भाजपा को उत्तर प्रदेश में गठबंधन से चुनौती मिलेगी

भाजपा को उत्तर प्रदेश में गठबंधन से चुनौती मिलेगी

गुजरात विधानसभा के बाद राजस्थान और अब उत्तर प्रदेश उपचुनावों के बाद भारतीय जनता पार्टी को अपना जनाधार टूटता दिखने लगा है। 2019 के लोकसभा चुनावों में उत्तर प्रदेश में पिछले लोकसभा चुनाव के प्रदर्शन को दोहरा पाना सबसे बड़ी चुनौती होगी। निकाय चुनाव में प्रदेश के कस्बों और गांवों में भाजपा को पहले जैसे वोट नहीं मिले। भाजपा लगातार यह प्रयास कर रही है कि उसके खिलाफ विपक्ष एकजुट होकर मुकाबले में न आए।
2014 के लोकसभा चुनाव और 2019 के आगामी लोकसभा चुनाव की स्थिति में काफी अंतर है। उस समय देश में कांग्रेस के विरोध में वातावरण बना हुआ था। लोगों को भाजपा नेता नरेंद्र मोदी से चमत्कार की उम्मीद थी। नोटबंदी और जीएसटी से साफ हो गया कि केंद्र सरकार ने किसी भी फैसले को लागू करने से पहले कोई तैयारी नहीं की। नोटबंदी से क्या लाभ हुए, यह बताने में सरकार असफल रही।
उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ प्रदेश के विकास को पटरी पर लाने में असफल रहे हैं। प्रदेश की जनता कई तरह की परेशानियों से जूझ रही है। उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा आयोजित की जाने वाली हाईस्कूल और इंटरमीडिएट की बोर्ड परीक्षाओं में 10 लाख छात्रों ने परीक्षा छोड़ दी। योगी सरकार इसे अपनी सफलता के रूप में देख रही है जबकि हकीकत में यह योगी सरकार के लिए सबसे बड़ा संकट साबित होने वाला है।
योगी सरकार का तर्क है कि नकल पर नकेल कसने के कारण छात्रों ने परीक्षा छोड़ी। इन छात्रों के साथ उनके परिवारों का तर्क यह है कि कक्षा में छात्रों को सही तरीके से पढ़ाया ही नहीं गया। हाईस्कूल और इंटर के छात्रों की संख्या बहुत है। इस परीक्षा का असर परीक्षाफल पर भी पड़ेगा। पास होने वाले छात्रों की संख्या कम होगी। उनके नंबर कम आएंगे। समाजवादी पार्टी की सरकार ने हाईस्कूल और इंटर के बच्चों से किया अपना वादा पूरा नहीं किया था। उनको पूरी तरह से लैपटॉप और टैबलेट नहीं दिए थे। समाजवादी पार्टी को चुनाव में इसकी कीमत चुकानी पड़ी।
योगी सरकार का एक और फैसला खनन नीति को लेकर है। इसकी वजह से घर बनाने में प्रयोग होने वाली बालू और मोरंग बहुत महंगी हो गई है। एक तरफ सरकार सबको घर देने की बात कर रही है वहीं दूसरी तरफ घर बनाने में लगने वाली सामग्री महंगी होती जा रही है। गांव का किसान अपने खेतों को नुकसान पहुंचा रहे छुट्टा जानवरों से परेशान है। गांवों में इसको लेकर झगड़े तक हो रहे हैं। सरकार के पास इसका कोई उपाय नहीं है। वह तरह-तरह की हवा-हवाई योजनाएं फाइलों में
तैयार कर रही है। ऐसे में सबसे बड़ा प्रभाव उस जनता पर पड़ रहा है जो गांवों में रहती है। गांव और कस्बे के लोगों को यह लग रहा है कि यह सरकार बड़ी और ऊंची जातियों के प्रभाव में है।
धर्म के नाम पर लोकसभा और विधानसभा में भाजपा को वोट देने वाला वर्ग खुद को ठगा महसूस कर रहा है। सहारनपुर दंगा इसकी मिसाल बना। इसके बाद कासगंज में हुए दंगे से साफ हो गया कि योगी सरकार प्रदेश में जिस अपराधमुक्त वातावरण की बात कर रही थी उसमें वह सफल नहीं हुई। सरकार 'पुलिस एनकाउंटर' नीति से अपराध को खत्म करने की दिशा में चल रही है।
दलित धर्म के नाम पर भाजपा के पक्ष में खड़े होते हैं पर सामाजिक स्तर पर भाजपा के साथ उनका कोई तालमेल नहीं है। ऐसे में दलित के लिए सपा-कांग्रेस के पक्ष में खड़ा होना मुफीद लगता है। सपा में अब तक होने वाले फैसलों में मुलायम सिंह यादव, शिवपाल यादव और तमाम बड़े नेताओं का प्रभाव होता था। अब सभी फैसले केवल अखिलेश के होते हैं। ऐसे में किसी पहल के लिए उनको दूसरे नेताओं के समर्थन और आलोचना की चिंता नहीं है। कमोबेश यही हालत कांग्रेस की है। अब राहुल गांधी के हाथ में पार्टी की कमान है।
भाजपा में शाह-मोदी की जोड़ी ने पूरी पार्टी को अपने कब्जे में कर रखा है। वहां सारे फैसले उनके ही होते हैं। विपक्ष का आरोप है कि उत्तर प्रदेश में अदृश्य मुख्यमंत्री के रूप में भाजपा कार्यालय से सरकार चलाई जा रही है। ऐसे में पार्टी के तमाम नेता चुनावी समय में असहयोग कर सकते हैं।
उत्तर प्रदेश के लोकसभा चुनाव के परिणाम 2022 में होने वाले विधानसभा चुनावों को भी प्रभावित करेंगे। अगर कांग्रेस-सपा-बसपा की जोड़ी लोकसभा चुनावों में भाजपा को मात दे पाई तो विधानसभा चुनावों में वह सबसे प्रबल दावेदार हो सकती है। कांग्रेस के लोगों से बात करने पर पता चलता है कि गुजरात चुनावों में जिस तरह से भाजपा के खिलाफ लामबंदी का परिणाम देखने को मिला, उससे कांग्रेस हर प्रदेश में इसे प्रयोग में लाएगी।
इसी साल राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ विधानसभाओं के चुनाव होने हैं। भाजपा की रणनीति यह बन रही है कि इन राज्यों के चुनावों के साथ ही वह लोकसभा चुनाव भी करा दे जिससे विपक्ष संभल न पाए और भाजपा इसका लाभ उठाकर चुनाव जीत ले। राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में भाजपा की सरकारें हैं। ऐसे में यहां सरकार बचाना कठिन काम है।
उत्तर प्रदेश में 80 लोकसभा सीटों में से केवल 7 सीटें विपक्ष के पास थी। 72 लोकसभा सीटें भाजपा और उसके सहयोगी दलों के पास थी। हाल ही में संपन्न हुए उपचुनाव में भाजपा ने दो सीटें और गंवा दीं। अब उसके पास 70 सीटें ही रह गईं। मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ सबसे कमजोर प्रदेश हैं। अगर तीन राज्यों के विधानसभा चुनावों में भाजपा को मात मिली तो उत्तर प्रदेश में उसे लोकसभा की 70 सीटें हासिल करना बहुत मुश्किल हो जाएगा। कांग्रेस-सपा-बसपा भले ही अभी साथ-साथ न दिख रही हों पर लोकसभा चुनाव में वे भाजपा को रोकने के लिए आपसी समझ बना चुकी हैं। समय आने पर यह सामने दिखेगा।
-नरेंद्र देवांगन

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