व्यंग्य: पॉलिटिक्स पुराण

व्यंग्य: पॉलिटिक्स पुराण

आज सारा देश पॉलिटिक्स में जुटा है। बच्चे-बूढ़े-जवान, कमजोर- बलवान सारे पॉलिटिक्स कर रहे हैं। पॉलिटिक्स से कोई अछूता नहीं बचा है। जहां भी जाओ, पॉलिटिक्स पहले ही पहुंच जाती है। कल राजनीति थी। आज सर्वत्र पॉलिटिक्स है। राजनीति हर कोई नहीं कर सकता। राजनीति के लिए राजा होना जरूरी है और उसके पास राजपाट होना चाहिए। पॉलिटिक्स कोई भी कर सकता है। जिसके पास पोल हो, स्टिक हो, वह पॉलिटिक्स कर सकता है।
पॉलिटिक्स एक खिलौना है, चाहे तो खेलो या फिर तोड़ो। पॉलिटिक्स का चिराग जिसके हाथ एक बार लग गया तो समझो वह प्रकाशमय हो गया। पॉलिटिक्स करने के लिए पोलिटिकल साइंस जानने की जरूरत नहीं है। पालिटिकल साइंस तो एक किताबी विषय है जो परीक्षा में उत्तीर्ण होने के लिए पाठ्यक्रम में रखा गया है। इसे पढ़कर आप अच्छे पंडित हो सकते हैं, बढिय़ा नौकरी पा सकते हैं परंतु पॉलिटिक्स नहीं कर सकते और न पोलिटिशियन बन सकते हैं।
पॉलिटिक्स के पोलिटिशियन बनने के लिए पॉलिटिक्स के लिए पोषक खास किस्मों के कीटाणुओं को शरीर में घुसेडऩा होगा। रिश्वत-काण्ड करना होगा। सच से भी भारी चतुराई भरा झूठ बोलना होगा। प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष गुनाह करना होगा। गुनहगारों से रू-ब-रू होना होगा। नकली मुस्कान चिपकाने, झूठे वादे करने, बयान से मुकरने के हुनर सीखने होंगे।
पॉलिटिक्स की कोई दुहाई देता है तो कोई बुराई करता है। कोई इसे बला मानता है तो कोई सखा मानता है। इसमें कोई जमता है, कोई बहता है, कोई स्थिर रहता है। कोई ताली लेता है तो कोई गाली। पॉलिटिक्स में कांटे से कीमत लगाई जाती है। फूलों को कांटे से तोला जाता है।
धोती, कुरता, पाजामा, जैकेट, टोपी, फुलपैन्ट, बंद गले का कोट, शेरवानी, चप्पल जूता कुछ भी पहनकर पॉलिटिक्स की जा सकती है। नौकरी में एक बार घुसकर आदमी रिटायर हो जाता है परंतु पॉलिटिक्स में घुसना जैसे मुश्किल है वैसे निकलना भी आसान नहीं है।
एक बार पॉलिटिक्स में प्रवेश पाने वाले में कुछ इच्छायें उत्पन्न हो जाती हैं। यहां आकर सारी इच्छाओं को संवारा जा सकता है। पॉलिटिक्स में हर कोण से आशा की किरण दिखाई देती हैं। आज हर कोई पॉलिटिशियन बनना चाहता है जिससे अनंत खुशियां ही खुशियां मिल सकें। आज सभी पॉलिटिक्स के मारे मिलते हैं। यह घुलनशील पदार्थ की तरह सभी के जीवन में घुल गया है। पॉलिटिक्स में आकर उठाईगिरे, डाकू, मवाली सब साफ धुले हुए समाजसेवक बन जाते हैं। इसके अलावा अन्य मार्ग नहीं है। इसका असर बढ़ता जा रहा है। असर बढऩे से यह हर जगह इतरा रहा है। सरकारी और गैर सरकारी दफ्तरों में तो पॉलिटिक्स है ही परंतु आज अत्यावश्यक सेवा स्वास्थ्य विभागों में भी डॉक्टर्स और नर्स की पॉलिटिक्स, विद्या मंदिरों में विद्यार्थियों और अधिकारियों की पॉलिटिक्स, नगर परिषद में नगर परिषद प्रधान और नगर सेवकों की पॉलिटिक्स है।
पॉलिटिक्स ने कमाल कर रखा है। उसका सैलाब आ चुका है। यह सैलाब हर घर में घुस रहा है, अत: मेरे ख्याल से पॉलिटिक्स की आज मरम्मत और धुलाई की जरूरत है।
- 'मुनिराज' हरिशंकर जोशी

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