राजनीति: सधी चाल पर तुरूप चाल

राजनीति: सधी चाल पर तुरूप चाल

कांग्रेस के साथ सबसे बड़ी समस्या यह है कि इसका शीर्ष नेतृत्व क्षमताविहीन है। इस कारण स्वयं को अति सक्रिय और क्षमतावान समझने वाले कुछ लोगों का एक गुट शीर्ष के चारों ओर कुंडली मारकर बैठा है और अपनी-अपनी ढपली बजा कर, अपनी निजी धारणाओं और अवस्थापनाओं के अनुसार नेतृत्व को नचाने का प्रयास करता रहता है। पहले भी यही स्थिति थी किन्तु सोनिया गांधी चूंकि कम बोलती थी इसलिए उनकी यह कमी छुपी रहती थी किन्तु राहुल मुखर और आक्रामक बनने के प्रयास में कांग्रेस और अपने लिए कभी कभी असहज स्थिति पैदा कर देते हैं। नेतृत्व की इस कमी का लाभ उठा कर कभी कभी इस गुट का कोई व्यक्ति अपनी निजी अहमन्यता के चलते अपनी खुन्नस निकालने के लिए भी उसका प्रयोग करने से नहीं चूकता।
प्रधान न्यायाधीश सर्वोच्च न्यायालय के प्रति अविश्वास काण्ड में भी यही हुआ लगता है। जबसे कपिल सिब्बल कानून मंत्री बने थे तब से मनमोहन सिंह को दरकिनार कर अपने पद और कांग्रेस के एक मुखर नेता की हैसियत के चलते मंत्रलय और सुप्रीमकोर्ट में चल रहे केसों को कभी पार्टी हित और कभी जनहित का हवाला देकर अपने हित में मोडऩे का प्रयास करते रहते थे किन्तु जब से जस्टिस दीपक मिश्रा सीजेआई बने हैं स्थिति उलट गयी है। वह ईमानदारी के चलते किसी भी दशा में कपिल सिब्बल को भाव देने के लिए तैयार नहीं हैं और न ही उनकी इच्छानुसार बैंच निर्धारित करने में सहायक बन रहे हैं। यह स्थिति सिब्बल को सहन नहीं हो रही थी। पहले तो सिब्बल ने कई प्रकरणों जिन में राममन्दिर मुद्दा भी शामिल है अपने मनचाहे निर्णय लेने के लिए सीजेआई को दबाव में लेने की कोशिश की और जब वे दबाव में नहीं आए तो उनसे निजी खुन्नस रखने लगे।
सुप्रीमकोर्ट के गलियारों में यह भी अफवाहें हैं कि जज लोया केस से सम्बन्धित याचिका को भाजपा के साथ सीजेआई को भी घेरने के लिए ही यह याचिका सिब्बल ने ही डलवाई थी। यह भी कहा जाता है कि इस याचिका की सुनवाई, पब्लिक की अदालत में अपनी 'पीड़ा' सुनाने के लिए प्रेस कांफ्रेंस में उतरे माननीय जजों की बेंच से करवाना उनका इष्ट था किन्तु सीजेआई दबाव में नहीं आए और उन्होंने अपने विशेषाधिकारों का प्रयोग करते हुए दूसरी बेंच निर्धारित कर दी। फलस्वरूप न्यायपालिका के इतिहास में पहली बार चार मा.जजों ने प्रेस कांफ्रेस की और प्रधान न्यायाधीश और न्यायपालिका के लिए असहज परिस्थितियाँ सामने आईं। प्रेस कांफ्रेंस के तुरंत बाद भी सिब्बल ने पूरे जोर शोर से प्रधान न्यायाधीश के प्रति अविश्वास का अभियान चलाए रखा था किन्तु वह सिरे नहीं चढ़ सका। जज लोया की रिट में कांग्रेस और अन्य कुछ लोगों के प्रति कुछ टिप्पणियों ने आग में घी का काम किया और सिब्बल अपने अभियान को सिरे चढ़ाने में सफल हो गये। आनन फानन कुछ आरोप बनाए गये और सात दलों के चौंसठ राज्यसभा सदस्यों के हस्ताक्षर कराकर जानबूझ कर शुक्रवार की अपरान्ह में यह प्रस्ताव राज्यसभा के सभापति उपराष्ट्रपति वैंकया नायडू को दे दिया गया।
कोई 'अक्ल का टपलू' भी यह मानने को तैयार नहीं होगा कि इस प्रकरण में मुख्य लक्ष्य केवल दीपक मिश्रा ही हैं। कपिल सिब्बल या उनके साथ जिन दो चार लोगों ने इस 'धोबी पाट' दांव की डिजाइनिंग की थी, वे इसके माध्यम से प्रधानमंत्री मोदी, भाजपा, आरएसएस और समूचे प्रशासनिक और न्यायिक ढाँचे को अपने दबाव में लेना चाहते थे किन्तु वे यह भूल गये कि उनके सामने मोदी जैसी चट्टान खड़ी है जो उनके इसी तरह के 'फुलप्रूफ' झटकों को सह-सह कर अब वज्र बन चुकी है। अब मोदी नाम का वह शख्स हर तीर जो तुम्हारे इन दांवों के बचाव में काम आ सकता है अपने तरकश में तैयार रखता है और वक्त जरूरत पर अविलम्ब छोड़ भी सकता है जैसा कि इस प्रकरण में हुआ।
