भारत की तालिबानी पंचायतें

भारत की तालिबानी पंचायतें

उत्तरप्रदेश के बुलन्दशहर में एक ऐसी घटना घटी हैं जिसने सोचने के लिये मजबूर कर दिया कि हमारे देश में तालिबान बेशक न हो लेकिन तालिबानी सोच के लोगों की संख्या बहुत ज्यादा है । अफगानिस्तान में तालिबान ने एक युवती को प्रेम प्रसंग के शक में कोड़े मारने की सजा दी थी जिसके कारण पूरे विश्व में उसे आलोचना का सामना करना पड़ा लेकिन हमारे ही देश में यूपी के जिले बुलन्दशहर में महिला को पंचायत के फैसले पर उसका ही पति चमड़े की बैल्ट से घंटों पीटता रहा और इस पिटाई के कारण महिला अचेत हो गई लेकिन पीटने वाले और तमाशबीन लोगों को कोई रहम नहीं आया ।
महिला पर बदचलनी का आरोप लगाया गया और पंचायत ने यह तालिबानी फैसला सुना दिया । इस घटना के लिये जिम्मेदार पंचायत के पूर्व प्रधान और उसके बेटे तथा महिला के पति सहित कई लोगों को पुलिस ने हिरासत में ले लिया है । पुलिस उन लोगों की तलाश भी कर रही है जो इस सारी घटना के समय तमाशबीन बने हुए थे । एक महिला चीखती रहती, चिल्लाती रही लेकिन तालिबानी सोच के लोग मजे लेकर तमाशा देखते रहे । तालिबान बेशक इस्लामिक सोच का प्रतीक है लेकिन इसका धर्म से कोई सम्बन्ध नहीं है क्योंकि जैसी सोच तालिबान वाले रखते हैं उसी सोच के लोग हर धर्म में मौजूद हैं । जब किसी पर जुल्म ढाया जा रहा हो तो उसका तमाशा देखने वाले लोग भी कहीं न कहीं उतने ही बड़े अपराधी होते हैं जितना बड़ा अपराधी उस जुल्म को करने वाला होता है।
अगर कोई आतंकवादी, गुंडा, सैनिक, सिपाही या ताकतवर इन्सान जुल्म कर रहा हो और देखने वाला कुछ न करे तो उसे उसके डर से भी जोड़कर देखा जा सकता है लेकिन जब जुल्म करने वाला एक आम इन्सान हो तो देखने वाले उसके अपराध में बराबर के भागीदार माने जायेंगे और यही कारण है कि पुलिस उन लोगों की तलाश कर रही है जो तमाशबीन बने ये सब देख रहे थे । वास्तव में पुलिस एक वायरल वीडियो के आधार पर अपनी कार्यवाही कर रही है और उस वीडियो में दिखने वाले हर व्यक्ति की उसे तलाश है।
अगर यह केवल एक घटना होती तो कोई बड़ी बात नहीं थी लेकिन हर रोज ऐसी घटनायें कहीं न कहीं देश में घट रही होती हैं लेकिन मोबाइल कैमरों में बनाई गए वीडियो के कारण कुछ घटनायें लोगों तक पहुँच ही जाती हैं । कितने ही ऐसे वीडियो सामने आते रहते हैं जिसमें इन्सानियत रो रही होती है । बच्चों, महिलाओं और कमजोर लोगों पर कहर बरपाते लोग इन वीडियो में दिख जाते हैं। इसी तालिबानी सोच के लोग नैतिकता के नाम पर सुनसान इलाकों में पकड़े गये प्रेमी जोड़ों के साथ बेहद क्रूरता के साथ पेश आते हैं। ऐसे लगता है कि जैसे नैतिकता का ठेका इन लोगों ने ही ले रखा है जबकि ऐसे ही लोग न केवल प्रेमी जोड़ों को पीटते हैं बल्कि मौका मिलते ही लड़कियों से छेड़छाड़ भी करते हैं लेकिन समाज के डर से प्रेमी जोड़े किसी तरह से अपना पीछा छुड़ाकर भाग जाते हैं और चुप रहते हैं। आपको यू टयूब पर ऐसे सैंकड़ों वीडियो मिल जायेंगे जिसमें कमजोर और
निर्दोष लोगों की बेरहमी से पिटाई की जा रही हो।
जब ऐसे वीडियो सोशल मीडिया में वायरल होते हैं तो ज्यादातर लोग इनकी आलोचना करते हैं लेकिन वहाँ भी ऐसे लोगों की संख्या कम नहीं हैं जो मोरल पुलिसिंग की घटनाओं को सबक सिखाने के नाम पर अच्छा समझते हैं । जिन लोगों पर इल्जाम लगाये जाते हैं वो सच हों, ऐसा जरूरी नहीं है केवल शक के आधार पर ही कितने युवक-युवतियाँ ऐसी दरिंदगियों के शिकार होते हैं । किसी प्रेमी जोड़े के प्रेम करने पर पीटना उचित नहीं है परन्तु प्रेमी जोड़ा नाबालिग है तो उन्हें समझाना उचित माना जा सकता है ।
