राष्ट्ररंग: समाज का हिंसक हो जाना चिंताजनक है

राष्ट्ररंग: समाज का हिंसक हो जाना चिंताजनक है

प्राचीन काल से हम सत्य, अहिंसा और शांति के पुजारी रहे हैं। यह हमारी खामी भी रही है और खूबी भी। खामी इसलिए कि इस रीति-नीति को विदेशी आक्रांताओं ने हमारी कमजोरी समझ आक्रमण किया और हम पर राज किया। खूबी इसलिए कि वैश्विक पटल पर हमारी इस नीति को हमेशा सराहा गया। सम्राट अशोक, गौतम बुद्ध और महात्मा गांधी सरीखे महापुरूषों के विचार यहां के हर आम आदमी ने आत्मसात किए हैं। संयुक्त राष्ट्र में किसी मसले के हल के लिए हमने शांति पर जोर दिया। लड़ाकू पड़ोस के बावजूद हमने कभी किसी पर आक्रमण करके कोई जंग नहीं छेड़ी।
सत्य और अहिंसा की राह पर चलकर हमने आजादी हासिल की, फिर आज ऐसा क्या हो गया कि युवा सड़कों पर उबल रहे हैं। अपनी बात कहने के लिए उन्हें हिंसा का सहारा लेना पड़ रहा है जबकि अभी इसी देश में शांतिपूर्वक हुए कई बड़े आंदोलन न केवल अपने मकसद में कामयाब रहे बल्कि आम लोगों का दिल भी जीता। लोगों ने उन आंदोलनों से खुद को जुड़ा महसूस किया। उग्र आंदोलनों की पृष्ठभूमि में कहीं न कहीं धर्म, जाति और समुदाय में बंटा मतदाता है जो राजनेताओं की कठपुतली बना हुआ है। ऐसे में इन आंदोलनों के पीछे के सच की पड़ताल आज बड़ा मुद्दा है।
आरक्षण पाने के लिए जाट समुदाय ने फरवरी, 2016 में आंदोलन किया, जिसमें दस दिन तक राज्य में दंगे और हिंसा हुई। हरियाणा, दिल्ली व उत्तर प्रदेश के कुछ क्षेत्रों में कुल 340 खरब रूपए का नुकसान हुआ। रेलवे को तकरीबन 60 करोड़ का घाटा हुआ। करीब ढाई दर्जन लोग मारे गए। 2008 में गुर्जर समुदाय ने पिछड़े वर्ग की बजाय खुद को अनुसूचित जनजाति में शामिल किए जाने की मांग को लेकर आंदोलन शुरू किया। 23 मई को पुलिस द्वारा प्रदर्शनकारियों पर गोली चलाने के बाद आंदोलन हिंसा में बदल गया। प्रदर्शनकारियों ने एक पुलिसवाले को मार डाला। पुलिस की जवाबी कार्रवाई में 15 लोग मारे गए। जून तक मरने वालों की संख्या 37 हो गई।
अगस्त, 2015 में गुजरात के पाटीदार समुदाय ने आरक्षण पाने के लिए आंदोलन किया। 25 अगस्त को अहमदाबाद में हुए सबसे बड़े प्रदर्शन में दंगे भड़कने से कई शहरों व गांवों में जीवन ठप्प पड़ गया। 28 अगस्त को मामला कुछ शांत हुआ लेकिन 19 सितंबर को फिर हिंसा भड़क गई। दंगों में अब तक कई वाहनों समेत 200 से अधिक बसें जल चुकी थीं। अकेले अहमदाबाद में 12 करोड़ रूपए की संपत्ति का नुकसान हुआ। वाहन जलने व तोड़-फोड़ में पुलिस विभाग को 200 करोड़ रूपए का नुकसान हुआ। 14 लोगों की मौत हुई। 27 नागरिक और 203 पुलिसवाले घायल हुए।