यह बड़ी शातिराना सोच के अधीन किया गया था क्योंकि शनिवार और रविवार को सरकारी कार्यालय बंद रहने थे और जब तक इस महाभियोग पर काम शुरू होता, संवैधानिक संकट प्रारम्भ हो जाता। परम्परा के अनुसार जिस न्यायाधीश के प्रति अविश्वास लाया जाता है, वह स्वयं न्यायिक कार्यों से विरत हो जाता है और तब तक न्यायिक कार्य नहीं करता जब तक प्रस्ताव संसद में गिर न जाए। यह स्थिति सिब्बल और उनके कुछ अन्य साथियों के लिए बहुत फलदायक होती क्योंकि दीपक मिश्रा के विरत होते ही जिन चार सीनियर जजों ने कुछ दिन पहले ही प्रेस कांफ्रेंस की थी, में से किसी के पास यह शक्तियाँ आ जातीं और फिर जब तक अविश्वास की प्रक्रिया समाप्त होती, सिब्बल और उनके इसी मानसिकता के अन्य कई वकील न्यायाधीशों पर दबाव बना कर अपनी मनमर्जी चलाने का प्रयास करते और सफल भी होते। हो सकता है वे राममन्दिर मामले को इस स्थिति में लटका देते कि वह वर्षों लटका रहता। कुछ मामलों को जो बंद हो चुके थे, उन्हें जांच के नाम पर फिर खोल दिया जाता और उनसे फिर से राजनैतिक लाभ लेने की प्रक्रिया शुरू कर दी जाती।
इस प्रकरण में आरोप लगाने वालों की मानसिकता का इस से बड़ा 'दूषित मनोवृत्ति' का प्रमाण और क्या हो सकता था कि इस तरह के प्रस्ताव को तब तक उजागर नहीं किया जा सकता जब तक कि वह आवश्यक प्रक्रियाओं से गुजरने के पश्चात संसद के किसी सदन के पटल पर न आ जाय किन्तु यहाँ किया गया इससे उलट। पहले राष्ट्रपति जी से मिलने की आड़ में और फिर प्रस्ताव देने से पहले ही प्रेस कांफ्रेंसों का एक सिलसिला प्रारम्भ कर दिया गया और प्रधान न्यायाधीश को बिना जांच के ही काल्पनिक और तथ्यहीन आरोपों के आधार पर दोषी सिद्ध करने का भरपूर प्रयास किया गया। उनकी पूरी छीछालेदर करने को एड़ीचोटी का जोर लगाया गया।
जरा कल्पना कीजिए जिन सात दलों के चौंसठ सांसदों ने इस महाभियोग प्रस्ताव पत्र पर हस्ताक्षर किये हैं, वे क्या इसे संसद में पास भी करा सकते थे। अगर वेंकैया नायडू इसे अपनी निहित शक्तियों का प्रयोग करके निरस्त न भी करते तो क्या यह संसद के किसी सदन से स्वीकृत भी हो सकता था ?। इसका एक मात्र उत्तर है नहीं। तो फिर इन लोगों ने क्या संसद का समय जो वे अपने कृत्यों से पहले ही नष्ट कर चुके हैं, अगले सत्र का भी समय नष्ट करने का एकमात्र लक्ष्य लेकर चले थे। शायद नहीं। सिब्बल और उनके साथी कुछ वकील यह अच्छी तरह जानते थे कि इस महाभियोग का क्या हाल होना है। निरस्त तो यह होना ही था, भुले ही किसी भी स्तर पर होता। प्रस्तुतकर्ताओं का एकमात्र लक्ष्य इसके माध्यम से देश की न्यायिक व्यवस्था को छीछालेदार कर अपने दबाव में लेना था जिसमें वेंकैयानायडू द्वारा सही वक्त पर सही निर्णय लेने का कारण यह अवांछनीय स्थिति नहीं बन सकी और बड़ी खूबसूरती से इन देश के न्यायिक भाल पर कलंक का टीका लगने से बच गया।
इसी तरह की परिस्थितियाँ पैदा करते रहने की मानसिकता के चलते हमारे देश की संवैधानिक संस्थाएं अपने अस्तित्व बचाने की लड़ाई से जूझ रही हैं। सही बात तो यह है कि इन संवैधानिक संस्थाओं पर अंगुली उठाने वाली राजनैतिक संस्थाओं और उनसे जुड़े लोगों को अपने गिरेबानों में झांकना होगा कि वे देश को आखिर कहां ले जा रहे हैं। इस तरह की नकारात्मक सोच जहां देश, प्रशासन और युवा पीढ़ी को एक अंध-कूप की ओर अग्रसर कर रही है वहीं इस तरह की सोच रखने वालों के भविष्य को भी अस्थिर कर रही है। उन्हें सोचना होगा कि वे अब बस करें और याद रखें कि 'अति का अंत' सुनिश्चित होता है। हम तो यही प्रार्थना कर सकते हैं कि किसी के समक्ष यह स्थिति न आए।
- राज सक्सेना

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