'जस्टिस मेहता से तल्ख रिश्ते के कारण पदोन्नत नहीं हो सके जस्टिस नंदराजोग'

नयी दिल्लीउच्चतम न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश मार्कण्डेय काट्जू का दावा है कि राजस्थान उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश प्रदीप नंदराजोग को पदोन्नति न देने की मुख्य वजह थी दिल्ली उच्च न्यायालय के न्यायाधीश वाल्मीकि मेहता से उनके तल्ख रिश्ते।

न्यायमूर्ति काट्जू ने अपने एक फेसबुक पोस्ट को ट्विटर पर टैग किया है, जिसमें उन्होंने दावा किया है कि न्यायमूर्ति मेहता से खराब संबंधों का खामियाजा न्यायमूर्ति नंदराजोग को भुगतना पड़ा है और उच्चतम न्यायालय में उनकी पदोन्नति नहीं हो सकी है।

पूर्व न्यायाधीश का दावा है कि न्यायमूर्ति गोगोई और न्यायमूर्ति मेहता आपस में समधी हैं और उन्होंने अपने संबंधी के इशारे पर न्यायमूर्ति नंदराजोग को नजरंदाज किया है। न्यायमूर्ति मेहता के पुत्र न्यायमूर्ति गोगोई के दामाद हैं। इस प्रकार वे आपस में समधी हुए।

न्यायमूर्ति काट्जू ने बगैर किसी पुष्ट जानकारी के आधार पर दावा किया है कि मार्च 2016 में कुछ गम्भीर आरोपों के तहत तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश टी एस ठाकुर ने न्यायमूर्ति मेहता का तबादला दिल्ली उच्च न्यायालय से अन्यत्र करने की सिफारिश की थी, लेकिन उनकी फाइल सरकार ने राष्ट्रपति के पास नहीं भेजी।

दिल्ली उच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश मार्कंडेय काट्जू ने दावा किया है कि उन्हें जो जानकारी मिली है और यदि वह सही है तो न्यायमूर्ति गोगोई ने तब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी या उनके किसी वरिष्ठ मंत्री से मुलाकात की थी और न्यायमूर्ति मेहता के लिए रहम की अपील की थी। सरकार ने उस वक्त फाइल दबा दी थी और न्यायमूर्ति ठाकुर के सेवानिवृत्त होने के बाद मुख्य न्यायाधीश बने न्यायमूर्ति जगदीश सिंह केहर की अध्यक्षता वाली कॉलेजियम को फाइल लौटा दी थी, जिसने न्यायमूर्ति मेहता का तबादला आदेश रद्द कर दिया था।

न्यायमूर्ति काट्जू ने दावा किया कि अपने समधी न्यायमूर्ति मेहता के लिए वर्तमान मुख्य न्यायाधीश ने भाजपा सरकार से फायदा लिया था और अब उनका ऋण चुकाने का समय है। उन्होंने सवाल खड़े किये कि क्या ऐसा व्यक्ति उच्चतम न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश के पद पर रहने लायक है। कॉलेजियम से संबंधित सेवानिव़ृत्त न्यायाधीश मदन बी लोकुर के पिछले दिनों के बयान पर भी सवाल खड़े करते हुए कहा है कि न्यायमूर्ति लोकुर का हालिया बयान विश्वसनीय नहीं है।

उन्होंने इन पूरे मामलों की जांच न्यायिक जवाबदेही समिति से कराने की सलाह भी दी है।

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