पास पड़ोस: चीन भरोसेमंद दोस्त साबित होगा?

पास पड़ोस: चीन भरोसेमंद दोस्त साबित होगा?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हालिया चीन यात्र के बाद मेनस्ट्रीम मीडिया से लेकर सोशल मीडिया में ऐसी खबरें प्रचारित और प्रसारित हो रही हैं मानो चीन और भारत के रिश्ते बहुत मधुर और पक्के हो गये हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की चौथी चीन यात्र में जिस गर्मजोशी से उनका आदर सत्कार पड़ोसी देश के राष्ट्रपति शी चिनपिंग ने किया, उससे देशवासी हैरान हैं। शी चिनपिंग ने गर्मजोशी से सामान्य शिष्टाचार तोड़कर श्री मोदी का स्वागत करते हुए जिस तरह से दोस्ती की कसमें खाईं और भारत का गुणगान किया, वह हालिया अतीत में उनके अपने और चीनी राजनयिकों के बयानों सहित वहां के सरकारी प्रचारतंत्र पर प्रसारित भारत विरोधी सामग्री के एकदम उलट है।

खबरों और सरकारी तंत्र के माध्यम से देशभर में ऐसा माहौल बनाया जा रहा है कि चीन अब हमारा सबसे बड़ा मित्र और साथी है लेकिन यह सच्चाई नहीं बल्कि तस्वीर का एक पहलू भर है। इतिहास गवाह है कि चीन ने मित्रता से ज्यादा दुश्मनी हमसे निभाई है। ऐसे में प्रधानमंत्री की हालिया यात्र से खुशफहमी पालने की कोई जरूरत नहीं है।
भारत और चीन में पिछले काफी समय से लेकर तनावपूर्ण रिश्ते जारी हैं। डोकलाम विवाद में दोनों देशों की सेनाओं के आमने-सामने आकर खड़े होना कोई मामूली घटनाक्र म नहीं था। कई बार तो ऐसा आभास हुआ मानो युद्ध हो जाएगा। ईश्वर की कृपा से ऐसी नौबत नहीं आई लेकिन चीन द्वारा उस इलाके में सड़कें बनाने का काम जारी है और अभी भी वह डोकलाम के बड़े इलाके पर कब्जा जमाने के मंसूबे पाले हुए है।
यह अच्छी बात है कि चीन इस बार भारत को पाक के नजरिये से नहीं देख रहा है। दूसरे, हम डोकलाम की प्रेतछाया से मुक्त होकर आगे की दिशा में बढ़ रहे हैं। भले ही भारत व चीन तमाम आधुनिक हथियारों से लैस परमाणु शक्ति है मगर जो बात सभ्य तरीके से बैठकर तय हो सकती है, जरूरी नहीं कि उसके लिए हथियारों का सहारा लिया जाये। इस बात में कोई शक नहीं है कि चीन के हालिया रवैय्ये में बदलाव अमेरिका की संरक्षणवादी आर्थिक नीतियों और वैश्वीकरण की नीतियों पर राष्ट्रवादी सोच के हावी होने के चलते आया है जिसके चलते चीन को भारत की उभरती अर्थव्यवस्था एक सहारा दे सकती है। वैसे भी बदलते वैश्विक समीकरणों के बीच कई मायनो में चीन से बेहतर रिश्ते बनाना भारत के हित में ही है।
भारतीय प्रधानमंत्री की चीन यात्र जिस माहौल में शुरू हुई, उसे कूटनीतिक दृष्टि से अनुकूल नहीं माना जा रहा था। विदेश नीति के अनेक जानकारों के अनुसार चीन और अमेरिका के बीच आर्थिक मामलों को लेकर उत्पन्न जबर्दस्त तनाव की वजह से भी स्थितियां सही नहीं लग रही थीं। उत्तर कोरिया के तानाशाह किम जोंग और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प भी एक दूसरे पर गुर्राने का कोई अवसर नहीं छोड़ रहे थे। भारत चूंकि अमेरिका के काफी करीब माना जाता है, इसलिए चीन भी मन ही मन भन्नाया हुआ था। जापान के साथ भी उसका झगड़ा जारी है जिसके साथ श्री मोदी ने काफी दोस्ताना बना लिया है। राष्ट्रपति चिनपिंग की महत्त्वाकांक्षी वन रोड वन बेल्ट परियोजना से दूरी बनाकर भी भारत ने चीन को चिढ़ाने का जो साहस दिखाया, उसकी वजह से ही बाकी तनाव पैदा हुए। अरुणाचल और तिब्बत के धर्मगुरु दलाई लामा को लेकर भी बीजिंग में बैठे हुक्मरान भारत के प्रति अपनी नाराजगी जाहिर करते रहे हैं।