फरवरी, 2016 में आंध्र प्रदेश के कापू समुदाय ने पिछड़े वर्ग में शामिल किए जाने के लिए आंदोलन छेड़ दिया। लोगों ने रेलवे लाइन और राष्ट्रीय मार्गों को अवरूद्ध कर दिया। रत्नाचल एक्सप्रेस की कई बोगियों में आग लगा दी और आरपीएफ जवानों पर हमला किया। 2017 की शुरूआत से ही राजस्थान की करणी सेना ने फिल्म पद्मावती के विरोध में प्रदर्शन करना शुरू किया। जनवरी में फिल्म का सेट तोड़ दिया गया। चित्तौड़ के किले में तोड़-फोड़ की गई। नवंबर तक इसने फिल्म के प्रति समर्थन जाहिर किया लेकिन जनवरी, 2018 में विरोध में हिंसात्मक गतिविधियों को अंजाम देना शुरू किया।
अगस्त, 2017 में हरियाणा के पंचकूला में डेरा सच्चा सौदा के प्रमुख गुरमीत राम रहीम सिंह की गिरफ्तारी के बाद उपजी हिंसा में 29 लोगों की मौत हुई और 200 से अधिक घायल हुए। 2 अप्रैल को अनुसूचित जाति एवं जनजाति के मामले में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिए गए फैसले के विरोध में जिस तरह भारत बंद का आयोजन किया गया और भीड़ ने आगजनी तथा तोडफ़ोड़ को अंजाम दिया, उसने यह अहसास करा दिया कि हमारा संसदीय लोकतंत्र तेजी से लाठीतंत्र की ओर अग्रसर होता जा रहा है।
समाज में जब-तब नजर आने वाली हिंसा हमें डरा रही है। पिछले कुछ वर्षों के दरमियान विरोध के तरीके उग्र हो गए हैं। लग रहा है कि तोडफ़ोड़, आगजनी और मौतें ही आंदोलनों का हिस्सा हो गई हैं। यह हिंसा हमारी नींद उड़ाकर रख देती है मगर सतह पर उभरने वाली इस हिंसा की पड़ताल करने से पहले हमें भारतीय समाज को समझना होगा। महात्मा गांधी ने भारत की स्वतंत्रता के लिए कई आंदोलनों को नेतृत्व प्रदान किया। किसानों के अधिकारों को सुनिश्चित करने तथा नील की खेती के बाध्यकारी पश्चिम देशों के शोषण की प्रवृत्ति के खिलाफ चंपारण सत्याग्रह इसका एक अनूठा उदाहरण है। लाखों किसानों के समर्थन के बावजूद न्यायालय में उपस्थित होकर गांधीजी ने संवाद बनाया और सरकार को झुकना पड़ा।
लोकतंत्र में सभी को सम्मान एवं न्याय के साथ जीने का अधिकार है और इस अधिकार की रक्षा तभी हो सकती है जब हम शासकों की मनमानी पर रोक लगाने के लिए स्थापित न्यायपालिका में भरोसा रखें। उसके साथ असहमति की स्थिति में विधि सम्मत तरीके से व्यवहार करें। केवल शक्ति प्रदर्शन कर न्यायपालिका को ठेंगा दिखाने का कार्य तो हमें उस जमाने में ले जाएगा जब जिसकी लाठी उसकी भैंस वाली बात चलती थी। ऐसा लाठीतंत्र किसी के लिए भी हितकर नहीं हो सकता। मानव इतिहास इसका साक्षी है।
अहिंसक आंदोलन की प्रासंगिकता पूर्व में थी, आज भी है और आगे भी रहेगी। भारत जैसे देश के लोग हिंसक आंदोलनों को कभी भी स्वीकार नहीं कर सकते। आम जनता को मिले वोट के अधिकार ने अपेक्षा पर खरा न उतरने वाली सरकार को सत्ता से बाहर करने का जो औजार दिया है वह हजारों हिंसक आंदोलनों से कहीं अधिक प्रभावपूर्ण है।
- नरेंद्र देवांगन

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