प्रश्न चिन्ह: क्या अदालतें जनभावनाओं के अनुरूप फैसले देंगी

प्रश्न चिन्ह: क्या अदालतें जनभावनाओं के अनुरूप फैसले देंगी

अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति कानून में सुप्रीम कोर्ट के ताजा निर्णय के बाद देश में दलित आंदोलन नये सिरे से मुखर हो गया है। कानून में बदलाव देश के उच्चतम न्यायालय ने किया। बावजूद इसके सवालों के घेरे में केंद्र सरकार है। केंद्र सरकार का सवालों के घेरे में होना लाजिमी भी है। आखिरकार देश की जनता ने जिस सरकार को अपनी भलाई, विकास और देशहित में चुना था, वो जवाब भी उसी से मांगेगी लेकिन इस सारे प्रकरण को विपक्ष जिस तरह अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकने के लिये इस्तेमाल कर रहा है वो देश व जनहित में नहीं है।
दलित समुदाय के पास बड़ा वोट बैंक है। ऐसे में सत्तारूढ़ दल सहित तमाम दलों की नजर इस वोट बैंक को अपने पाले में लाने की है। ऐसे में दोनों ओर से जमकर राजनीति हो रही है। इस मसले पर दलित और गैर दलित संगठनों द्वारा दो दफा भारत बंद किया जा चुका है। भारी जनदबाव और वोट बैंक की राजनीति के सामने नतमस्तक सरकार सुप्रीम कोर्ट के निर्णय को निष्प्रभावी करने के मकसद से अध्यादेश लाने की तैयारी में है। क्रिया की प्रतिक्रिया होना स्वाभाविक है। सरकार के निर्णय के बाद गैर दलित किस प्रकार की प्रतिक्रिया देंगे, यह सवाल भविष्य के गर्भ में है।
पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट ने एससी-एसटी एक्ट में बदलाव करते हुए दलित उत्पीडऩ की शिकायत पर तत्काल गिरफ्तारी किये जाने को रोककर विवेचना उपरांत कार्रवाई करने का निर्देश दिया था। तथाकथित दलित संगठनों व विपक्षी दलों ने दलित समुदाय को गुमराह किया कि केंद्र सरकार आरक्षण खत्म करने जा रही है। इसके बाद देशभर में दलित आक्रोशित हो गये। प्रदर्शन, जन दबाव और वोट बैंक को खिसकते देख केंद्र सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय में पुनर्विचार याचिका पेश करते हुए स्थगन की मांग की लेकिन जब न्यायालय ने उसे ठुकराते हुए बाद में सुनवाई की बात कही, तब केंद्र सरकार के हाथ बंध गए। इधर भाजपा विरोधी सभी पार्टियां उस पर सवर्ण जातियों की समर्थक होने की तोहमत जडऩे में जुट गईं। मोदी सरकार सुप्रीम कोर्ट के फैसले को रोकने के लिए अध्यादेश लाने की तैयारी में है। शायद मोदी सरकार इस मामले में जल्दबाजी न करती लेकिन कर्नाटक विधानसभा चुनाव ने उसका मनोबल गिरा दिया। ऊपर से 2 अप्रैल के भारत बंद के दौरान हुई हिंसक घटनाओं ने भी पार्टी और सरकार की चिंताएं बढ़ा दीं।
विपक्ष के अलावा भाजपा के अंदर भी दलित समर्थक नेताओं की लंबी फेहरिस्त है। वहीं इस तथ्य से इंकार नहीं किया जा सकता कि 2014 के लोकसभा और यूपी विधानसभा चुनाव में दलित, पिछड़ों व आदिवासी वोटों के चलते भाजपा ने जीत के सुनहरे झण्डे गाड़े। पिछले एक दशक में भाजपा में दलित एवं आदिवासी नेताओं का भी वजन व कद काफी तेजी से बढ़ा है। इस वर्ग से भी उसके काफी सांसद और विधायक जीतकर आए हैं। इस तरह भाजपा भले ही मुस्लिम तुष्टीकरण का विरोध करे लेकिन वोट वैंक की खातिर जातियों के तुष्टीकरण में वह अन्य पार्टियों से पीछे नहीं है। यही वजह है डा. अम्बेडकर जयंती पर नरेंद्र मोदी यहां तक कह गए कि वे बाबासाहब की वजह से ही प्रधानमन्त्री बन सके। इसके पूर्व भी जब-जब आरक्षण का विरोध हुआ, श्री मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने गला फाड़-फाड़कर कहा कि भाजपा आरक्षण को बरकरार रखेगी। अभी हाल ही में यूपी से भाजपा सांसद निरंजन ज्योति ने आरक्षण के मुद्दे पर अपनी ही सरकार के खिलाफ रैली कर आलाकमान की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। वहीं भाजपा के यूपी व दिल्ली के दलित सांसदों ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर जमीनी हकीकत से रूबरू करवाया है।
