अंतर्राष्ट्रीय: सीरिया पर मित्र राष्ट्रों का आक्रमण और भारत की भूमिका

अंतर्राष्ट्रीय: सीरिया पर मित्र राष्ट्रों का आक्रमण और भारत की भूमिका

तो क्या सचमुच विश्वयुद्ध प्रारंभ हो गया है? लिहाजा सीरिया पर अमेरिकी मित्र राष्ट्रों की सेना ने हवाई हमला कर निस्संदेह रूप से रूस को उकसाया है। रूस की अगली कार्रवाई क्या होगी, यह देखना अभी बाकी है लेकिन इतना तो तय है कि अब रूस भी प्रतिरक्षात्मक रवैय्या अपनाने में अपने आप को असहज महसूस करेगा। कतिपय संभावनाओं पर रूस विचार कर रहा होगा क्योंकि अमेरिका और उसके रणनीतिक दोस्त ब्रितान और फ्रांस ने रूस के बेहद करीबी दोस्त सीरिया पर हमला बोला है। इस आक्रमण के बाद रूस चुप रहता है तो आने वाले समय में अमेरिका और उसके मित्र राष्ट्र रूस की सीमा में घुसकर हमला कर सकते हैं। इसलिए रूस अब कुछ न कुछ करेगा लेकिन क्या करेगा, यह खुलासा अभी तक उसने नहीं किया है।
वैसे रूसी प्रतिरक्षा मंत्रालय के हवाले से आई खबर में बताया गया है कि अमेरिकी मित्र राष्ट्रों के द्वारा सीरिया में कुल 113 मिसाइलें दागी गयी, जिसमें से सीरियाई सेना ने 71 मिसाइलों को मार गिराया, यानी रूस का दावा है कि अमेरिकी मित्र राष्ट्रों के द्वारा सीरिया पर किए गए हमले को रूस और सीरिया ने मिलकर प्रभावहीन बना दिया है। मोटे तौर पर रूस और अमेरिका के बीच चल रहे गतिरोध को समझना कठिन है लेकिन विश्व जिस ओर बढ़ रहा है उसे समझने और उसको भारतीय परिपेक्ष्य में देखने की जरूरत है।
ऐसे में जिस प्रकार चीन ने विश्व की समस्या को सदा अपने हितों के लिए उपयोग किया, उसी प्रकार भारत को भी चीनी रणनीति का पूर्ण रूप से अनुकरण तो नहीं करना चाहिए लेकिन इस युद्ध को पेशेवर और व्यावहारिक तरीके से लेना चाहिए। लिहाजा हमारे कूटनीतिकों को वर्तमान गतिरोध को अपने हितों के लिए उपयोग करना चाहिए।
अब हमें थोड़ी वैश्विक पृष्ठभूमि पर भी नजर दौड़ा लेनी चाहिए। अमेरिका और उसके मित्र राष्ट्रों की ताकत अभी रूस से कई गुना ज्यादा है। रणनीतिक और कूटनीतिक दृष्टि से भी रूस की तुलना में अमेरिका ज्यादा मजबूत दिख रहा है। हालांकि फिलहाल रूस के साथ चीन खड़ा तो है लेकिन चीन पर ज्यादा भरोसा नहीं किया जा सकता। उसका इतिहास बेहद अविश्वसनीय रहा है। चीन में अमेरिका और पश्चिम का निवेश बहुत है और उस निवेश को हथियार के तौर पर पश्चिमी देश उपयोग कर सकते हैं। ऐसे में रूस चीन पर ज्यादा भरोसा नहीं कर सकता लेकिन रूस के पास ईरान जैसा बेहद शातिर और समझदार राष्ट्र खड़ा है जो रूस को ताकत प्रदान कर रहा है।
दूसरी ओर रूस ने अब तुर्की को भी अपने साथ जोड़ लिया है। हालांकि तुर्की ने अमेरिकी मित्र राष्ट्रों के हमले की सराहना की है लेकिन तुर्की कई मामलों में रूस पर आश्रित है इसलिए गतिरोध बढऩे पर तुर्की या तो रूस का साथ देगा या फिर तटस्थ रहेगा। वर्तमान परिवेश में सीरिया पर किया गया हमला दुनिया के शक्ति संतुलन की सबसे बड़ी घटना है। यदि तुर्की सचमुच में अमेरिकी खेमे को छोड़ रूस के साथ आकर खड़ा हो जाता है जिसकी संभावना दिखने लगी है तो चीन के सहयोग के बिना भी रूस, सीरिया में अमेरिका पर भारी पड़ेगा।
