राष्ट्ररंग: बांटने की एक और साजिश

राष्ट्ररंग: बांटने की एक और साजिश

कर्नाटक विधानसभा चुनाव के अवसर पर राजनैतिक लाभ की कामना से लिंगायत समुदाय को अलग धर्म का दर्जा देना अनेक प्रश्न उत्पन्न करता है। आमजन को भी विचार करना होगा कि राजनीति के लिए देश और समाज को बांटने की नीति कहां तक सहनीय है! अल्पसंख्यकवाद क्या है, तुच्छ लाभ के लिए स्वयं को मुख्य धारा से अलग करना उस समाज के दीर्घकालीन हितों के लिए कितना उचित है? इस संबंध में हमें स्मरण करना होगा कि कभी राम कृष्ण मिशन ने भी स्वयं के लिए अल्पसंख्यक दर्जे की मांग की थी। उनकी इस मांग को कोलकाता उच्च न्यायालय ने स्वीकार कर लिया था लेकिन देश के उच्चतम न्यायालय ने कोलकाता उच्च न्यायालय के निर्णय को पलटते हुए कहा था कि 'स्वामी रामकृष्ण परमहंस और उनके शिष्य स्वामी विवेकानंद ने जो उपदेश दिये हैं वे हिन्दू धर्म से भिन्न नहीं हैं, अत: उसे अलग धर्म माने जाने का कोई औचित्य नहीं है।'
अब प्रश्न यह कि लिंगायत कौन है। 12वीं शताब्दी में ब्राह्मण परिवार में जन्मे समाज सुधारक बसवन्ना ने जन्म आधारित व्यवस्था को अस्वीकार करते हुए कर्म आधारित व्यवस्था पर बल दिया। इस सम्प्रदाय के अनुयायी शिवलिंग के उपासक हैं जिसे अब शिवलिंग नहीं बल्कि 'अंडे के आकार की गेंदनुमा आकृति' बताया जा रहा है। लिंगायत की कुछ परम्पराओं के आधार पर भी उसे हिन्दू धर्म से अलग बताने वाले भूलते हैं कि परिवेश, जलवायु, परिस्थितियों और समाज सुधारकों के प्रभाव से हिन्दू समाज में लगभग हर जगह भिन्नता है। केवल बसवन्ना जी ही नहीं, अनेक समाज सुधारकों ने कर्म आधारित व्यवस्था का पक्ष लिया है। यदि इस आधार पर उन्हें अलग धर्म माना जाने की परम्परा शुरु कर दी गई तो हिन्दुस्तान में शायद ही कोई हिन्दू बचे। ऐसा कर क्या हम एक राष्ट्र की अवधारणा को कमजोर नहीं कर रहे हैं?
यह महत्त्वपूर्ण बिंदु है कि प्राचीन काल से जारी भारतीय परंपरा 'सर्व धर्म सदभाव' की है। फिर भी कुछ लोग समुदाय, संगठन अथवा राजनैतिक दल स्वयं के लिए अल्पसंख्यक दर्जे की मांग क्यों करते हैं। इतिहास साक्षी है कि कभी अंग्रेजों ने हम भारतीयों को विभाजित करने के लिए अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक का जिन्न खड़ा किया। 1891 की जनगणना से पूर्व अंग्रेजों ने तय किया कि मुस्लिम, ईसाई, सिख, बौद्ध, जैन, निचली जातियां, पहाड़ी व जनजातियों आदि को छोड़ जो बचेगा, वह हिन्दू के रूप में दर्ज होगा। अंग्रेजों की इस योजना के अन्तर्गत बंगाल का विभाजन किया गया जो कालान्तर में देश विभाजन तक पहुंचा। विभाजन के रूप में दुनिया का सबसे बड़ा नरसंहार झेलने के बावजूद स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भी इसका जारी रहना दुर्भाग्यपूर्ण है।
