मुद्दा: नल से दूर होता जल और हमारी लापरवाही

मुद्दा: नल से दूर होता जल और हमारी लापरवाही

गत मास विश्व जल दिवस मनाया गया। जिस जल के बिना एक दिन भी रहना मुश्किल है, उसके लिए वर्ष में केवल एक दिन होना सवाल खड़े करता है क्योंकि विश्व बहुत तेजी से डे जीरो की ओर बढ़ रहा है। डे जीरो का मतलब है- वह दिन जब नल से जल आना बंद हो जाएगा। 'डे जीरो' कोरी कल्पना नहीं है। इन दिनों विश्व के सबसे खूबसूरत नगरों में शामिल केप टाउन में पानी के लिए हाहाकार मचा हुआ है। चालीस लाख की आबादी वाले इस नगर में पानी के बंटवारे के लिए सड़कों पर सेना उतारनी पड़ी है। वहां किसी भी समय जीरो डे यानी पानी बिलकुल खत्म घोषित हो सकता है।
केप टाउन ही क्यों, हमारे अपने देश में भी पेयजल की स्थिति चिंता जनक है। गत वर्ष महाराष्ट्र के लाटूर में बहुत भयावह स्थिति रही। वहां दूसरे राज्यों से रेल टेंकर से पेयजल भेजा जाता रहा है। अनेक राज्यों में नदी जल बंटवारे पर तीखा विवाद है। भूजल लगातार रसातल की ओर जा रहा है। जल संरक्षण की केवल रस्म अदायगी ही की जा रही है। पुराने तालाब, बावड़ी, सरोवर अवैध कब्जों की चपेट में हैं। देश की राजधानी में पिछले मास केवल एक बाल्टी पानी के लिए एक बुजुर्ग की पीट-पीटकर जान ले ली गई। बहुत संभव है मुफ्त पानी के नारे वाली दिल्ली में पानी के बदले खून बहने पर राजनीति गर्माये लेकिन समाधान की बात फिर भी सामने आने वाली नहीं है क्योंकि सही समाधान वोट बैंक की राजनीति के राह की रूकावट है।
संसाधनों पर बढ़ते दबाव के जिम्मेवार हम स्वयं हैं अत: समाधान के लिए तेजी से बढ़ती जनसंख्या पर रोक लगाना सबसे जरूरी है लेकिन इस दिशा में अब तक की कोई भी सरकार या राजनैतिक पार्टी तो दूर, सामाजिक- धार्मिक संगठन भी वातावरण बनाने के लिए तैयार नहीं हैं। विश्व के समक्ष उपस्थित जल संकट उस दार्शनिक को सही साबित करता है जिसने कहा था, 'हमें प्रकृति पर अपनी भौतिक विजय की आत्मप्रशंसा में विभोर नहीं होना चाहिए क्योंकि वह हर ऐसी विजय के लिये प्रतिशोध लेती है।' यह भी नहीं भूलना चाहिए कि अगले विश्वयुद्ध का कारण जल बनेगा, ऐसी भविष्यवाणी की जा चुकी है।
यह सत्य है कि पृथ्वी का दो तिहाई भाग पानी है लेकिन पीने योग्य मीठा जल मात्र 3 प्रतिशत है, शेष भाग खारा जल है। इसमें से भी मात्र एक प्रतिशत मीठे जल का ही वास्तव में हम उपयोग कर पाते हैं। धरती पर उपलब्ध यह संपूर्ण जल निर्दिष्ट जलचक्र में चक्कर लगाता रहता है। सामान्यत: मीठे जल का 52 प्रतिशत झीलों और तालाबों में, 38 प्रतिशत मृदा नाम, 8 प्रतिशत वाष्प, 1 प्रतिशत नदियों और 1 प्रतिशत वनस्पति में निहित है। जनसंख्या विस्फोट तथा बढ़ती हुई आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए अनियोजित औद्योगीकरण, जंगलों की अंधाधुंध कटाई, जल प्रदूषण और खपत बढऩे के कारण जलचक्र लगातार बिगड़ रहा है। प्रदूषण की समस्या न केवल सतह जल संसाधनों में है बल्कि भूजल में भी है। यह समस्या तब और बढ़ जाती है जब जमीन में खराब पदार्थों की डंपिंग होती है। खुले में शौच और गड्ढों में मल नष्ट करने से जमीन में बैक्टीरिया शामिल होते हैं। इससे भूजल में और ज्यादा प्रदूषित होता है।
