मुद्दा : साध्वी बनाने का औचित्य

मुद्दा : साध्वी बनाने का औचित्य

एक-डेढ़ दशक पूर्व की बात है। एक टीवी चैनल पर एक समाचार दिखलाया जा रहा था। मध्य प्रदेश के एक शहर (शायद इंदौर) में एक साध्वी ने अपने आत्मबल से आत्मोत्सर्ग कर लिया। रिपोर्टर चीख-चीखकर साध्वी के आत्मोत्सर्ग को महिमामंडित करने में लगा हुआ था। कैमरा उस कमरे पर केंद्रित था जहाँ साध्वी ने तथाकथित आत्मोत्सर्ग किया था। जिस कमरे में साध्वी ने तथाकथित आत्मोत्सर्ग किया था वहाँ एक चटाई पर दो मुखी राख बड़े करीने से सजी हुई थी।
पूरा शहर उस आश्रम पर एकत्रित था और आत्मोत्सर्ग करने वाली साध्वी के कमरे के दरवाज़े पर उसके अस्थि अथवा अस्थिरहित अवशेषों के दर्शन करने के लिए लाइन लगाए खड़ा था। लाइन धीरे-धीरे सरक रही थी। जो साध्वी के कमरे के सामने आ जाता, अपने आपको सौभाग्यशाली मानता और उस दो मुखी राख के सामने श्रद्धा से भावविभोर होकर नतमस्तक हो जाता। रिपोर्टर चीख रहा था, 'कलियुग का अद्वितीय चमत्कार।' नए-नए विशेषण खोज रहा था। जो मुँह में आए बके जा रहा था।
मैंने दूसरी या तीसरी बार इसी समाचार को देखा तो समाचार व रिपोर्टिंग की यथार्थता पर संदेह हुआ। आत्मोत्सर्ग शब्द पर विचार किया। साध्वी ने आत्मोत्सर्ग कैसे किया? क्यों किया? क्या ऐसा करना संभव है? जहाँ तक लोगों का प्रश्न है, लोग तो कहीं पर भी लाइनें लगाकर खड़े हो सकते हैं। बस कोई लाइनें लगवाने वाला चाहिए। कोई उन्हें बेवकूफ बनाने वाला चाहिए। कोई सब्ज़बाग़ दिखलाने वाला चाहिए। जि़ंदगी भर की उपलब्धि, प्राप्ति अथवा बचत उसके हवाले करते देर नहीं लगाते। या तो कॉमनसेंस की कमी है या फिर कॉमनसेंस का इस्तेमाल नहीं करना चाहते या फिर करने नहीं दिया जाता।
साध्वी का महिमामंडन जारी था। वह एक युवा साध्वी थी। अभी अपनी किशोरावस्था को पार ही किया था उसने। एक अल्पवय युवा साध्वी का त्याग अथवा आत्मोत्सर्ग तो और भी अधिक महत्त्वपूर्ण हो जाता है लेकिन इसमें त्याग की कौन सी बात थी? बिना बात जान देने का क्या औचित्य हो सकता है? क्या इस आत्मोत्सर्ग से कोई क्रांति होने जा रही थी? क्या इस तथाकथित त्याग के पीछे कोई महान उद्देश्य था अथवा यह किसी विवशता के कारण किया गया शरीरांत था। यदि कोई पीडि़ता अथवा पीडि़त आत्मदाह करता है तो यह अत्याचार की पराकाष्ठा है। इसमें त्याग अथवा आत्मोत्सर्ग जैसा कुछ भी नहीं है और यदि कोई आतंकवाद, धर्मांधता अथवा समाज की ग़लत नीतियों का शिकार होता है तो वो भी त्याग अथवा आत्मोत्सर्ग नहीं कहा जा सकता।
मुझे तो लगा ही नहीं कि यहाँ किसी ने आत्मोत्सर्ग जैसा कोई कार्य किया है। एक साफ-सुथरी चटाई पर करीने से सजी दो मुखी राख। आदमी अपने आपको समाप्त कर ले तो भी उसके भौतिक अवशेषों को तो ठिकाने लगाना ही पड़ता है। जलने के कोई चिह्न भी नहीं दिखलाई पड़ रहे थे। सब कुछ साफ-सुथरा और व्यवस्थित दिख रहा था। क्या दुनिया में पहले भी कहीं ऐसा चमत्कार घटित हुआ है? यदि नहीं तो आज ही कैसे? यदि कोई चमत्कार ही हुआ था तो फिर दो मुखी राख भी क्यों? कबीर का शव जैसे फूलों में परिवर्तित कर दिया था उसके शव को भी फूलों में बदल देते। राख की बजाय कुछ फूल ही चटाई पर रखवा देते। फिर इस अल्पवय युवा साध्वी के तथाकथित त्याग अथवा आत्मोत्सर्ग से देश, समाज अथवा धर्म को क्या लाभ होने वाला था?
