषा में कन्नड़ के नाटककार गिरीश कारनाड को सम्मानित किया गया। यह सम्मान उन्हें इन भाषाओं में उनके जीवन पर्यंत योगदान के लिए दिया गया। स्वास्थ्य ठीक नहीं होने के कारण दोनों व्यक्तिगत रूप से समारोह में शामिल नहीं हो सकें। श्री सिंह की जगह उनके पुत्र विजय सिंह और श्री कारनाड की जगह उनके पुत्र रघु अमय कारनाड ने पुरस्कार ग्रहण किया। पुरस्कार स्वरूप शॉल, सम्मान पत्र, पाँच-पाँच लाख रुपये का चेक और गंगा प्रतिमा भेंट की गयी।

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