सज गई हैं शिक्षा की दुकानें

सज गई हैं शिक्षा की दुकानें

महानगरों में बच्चों का स्कूल में दाखिला किसी भी सूरत में किसी आपातकालीन स्थिति सरीखा, किसी बड़ी प्रतियोगिता परीक्षा की तरह और उससे भी बढ़ कर अपने स्टेटस में एक विशेष तमगा लगाने जैसा कुछ कुछ हो गया है।
इस समय पर स्कूल प्रशासनों की मनमानी अपने चरम पर होती है। स्थिति इतनी विकट होती है कि सरकार, प्रशासन, शिक्षा मंत्रालय द्वारा समय पर कई कड़े नियम कानूनों की दुहाई दिए जाने के और बाद में कार्यवाही की धमकी के बावजूद भी समय समय पर न्यायपालिका को भी हस्तक्षेप करना पड़ता है।
उच्च शिक्षा का अत्यधिक महंगा होते जाना तो फिर भी तर्कसंगत लग सकता है किंतु यदि प्राथमिक कक्षाओं में, नर्सरी में दाखिले के लिए यदि लाखों की संख्या में फार्म की खरीद फरोख्त हो, जटिल स्क्रूटनाईजेशन के बाद साक्षात्कार आदि जैसे प्रक्रिया को रखा जाए और उसके विकल्प के रूप में, विद्यालय विकास शुल्क के नाम पर सीधे सीधे पैसे की उगाही की जाए तो हालिया का चलन देखते हुए वही परिणाम निकलता है जो इन दिनों देखने में आ रहा है।
सरकार से गरीब बच्चों के लिए विद्यालय में एक निश्चित स्थान देने के शपथपत्र को दाखिल करने के बाद महंगी जमीनों को कौडिय़ों के भाव हासिल करने के बाद जब वहां विद्यालय तैयार होते हैं तो आश्चर्यजनक रूप से उनमें शिक्षा का वर्गीकरण वातानुकूलित और साधारण कक्षाओं के आधार पर शुरू होता है।
ये स्कूल प्रशासन पैसों की लूट में इतने अंधे हो चुके हैं कि बार बार न सिर्फ शिक्षा से संबद्ध कानूनों की अवहेलना करते हैं बल्कि कई बार अपराध की श्रेणी में जा पहुंचते हैं।
एक और बड़ी कमी रही सरकार द्वारा जनसंख्या के अनुपात में शैक्षिक संस्थाओं की स्थापना नहीं कर पाने की विवशता या फिर शायद एक अघोषित नीति के तहत जानबूझ कर निजी क्षेत्रों समूहों को ये मौका दिया जा रहा है।
आज सरकारी विद्यालय हों या सरकारी अस्पताल, उनके लिए सबके मन में एक ही छवि है कि ये सिर्फ गरीब, पिछड़े तबकों के लिए ही हैं। काश ऐसा हो कि सभी सरकारी अधिकारियों, कर्मचारियों, सभी नेता मंत्रियों के लिए यह अनिवार्य कर दिया जाए कि उनकी शिक्षा और इलाज सरकारी संस्थानों में ही किया जाए तो सोचिए कि स्थिति कैसी हो जाएगी या शायद बिना कुछ कहे बहुत कुछ अपने आप ही बदल जाएगा।
- अजय कुमार झा

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