बहुत सारे प्रश्न थे जो इस महामंडन की रिपोर्टिंग पर प्रश्न चिह्न लगा रहे थे। बहुत सारे प्रश्न उठते हैं। धर्म लोगों को मुक्त करता है, प्रफुल्लित करता है, उनके अज्ञान को हरकर उन्हें वास्तव में चेतन बनाता है। धर्म जीवन जीने की कला सिखाता है। वो कैसे धर्म हैं जो लोगों को बाँधते हैं? उनका शोषण करते हैं? उनका स्वाभाविक विकास अवरुद्ध करके उन्हें रूढिय़ों में जकड़ते हैं? उन्हें ग़लत क़दम उठाने के लिए व मर्यादा तोडऩे के लिए विवश करते हैं? वो कैसे धर्म हैं जहाँ तथाकथित धर्माचार्यों की सेवा के लिए साध्वियाँ रखने का विधान है? साध्वियों के तौर पर केवल सुंदर, सलोनी, अल्पवय कुँवारी कन्याएँ रखने का क्या औचित्य हो सकता है? अरब देशों के धनाढ्य अय्याश शेखों और हमारे धर्माचार्यों में क्या अंतर रह जाता है?
मैंने उसी समय कहा कि बेचारी लड़की यहाँ के बंधन से मुक्त होकर कहीं अन्यत्र चली गई होगी और उसी को छुपाने के लिए यह नाटक रचा जा रहा है। कुछ घंटों में स्थिति स्पष्ट हो गई। युवा साध्वी वहीं काम करने वाले एक लड़के के साथ भाग गई थी। मीडिया यही कह रहा था कि भाग गई। वही मीडिया और समाज जो थोड़ी देर पहले उसकी मृत्यु को महिमामंडित कर रहा था, अब उसी पर लांछन लगा रहा था। यहाँ भाग जाना कहना बड़ा ही कठोर लगता है। क्या अन्यत्र चली गई, कहना उचित नहीं होगा लेकिन उसे जाने कौन देता? उसके लिए तो भागना ही एकमात्र विकल्प हो सकता था। वह तो धर्म-अध्यात्म व परंपरा के नाम पर एक बंदिनी का जीवन व्यतीत करने को अभिशप्त थी। उसके साथ कोई चमत्कार नहीं हो सकता था। उसे अपनी मुक्ति के लिए स्वयं चमत्कार उत्पन्न करना था। उसे बंधनमुक्ति का अवसर मिला तो वो चली गई। ज़ुल्म जब बढ़ता है तो मिट जाता है।
उसे चले जाने का हक़ है। वो जब चाहे चली जाए। उसे गुप्त रूप से भागने की भी ज़रूरत नहीं है। यदि हक़ नहीं है तो समाज को नहीं है धर्म-अध्यात्म व परंपरा के नाम पर उसे बंदिनी बनाने का। माता-पिता को किसने ये हक़ दिया है कि वो अपनी किशोर अथवा युवा बच्ची को साध्वी बनाकर उससे स्वाभाविक जीवन जीने का हक़ छीन ले? यह अंधविश्वास, पाखण्ड व रूढि़ है कि इससे परिवार या बच्चे का कल्याण होगा अथवा धर्म का उत्थान होगा। धर्म-अध्यात्म व परंपरा के नाम पर बच्चियों के साथ ये सरासर अत्याचार है। अस्वाभाविक ही नहीं, अमानवीय कृत्य है। साधु-साध्वी बनना किसी का स्वयं का निर्णय हो सकता है लेकिन अन्य कोई चाहे वे माता-पिता ही क्यों न हों किसी को साधु-साध्वी बनने के लिए विवश करें, किसी भी तरह से उचित नहीं कहा जा सकता। इस दिशा में किसी को प्रेरित करना भी अनैतिक है, अपराध है।
कौन युवा है जो अपने यौवन का आनंद उठाना नहीं चाहेगा? यह उसकी नैसर्गिक आवश्यकता है। इसमें बाधा उत्पन्न करना अमानवीय ही नहीं अपराध है। ऐसे में कोई विद्रोह करे अथवा अनैतिकता पर उतर आए, अस्वाभाविक नहीं। इसके लिए माता-पिता, समाज, संबंधित धर्म व वर्तमान कानून-व्यवस्था भी पूर्णत: दोषी है। धर्म के नाम पर यह सब बंद होना चाहिए। यह समाज के लिए घातक है। यह विकृतियों को जन्म देता है। यह धर्म के उत्थान नहीं, पतन का कारण बनता है। ये हमारी सड़ी-गली धार्मिक-आध्यात्मिक व्यवस्था का कमाल है जो असंख्य राम रहीम उत्पन्न कर रही है। इसी व्यवस्था का शिकार होकर असंख्य भोलीभाली युवतियों को हनीप्रीत बनने के लिए विवश होना पड़ रहा है।
हनीप्रीत कानून की दोषी हो सकती है लेकिन उसे इस अवस्था में पहुँचाने का जि़म्मेदार कौन है? एक लंपट बाबा के चंगुल में क्या वो ख़ुद आ के फँस गई? क्या उसके अपनों की अंधभक्ति व यथार्थ से अनभिज्ञ बने रहने का नाटक इसके लिए उत्तरदायी नहीं? द्रौपदी से लेकर हनीप्रीत तक सभी की एक ही कहानी है। सभी इस समाज के छल व पाखण्ड का शिकार हैं। इस व्यवस्था में फ़ौरन बदलाव की ज़रूरत है।
- सीताराम गुप्ता

Share it
Share it
Share it
Top