यह भी हकीकत है कि भारत ने दलाईलामा के भारत आने के साठ साल पूरे होने पर आयोजित कार्यक्र मों को तरजीह नहीं दी और चीन को बेहतर रिश्ते बनाने की दिशा में सकारात्मक संकेत दिया। दोनों देश दुनिया की प्राचीन सांस्कृतिक विरासत वाले सभ्य व जिम्मेदार देश हैं और मिल-बैठकर आगे बढऩे का प्रयास दोनों देशों के हित में है। वैसे भी आज चीन की राजनीति में शी जिनपिंग, माओ त्से तुंग के बाद सबसे शक्तिशाली राजनेता हैं। ऐसे में दोनों नेताओं की बेहतर रिश्तों की पहल के दूरगामी परिणाम हो सकते हैं। यह कहना जल्दबाजी होगी कि इस बातचीत के कितने ठोस निष्कर्ष सामने आते हैं, मगर आये दिन सीमा पर उभर रहे तनाव को जरूर टाला जाना चाहिए। यह इसलिये भी महत्त्वपूर्ण है कि अगले साल जब देश आम चुनावों में व्यस्त हो तो सीमाओं पर शांति रहे। उम्मीद है कि इस बातचीत के बाद दोनों देशों में व्यापार असंतुलन दूर होगा और बेहतर रिश्तों के लिये जमीन तैयार होगी।
चीन ने द्विपक्षीय सहयोग के तमाम विषय इस दौरान उठाते हुए भारत के साथ मिलकर विश्व रंगमंच पर साझा भूमिका निर्वहन करने की जो बात कही, वह सुनने में तो अच्छी लगती है लेकिन दोनों देशों के बीच विवाद के जो दो प्रमुख कारण हैं उन पर चिनपिंग ने न तो कोई खास आश्वासन दिया और न ही अपनी नीति में परिवर्तन का संकेत। इनमें पहला है सीमा विवाद और दूसरा पाकिस्तान को बीजिंग का स्थायी समर्थन। जब तक ये दोनों मुद्दे नहीं सुलझते, तब तक चीन से कितनी भी अच्छी बातें हों, उनसे लाभ नहीं होने वाला। नरेंद्र मोदी विदेश नीति के मोर्चे पर काफी सक्रि य और प्रभावशाली साबित हुए हैं। उनकी हालिया यूरोप यात्र भी काफी सफल बताई गई। सभी विश्वशक्तियों से वे जिस आत्मविश्वास के साथ बात करते हैं उससे उनकी और भारत दोनों की बेहतर छवि बन सकी है लेकिन चीन सबसे अलग ही नहीं, धूर्त भी है।
भारत-चीन के बीच विवाद भी ऐसे ही हैं लेकिन मोदी-जिनपिंग ने सिद्धांत के तौर पर तय किया है कि सीमाओं पर शांति व स्थिरता कायम रखी जाएगी। बेशक यह शिखर-संवाद अनौपचारिक था। कोई साझा वक्तव्य जारी नहीं किया गया, किसी लिखित समझौते पर हस्ताक्षर नहीं किए गए, आपसी भरोसे का मिलन था यह। सिर्फ यही नहीं, व्यापार, कृषि, पर्यटन, ऊर्जा, तकनीक आदि पहलुओं पर भी विमर्श किया गया। बेशक दुनिया की 40 फीसदी से ज्यादा आबादी दोनों देशों में रहती है, दोनों देशों का जीडीपी करीब 15 फीसदी है। यदि दोनों देश मिलकर काम करें तो 21वीं सदी एशिया की ही होगी। दोनों नेताओं ने ऐसी इच्छा जताई जरूर है।
इसमें कोई दो राय नहीं है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी चीन की यात्र दोनों देशों के आपसी रिश्तों आगे बढ़ेंगे और उनमें मजबूती आएगी लेकिन इतिहास से सबक लेने की जरूरत है। वर्ष 1954 में भी यह प्रयास तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू व चीनी प्रधानमंत्री द्वारा किया गया था लेकिन इसका कोई खास असर नहीं दिखा बल्कि वर्ष 1961 में युद्ध हो गया। खैर इसके बाद रिश्तों में कड़वाहट व मिठास का सिलसिला लंबे समय से चलता आ रहा है।
2014 में भी गुजरात में साबरमती के सांस्कृतिक कार्यक्र म में चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग आये थे लेकिन उसका भी कुछ खास फायदा नहीं मिला। चीन भारत का डोकलाम विवाद, अरुणाचल प्रदेश के सीमावर्ती क्षेत्रों में भी कई रूप में विवाद गहराता जा रहा है। अब इस यात्र से हमें पुरानी गलतियों से सबक लेते हुए रिश्तों को नये आयाम पर पहुंचाने की आवश्यकता है। इतिहास देखते हुए मोदी सरकार को बीजिंग में मिले स्वागत से किसी खुशफहमी में नहीं आना चाहिए क्योंकि धोखेबाजी चीन के डीएनए में है और उसकी विदेश नीति में सज्जनता का पूरी तरह अभाव है।
चिनपिंग भले ही ऊपर से कितने भी आधुनिक और हंसमुख दिखाई देते हों लेकिन उनका दिल भी माओ युग की कुटिलताओं से भरा है। यदि नरेंद्र मोदी इसे नहीं समझते तो फिर उन्हें भी पछतावा झेलना पड़ेगा। चीन से रिश्तों में सावधानी बरतने की जरूरत है।
-राजेश माहेश्वरी

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