व्यंग्य: आधी रात को सुप्रीम कोर्ट की ड्योढ़ी पर हम

व्यंग्य: आधी रात को सुप्रीम कोर्ट की ड्योढ़ी पर हम

पिछले 15 दिनों से मेरे स्वास्थ्य परीक्षण चल रहे हैं। खून की जाँच, तरह तरह के मेडिकल टेस्ट, कभी खाली पेट तो कभी दो सौ ग्राम ग्लूकोज खाने के बाद सेम्पल लिये गये। सारा खानदान मेरे मेडिकल टेस्ट के परिणामों के अंदाजे लगा रहा था। बच्चे मेरी तरफ हैं, उनका अनुमान था कि मुझे कोई बीमारी नहीं है। पत्नी मेरी मुख्य विपक्षी है, उसे सरे आम मेरे देर सुबह आठ बजे तक सोने से शिकायत है, उसका अनुमान है कि निश्चित ही रिपोर्ट डगमग आयेगी और मुझे नियमित जीवन शैली की सलाह डाक्टर देगा। साले साहब ने तो ओपन चैलेंज ही दे दिया था, उनके अनुसार मेरे जैसे सुराग्रही के खून में कोलेस्ट्राल वगैरह की टेक्निकल फाइंडिंग न मिली तो टेस्ट का व्यय ही बेकार हो जायेगा। बहनें मंदिरों में जा जा कर मेरे स्वास्थ्य की कामना में व्यस्त हैं। छोटी बहन तो एक दो मजारों में भी तागा बांध आई है।

आखिरकार आज दोपहर टेस्ट के लिखित परिणाम भी मिल गये हैं। स्थिति बहुत नाजुक तो नहीं है पर कुछ पैरामीटर गड़बड़ हैं। जहां ब्लड सुगर 100 होनी चाहिये थी केवल 120 निकली है। एक्सपर्ट्स ने चिंता न करने की सलाह दी है। थोड़ी बहुत एक्सरसाइज करनी पड़ेगी पर मामला ठीक हो जायेगा, ऐसा आश्वासन भी दिया है। मुझे परहेज की सलाह दी गई है। बताया गया है कि मुझे अपनी थाली से कुछ स्वीट डिशेज बाजू वालों को बांटने पड़ेंगे लेकिन मैं नौकरी पर जा सकूंगा।
ऐसे उहापोह के माहौल में विश्वस्त सूत्रें से मुझे अभी अभी रात आठ बजे सूचना मिली है कि कल सुबह नाश्ते में श्रीमती जी जो मेरी मुख्य विपक्षी हैं, ने नाश्ते में मेरे प्रिय भजिये बनाने का निर्णय किया है। हमारे घर पर नाश्ता सुबह नौ बजे बन जाता है, अत: मेरे व्यापक हित में यह बहुत जरुरी है कि मैं सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाऊं और किसी भी तरह सुबह के नाश्ते के मीनू पर स्टे लग सके। जब सुप्रीम कोर्ट रात भर सुनवाई करके एक आतंकवादी की फांसी पर फैसला कर सकता है तो यह मामला तो एक इज्जतदार भारतीय नागरिक का है जो पेनल्टी के डर से एक दम ड्यू डेट से जस्ट पहले इनकम टैक्स पेयी पोस्ट ग्रेजुएट है और जो ब्रेन ड्रेन से बचा हुआ देश की सेवा में प्रथम श्रेणी का अधिकारी हैं। दरअसल यह मामला केवल मेरे स्वास्थ्य का ही नहीं है। यह मामला विश्व में देश के लोकतंत्र की संपन्नता की छवि का बन चुका है। एक सुसंपन्न देश में ही जहां जनता को दो टाइम भरपेट भोजन मिल रहा हो, भरपूर रोजगार हो,कोर्ट में पेंडेंसी निल हो, अदालतों को महीने महीने भर के वेकेशन पर जाने की लिबर्टी हो, इस तरह के कानूनी शगल सूझते हैं।
इस मामले में कोर्ट की सुनवाई से यह भी तय हो जायेगा कि भारत में नागरिकों के स्वास्थ्य को कितनी अहमियत दी जाती है। इस सुनवाई से दुनियां के सामने यह स्थापित हो जायेगा कि केवल अमेरिकी नागरिकों की ही जान कीमती नहीं है। हम इतनी लोकतांत्रिक उन्नति कर चुके हैं कि एक आम आदमी के सुबह के नाश्ते का मसला भी हमारे सुप्रीम कोर्ट तक जा सकता है और सुप्रीम कोर्ट की स्पेशल वेकेशन बैंच देर रात कोर्ट खोल कर मेरे नाश्ते का मीनू तय कर सकता है।
इस मुद्दे पर मेरे कोर्ट जाने के इस कदम को नैतिक जन समर्थन की आवश्यकता है। मुझे भरोसा है कि सम्पादकीय पन्ने पर इस लेख को पढ़ते ही आप भी एक ट्वीटी संवेदना जरुर व्यक्त करेंगे और देश के आम नागरिक के स्वास्थ्य से जुड़ी इस घटना पर हमारे सजग टी वी चैनल विशेषज्ञों की बहस अवश्य आयोजित करेंगे।
- विवेक रंजन श्रीवास्तव

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