जल संकट का एकमात्र कारण वर्षा की कमी नहीं है। हमारा जल प्रबंधन भी बहुत खराब है। हम मात्र 15 प्रतिशत जल का उपयोग कर पाते हैं, शेष जल बहकर समुद्र में चला जाता है। शहरों एवं उद्योगों से निकलने वाले अपशिष्ट पदार्थ नदियों के जल को प्रदूषित करके पीने योग्य नहीं रहने देते जबकि इजराइल जैसे देशों में वर्षा बहुत कम है लेकिन उनका जल प्रबंधन इतना कारगर है कि एक बूँद भी व्यर्थ नहीं होती। हालांकि मैंने पूर्वोत्तर राज्य मिजोरम के प्रवास के दौरान देखा कि वहां के अधिकांश घरों की ढलानदार छतों से वर्षा का पानी पाइपों के द्वारा टंकियों में इकटठा किया जाता है। यदि प्रकार से राजस्थान के कुछ क्षेत्रों में जल संग्रह की परम्परा है लेकिन देश के अन्य क्षेत्रों में जल संकट होते हुए भी जल संरक्षण की सोच फिलहाल विकसित नहीं हो सकी है जबकि जलपुरुष के नाम से विश्वविख्यात राजेन्द्र जी जैसे अनेक लोग इस दिशा में उल्लेखनीय कार्य कर रहे हैं। आवश्यकता है जीवनशैली में सुधार करने की।
यह ठीक है कि आज आधुनिक सुविधाओं के बिना जीना कठिन है। लेकिन वाशिंग मशीन में बड़े पैमाने पर बर्बाद होने वाले पानी का गाड़ी धुलाई, घर की सफाई अथवा फ्लश में उपयोग क्यों नहीं हो सकता? वाश बेंसन को सिस्टरन से क्यों नहीं जोड़ा जाना चाहिए? हम मात्र 5 प्रतिशत वर्षा जल का संग्रहण कर सके तो एक बिलियन लोगों को 100 लिटर पानी प्रति व्यक्ति प्रतिदिन मिल सकता है। इसलिए जल संरक्षण का संस्कार स्कूलों में दिया जाना चाहिए ताकि बचपन से ही जान सकें कि जल, जमीन और जंगल अभिन्न हैं और एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं। इन्हें एक साथ देखने, समझने और प्रबंधन करने की आवश्कता है। संयुक्त राष्ट्र के जल उपलब्धता मानकों के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति को प्रतिदिन न्यूनतम 50 लिटर जल मिलना चाहिए लेकिन सब -सहारा क्षेत्रों जैसे कांगो, नामीबिया, मोजांबिक, घाना आदि में प्रति व्यक्ति एक महीने में मात्र 100 लिटर जल भी उपलब्ध नहीं हो पा रहा है। यदि हम अब भी नहीं चेते तो बहुत शीघ्र हमारा नाम भी इस सूची में शामिल हो सकता है। विचार करना होगा कि जब हम जल के बिना रह ही नहीं सकते तो जल संरक्षण हमारी प्राथमिकता कैसे बने। जब तक जल संरक्षण सांस लेने की तरह हमारा स्वाभाविक कर्म नहीं बनेगा, खतरा लगातार करीब आता रहेगा। आखिर 'पानी बिन सब सून' की चेतावनी न जाने कब से हमें लगातार चेता रही है।
यह सर्वविदित है कि पूरी दुनिया में मानव सभ्यता का विकास नदियों के किनारे ही हुआ। भारत की पहचान सिंधु घाटी सभ्यता है जो सिंधु नदी के किनारे विकसित हुई। भारतीय संस्कृति में जल को वरुण देव के रूप में पूजा जाता है। धार्मिक संस्कारों यथा देवाभिषेक, शुद्धिकरण, आचमन और अर्चन में जल की अनिवार्यता है। शरीर की पवित्रता के लिए जल-मार्जन के समय यह मंत्र पढ़ा जाता है- 'अपवित्र: पवित्रो वा सर्वावस्थं गतोऽपि वा' हमारे प्राचीन ग्रंथों में जल की महत्ता का वर्णन है। यजुर्वेद के 15वें और 36वें श्लोकों में ऋषिगण जल से प्रार्थना करते हैं कि जैसे माँ अपनी संतान को दूध पिलाती है वैसे ही, जल है और यह जल हम मानवों के लिये कल्याणतम रस है। अत: ईश्वर हमें जल अवश्य प्रदान करें। ऋग्वेद का एक मंत्र है- अप्सु अन्त: अमृतम् अप्सु भेषजम् अपाम् उत प्रशस्तये, देवा: भवत वाजिन:। जल में अमृत है, जल में औषधि है। हे ऋत्विज्जनों, ऐसे श्रेष्ठ जल की प्रशंसा अर्थात् स्तुति करने में शीघ्रता बरतें।
- विनोद बब्बर

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