यहां यह स्पष्ट करना अनिवार्य है कि हमारे संविधान में अल्पसंख्यक शब्द का विवरण धारा 29 से लेकर 30 तक और 350ए से लेकर 350बी तक शामिल तो है लेकिन अल्पसंख्यक की कोई स्पष्ट परिभाषा नहीं है। इसीलिए राजनीतिक लाभ तथा कुछ समुदायों, सम्प्रदायों द्वारा विविध विशेषाधिकारों और सुविधाओं के लिए स्वयं को अल्पसंख्यक के रूप में पेश करने के लिए मनमानी परिभाषा का चलन है जो लगातार समाज के विभिन्न अंगों को मुख्यधारा से कटने के रूप में आज भी जारी है। यह दुर्भाग्य नहीं तो और क्या है कि बौद्ध, जैन, सिख समाज को अल्पसंख्यक दर्जा मिलने के बाद पूरे विश्व में हिंदुत्व की पताका फहराने वाले स्वामी दयानंद सरस्वती के अनुयायियों का एक समूह, भगवान परशुराम के वंशजों का एक समूह, रामकृष्ण मिशन के अनुयायियों के एक समूह के बाद लिंगायत व वीरशैव का एक समूह स्वयं के लिए अल्पसंख्यक दर्जे की मांग कर रहा है। यह रोचक एवं विरोधाभासी है कि श्री मनमोहन सिंह जी के नेतृत्व में जिस कांग्रेस की सरकार ने 2013 में लिंगायतों को अल्पसंख्यक दर्जा देने की मांग को अस्वीकार कर दिया था आज उसी कांग्रेस की कर्नाटक सरकार चंद वोटों के लालच में समाज को बांटने का काम कर रही है।
यह अकारण नहीं है कि कुछ समूह स्वयं को अल्पसंख्यक कहलाना चाहते हैं क्योंकि किसी भी सामान्य (गैरअल्पसंख्यक) शिक्षण संस्थान में 25 प्रतिशत स्थान नाममात्र के शुल्क पर अल्पसंख्यक वर्ग के लिए आरक्षित रखना अनिवार्य है जबकि अल्पसंख्यक को शिक्षण संस्थान खोलने के लिए सरकार से आर्थिक अनुुदान प्राप्त होता है। सामान्य शिक्षा संस्थानों में पढऩे वाले अल्पसंख्यक छात्रों को भी विशेष सहायता, अनुदान, सुविधाएं, फेलोशिप छात्रवृत्ति आदि प्रदान दी जाती है।
स्वतंत्रता के पश्चात लगातार अल्पसंख्यक होने का लाभ ले रहे लोग जम्मू कश्मीर सहित कुछ राज्यों में अल्पसंख्यक हिंदुओं को अल्पसंख्यक का दर्जा देने को भी तैयार नहीं। सदियों से कश्मीर के मूल निवासी हिन्दुओं को वहां खदेड़े जाने की व्यथा जगजाहिर है। आज जब जब उनकी वापसी की मांग उठती है तो वहां के बहुसंख्यक नेता इसका विरोध करते हैं।
यहां यह स्मरणीय है कि लिंगायत समुदाय पारंपरिक रूप से भाजपा का मजबूत वोटबैंक है। पिछले विधानसभा चुनाव में लिंगायत नेता येदियुरप्पा के भाजपा से अलग होने के कारण कांग्रेस को लाभ मिला था लेकिन इस बार येदियुरप्पा भाजपा की ओर से मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार हैं। ऐसे में लिंगायत समुदाय में फूट डालकर स्वयं के साथ जोड़े रखने के लिए यह कदम उठाया गया है। कांग्रेस की प्रदेश सरकार को यह समझना चाहिए कि समाज की एकता भाजपा या कांग्रेस की चुनावी जीत या हार से ज्यादा महत्त्वपूर्ण है। हार-जीत होती रहती है। यदि इस बार हार हुई तो भी बहुत संभव है कि अगली बार विजयश्री आपका वरण करें। जीतने वाला अगली या उससे अगली बार हार सकता है लेकिन समाज के विभाजन को समाप्त करना असंभव नहीं तो अति कठिन जरूर है।
क्या यह आवश्यक नहीं है कि हमें समान नागरिक संहिता की दिशा में आगे बढऩा चाहिए। समाज को बांटने वाले हर कदम का विरोध करना हर देशभक्त का कर्तव्य है। भेदभाव अस्वीकार्य है लेकिन तुष्टिकरण भी नहीं होना चाहिए। यह भी नहीं भूला जाना चाहिए कि समाज को बिखराव से बचाने के लिए उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश आरएस लोहाटी अल्पसंख्यक आयोग को ही बंद करने की जरूरत जता चुके हैं।
- डा. विनोद बब्बर

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