2 व 10 अप्रैल को बंद एवं हिंसा, दलित वोट बैंक की राजनीति के बरअक्स अब सवाल यह उठता है कि क्या सर्वोच्च न्यायालय के फैसले को बेअसर करने के लिए अध्यादेश लाना सही कदम होगा? यद्यपि पहले भी सरकारों ने सर्वोच्च न्यायालय के अनेक फैसलों को अध्यादेश के जरिये पलटा है लेकिन फिलहाल जिस मामले में अध्यादेश की संभावना बताई जा रही है उससे मोदी सरकार और भाजपा दोनों एक बड़े वर्ग की सहानुभूति और समर्थन खो देंगे। कांग्रेस भी इसी तरह के दबावों में आकर लोगों की नाराजगी की वजह बनी।
भाजपा को यह बात समझ लेना चाहिए कि वह भी यदि इसी तरह दबाव में आकर तात्कालिक लाभ वाले निर्णय लेगी, तब उसे भी वही परिणाम भुगतने के लिए तैयार रहना होगा जो शाह बानो मामले में दिए सर्वोच्च न्यायालय के फैसले को संसद में उलट देने के बाद स्व.राजीव गांधी को भोगने पड़े थे। सवर्ण जनमानस में दलित और आदिवासियों के प्रति जो भी गुस्सा है, वह केवल इस बात पर है कि उन्हें जरूरत से ज्यादा सुविधाएँ और सरंक्षण दिया जा रहा है। जिस कानून को सर्वोच्च न्यायालय ने संशोधित करने का दुस्साहस किया, उसका दुरुपयोग होने पर ही उस प्रकार का निर्णय उसे करना पड़ा। ऐसे में सरकार ने अध्यादेश के माध्यम से उक्त निर्णय पर रोक लगवा दी तो भविष्य में न्यायपालिका कोई भी साहसिक फैसला लेने से बचेगी।
पूर्व मुख्य न्यायाधीश के.जी. बालकृष्णन ने तो यहां तक नसीहत दे डाली कि न्यायालयों को फैसले करते समय यह ध्यान रखना चाहिए कि उससे जनता नाराज न हो जाए। यदि सरकार ने इस निर्णय को पलटने के लिए अध्यादेश निकाला, तब बड़ी बात नहीं कि कल को मुस्लिम समुदाय तीन तलाक पर अदालती फैसले को पलटने के लिए भी ऐसी ही मांग करने लग जाए और उसे न मानने पर धर्म निरपेक्ष ढांचे को कमजोर करने का आरोप मढ़ा जाने लगे। हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय ने कावेरी जल विवाद में कर्नाटक के पक्ष में जो फैसला दिया उसकी वजह से पूरा तमिलनाडु आंदोलित है। ऐसे में सवाल उठ खड़ा होता है कि क्या न्यायपालिका सर्वोच्च स्तर पर जनभावनाओं के अनुरूप फैसले देने हेतु बाध्य की जा सकती है।
बाबा राम रहीम को आजन्म कारावास की सजा सुनाई जाते ही हरियाणा और पंजाब में बड़े पैमाने पर हिंसा फैल गई थी। यदि न्यायाधीश उस संभावना पर ध्यान देते, तब क्या एक दुष्कर्मी को उसके किये की माकूल सजा दी जा सकती थी?
अध्यादेश लाकर सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय को बेअसर करने की मांग भी फैसले के तुरंत बाद उठी थी किन्तु उस समय सरकार को लगा कि शायद पुनर्विचार याचिका के जरिये वह निर्णय को रुकवा लेगी पर जब काम नहीं बना तब उसे वैकल्पिक उपाय तलाशने को मजबूर होना पड़ रहा है। उसे यह भय भी सता रहा है कि कहीं मामला लम्बा खिंचा और ग्रीष्मावकाश की वजह से सर्वोच्च न्यायालय में अवकाश हो गया, तब उसकी मुसीबतें और बढ़ती जायेंगी। सबसे बड़ी बात ये है कि भाजपा के भीतर भी आरक्षण समर्थक लाबी बहुत ताकतवर है।
बेहतर हो मोदी सरकार और भाजपा के नीति-नियंत्रक इस तरह की गलतियां करने से बचें वरना उन्हें जो फायदा-नुकसान होगा, वह उतना महत्त्वपूर्ण नहीं जितना न्यायपालिका की सर्वोच्च पीठ के अवमूल्यन होने का खतरा है। क्षणिक राजनीतिक लाभ हेतु गलत मांगों के सामने घुटने टेकने की प्रवृत्ति की वजह से ही देश अनेक ऐसी समस्याओं में उलझकर रह गया है जिनका समाधान दूरदराज तक नजर नहीं आ रहा। अध्यादेश लाकर सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय को निष्प्रभावी करने का अर्थ होगा सवर्ण और दलित समुदाय बीच की खाई को और चौड़ा करना लेकिन जो हालात फिलवक्त देश में हैं, उसमें कोई भी दल बड़े दलित वोट बैंक को किसी भी कीमत पर दूर करना नहीं चाहेगा भले ही इसके लिए देश व देशवासियों को कोई भी कीमत क्यों न चुकानी पड़ जाए।
- राजेश माहेश्वरी

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