आपराधिक मामलों में स्पीडी ट्रायल न होने पर सुप्रीम कोर्ट ने लिया स्वतः संज्ञान

आपराधिक मामलों में स्पीडी ट्रायल न होने पर सुप्रीम कोर्ट ने लिया स्वतः संज्ञान



नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने आपराधिक मामलों में स्पीडी ट्रायल न होने के कारण लंबे समय तक आरोपियों के जेल में रहने के मामले पर स्वतः संज्ञान लिया। सुप्रीम कोर्ट ने मामले में अटार्नी जनरल केके वेणुगोपाल को कोर्ट की सहायता करने के लिए कहा।
सुप्रीम कोर्ट ने मामले में स्वतः संज्ञान सुप्रीम कोर्ट के दो जजों द्वारा फरीदाबाद जेल में मुआयना करने के बाद दी गई एक रिपोर्ट को देखने के बाद लिया है। इस रिपोर्ट में मुकदमों के लंबे चलने की वजह से सालों तक जेल में बंद कैदियों के जिक्र करते हुए स्पीडी ट्रायल की व्यवस्था लागू करने और कोर्ट का इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित करने की बात कही गई है।
10 अक्टूबर 2017 को विचाराधीन कैदियों के मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र, उत्तरप्रदेश और मध्यप्रदेश सरकार की इस बात के लिए आलोचना की थी कि वे उन विचाराधीन कैदियों को भी जेल से रिहा नहीं कर रहे हैं जो जेल से छूटने के योग्य हैं। जेलों में सीमा से ज्यादा कैदी भरे पड़े हैं| इसके बावजूद छूटने योग्य कैदियों को रिहा न करना आश्चर्यजनक है। सुप्रीम कोर्ट ने इस मसले पर राज्य सरकारों को नोटिस जारी किया था।
नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों के मुताबिक देशभर के कई जेलों में क्षमता से ज्यादा कैदी रह रहे हैं । जेलों की क्षमता से करीब चौदह फीसदी ज्यादा कैदी रह रहे हैं। छत्तीसगढ़ और दिल्ली में तो दोगुने से भी ज्यादा कैदी हैं। इन जेलों में बंद कैदियों में से 67 फीसदी विचाराधीन कैदी हैं। विचाराधीन कैदी वे होते हैं जिन्हें मुकदमे की जांच या पूछताछ के दौरान कैद में रखा गया है। उन्हें किसी मुकदमे में दोषी नहीं करार दिया गया है।

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