अभी हाल तक तुर्की अमेरिकी खेमे में था लेकिन तुर्की में तख्ता पलट की घटना के बाद से वह अमेरिका के प्रति सशंकित दिख रहा है। संभावना यह भी व्यक्त की जा रही है कि जल्द ही तुर्की नाटो की सदस्यता भी छोड़ सकता है। यदि ऐसा हो गया तो यह अमेरिका के लिए खतरे की घंटी होगी और तब कम से कम एशिया में अमेरिकी की दादागीरी बंद हो जाएगी। तुर्की जहां बैठा है, यानी उसका भूगोल मध्य-पूरब में उसे बेहद महत्त्वपूर्ण बना रहा है। तुर्की फिर से अपनी ताकत को संगठित कर रहा है। ऐसे में वह इतनी जल्दी अपनी पत्ते नहीं खोलेगा। उसे इस बात की जानकारी है कि उसके भूगोल के कारण उसे पश्चिमी खेमा भी महत्त्व देगा और रूस को भी उसके साथ की जरूरत है इसलिए वह दोनों ताकतों को साध कर अपनी शक्ति को बढ़ाने की कोशिश करेगा। अमेरिका, तुर्की के वर्तमान नेतृत्व की इस रणनीति को समझकर ही तख्ता पटने वाले ग्रुप को सहयोग किया था लेकिन अब अमेरिका की चाल तुर्की में कमजोर पडऩे लगी है और रूस उसका फायदा उठा रहा है।
इस युद्ध को लेकर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् में महाशक्तियों की रणनीति को भी समझने की जरूरत है। सुरक्षा परिषद् के सदस्य देशों में से दो-ब्रितान और फ्रांस, अमेरिकी खेमे में हैं। इधर रूस और चीन हैं। इसलिए सुरक्षा परिषद् में रूस का पलड़ा अभी कमजोर लग रहा है लेकिन रूस अपनी महाताकत, वीटो का वहां प्रयोग कर सकता है। अगर वीटो में कोई लफड़ा हुआ तो फिर विश्वयुद्ध कोई रोक नहीं सकता।
इधर चीन के साथ भी बड़ी समस्या है। चीन अपने विस्तारवादी चिंतन को स्वरूप देने में लगा है। इसमें उसे रूस का सहयोग चाहिए ही चाहिए। यदि रूस हाथ खींच लेता है तो चीन की सारी योजनाएं धरी की धरी रह जाएंगी, इसलिए चीन को भी रूस का साथ चाहिए। ऐसे में दुनिया दो ध्रुवों में विभाजित होती जा रही है। अमेरिका अपने अडिय़ल रूख से पीछे नहीं हटा तो उसे इसकी बड़ी कीमत चुकानी पड़ सकती है।
सच पूछिए तो इस वैश्विक लड़ाई में भारत को तटस्थ रहने में भी फायदा है। भारत अपने पड़ोसियों से मामला सुलझाए क्योंकि महाशक्तियां अब युद्ध की ओर बढ़ रही हैं। वह वहां उलझे बिना रह नहीं सकती हैं। इसलिए अब भारत और पाकिस्तान, भारत और चीन को अपनी सीमा की सारी समस्याएं सुलझा लेने में ही फायदा है। इससे आने वाले समय में चीन, पाकिस्तान और भारत तीनों को फायदा होगा। साथ ही ये तीनों मिलकर अमेरिका और रूस का विकल्प भी दे सकते हैं।
प्रथम विश्वयुद्ध के बाद दुनिया के कुछ गुलाम देश आजाद हुए। दूसरे विश्वयुद्ध के बाद दुनिया लगभग स्वतंत्र देशों से अट पट गया और अब तीसरे विश्वयुद्ध के बाद दुनिया के जो आर्थिक गुलाम देश हैं वे अपनी गुलामी से निजात पा सकते हैं। भारत अभी भी पश्चिमी दबाव में है। सीरिया में जैसे ही पश्चिम और रूस उलझेगा, भारत को अपने आप को संभालने का मौका मिल जाएगा। इसलिए भारत को चाहिए कि इस मौके का फायदा उठाए।
- गौतम चौधरी

Share it
Share it
Share it
Top