नारी उत्पीडऩ की घटनायें समाज में बढ़ती जा रही हैं क्योंकि नारी जागरण ने उन्हें अपने अधिकारों के लिये खड़ा होना सीखा दिया है लेकिन समाज इतनी जल्दी बदलने के लिये तैयार नहीं है । आज की नारी पति परमेश्वर की धारणा से बाहर आ चुकी है और जिस घर में डोली जाये, वहाँ से अर्थी उठ ये जरूरी नहीं समझती। नारी के इस बदले हुए रूप के साथ पुरूष सामंजस्य नहीं बिठा पा रहा है और वो आज भी नारी को अपने पैर की जूती समझता है । दरअसल असली समस्या यह है कि हमारा संविधान और कानून बेशक नारी समानता की बात करते हो लेकिन वो नौकरशाही जिसके हाथ में व्यवस्था की असली चाबी है, वो आज भी औरत को पैर की जूती समझने वाले लोगों से भरी पड़ी है । आप कितने भी कानून बनाते रहिये लेकिन उन कानूनों को लागू करने वाले लोग अगर सही नहीं होंगे तो कुछ भी बदलाव होने वाला नहीं है ।
हमारे देश की जातिवादी सोच हमें दिखाती है कि हम तालिबानी सोच से ज्यादा दूर नहीं हैं जबकि मेरा मानना तो यह भी है कि हम तो तालिबानी सोच से भी आगे जाने वाले लोग हैं । जैसे दलित उत्पीडऩ जैसा सख्त कानून दलितों को न्याय नहीं दे पाता, वैसे ही महिला उत्पीडऩ कानून सख्त होने से कुछ होने वाला नहीं है क्योंकि हमारे समाज की मानसिकता में बदलाव बहुत धीरे-धीरे हो रहा है । कामकाजी महिलायें हमारी महिला शक्ति के उदय का प्रतीक हैं लेकिन वास्तव में उनमें ज्यादातर घर और बाहर दोनों जगहों पर पिस रही है क्योंकि कामकाजी होने के बावजूद उन्हें घरेलू कार्यों में पति का साथ नहीं मिलता है । तालिबान वाले नहीं चाहते कि महिलायें शिक्षित हों क्योंकि वो मानते हैं कि महिलाओं का काम केवल बच्चे पैदा करना तथा पति और परिवार को खुश रखना है और वो समझते हैं कि इसके लिये शिक्षा की कोई जरूरत नहीं है । यहीं कुछ लोग चाहते हैं कि महिलाएं शिक्षित हों ताकि वे घर और बाहर दोनों जगहों पर पिसती रहें ।
ईरान में महिलायें विद्रोह कर रही हैं और सऊदी अरब उन्हें खुली हवा में सांस लेने का मौका देने पर विवश हो रहा है और हम जानते हैं कि ये दोनों देश महिलाओं के लिये किसी नरक से कम नहीं हैं लेकिन बदलाव वहाँ भी हो रहा है । कुछ क्षेत्रों को छोड़कर हमारी पंचायतों विशेष रूप से खाप पंचायतों के फैसले किसी भी तरह से तालिबान से कम भयानक नहीं होते हैं। ये पंचायतें प्रेमी जोड़ों को कैसी सजायें सुनाती हैं इसका विवरण देने की जरूरत नहीं है क्योंकि रोज ही ऐसी खबरें पढऩे को मिलती रहती हैं । शायद यही सोचकर बाबा साहब चाहते थे कि दलित गांवों से उजड़कर शहरों में बसें ताकि उनका उत्पीडऩ कम हो क्योंकि यही सच है कि तालिबानी सोच के लोग गाँवों में ज्यादा हैं और वहां महिलाओं, दलितों पिछड़ों और गरीबों के साथ दबंग लोग बड़ी बेरहमी से पेश आते हैं ।
माननीय उच्चतम न्यायालय इस सम्बन्ध में कई बार चिन्ता व्यक्त कर चुका है लेकिन वोटबैंक की राजनीति करने वाले राजनीतिक दलों पर इसका कोई असर नहीं पड़ता। हमें यह नहीं भूलना चाहिये कि तालिबान या आईएस खतरनाक हैं और इन्हें खत्म किया जा सकता है लेकिन इनकी सोच खत्म करना इतना आसान नहीं होने वाला है । हमें भी यह ध्यान रखना होगा कि कुछ लोगों को सजा देने से कुछ होने वाला नहीं है बल्कि उस सोच को खत्म करना होगा जिसके कारण ऐसी घटनायें दिनोंदिन बढ़ती जा रही हैं ।
- सीमा पासी

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