कांग्रेस अधिवेशन में राहुल गांधी का भाषण

कांग्रेस अधिवेशन में राहुल गांधी का भाषण

वर्षों बाद आयोजित कांग्रेस अधिवेशन में पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी के भाषण की चर्चा इन दिनों हो रही है। राहुल गांधी का जोशीला उद्बोधन उनके आत्मविश्वास को तो दर्शाता है लेकिन देश की आम आदमी की समस्याओं और ज्वलंत मुद्दों पर पार्टी की नीतियों को जनता के समक्ष साफ तौर पर रखने में राहुल गांधी का भाषण असफल रहा।
राहुल ने अधिवेशन में उपस्थित प्रतिनिधियों को बताया कि मंच पर न कोई कुर्सी रखी गई और न ही किसी नेता का चित्र लगाया गया। ऐसा कहकर उन्होंने ये एहसास कराने की कोशिश की कि पार्टी में सबके लिए सम्भावनाएं हैं। टिकिट वितरण में कार्यकर्ताओं को प्राथमिकता देने का आश्वासन देते हुए कांग्रेस अध्यक्ष ने वायदा किया कि उनके और नेताओं के बीच जो दीवार है, वे उसे मिटा देंगे। भाजपा और प्रधानमंत्री पर भी उन्होंने हमेशा की तरह तीखे हमले किये जो बतौर विपक्षी नेता स्वाभाविक और अपेक्षित ही थे।
भाजपा पर तीखे हमले करने की रणनीति के चलते राहुल जनहित से जुड़े तमाम उन मुद्दों और मसलों को भूल गये जिससे देश की बड़ी आबादी प्रभावित होती है। 2०19 में विजय का आत्मविश्वास कांग्रेस अध्यक्ष के भाषणों में इस तरह झलक रहा था कि वे नरेंद्र मोदी के चेहरे के भावों में परिवर्तन तक बताने लगे। निश्चित रूप से उनके हमले जोरदार रहे किन्तु वे विपक्षी गठबंधन के विषय में नहीं बोले। उप्र के दो उपचुनावों में भाजपा की हार से तो वे प्रफुल्ल नजर आए परन्तु गोरखपुर और फूलपुर में कांग्रेस की जमानत जब्त होने के बारे में न तो श्री गांधी बोले और न अन्य वक्ता।
इसमें कोई दो राय नहीं हैं कि वर्ष 2०14 में मोदी सरकार ऐसे समय बनी थी जब देश के अधिकांश लोग तात्कालीन कांग्रेस सरकार से असंतुष्ट थे। वे महंगाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और पूर्व सरकार के कामकाज को ले कर चिंतित थे।. लोग चाहते हैं कि अर्थव्यवस्था पटरी पर लौटे। महंगाई से राहत दिलाना मोदी के लिए पहली चुनौती था। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के नेतृत्व वाले संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन यानी संप्रग के कई नेता कॉमनवेल्थ गेम्स घोटाले, कोयला घोटाले, 2जी स्पैक्ट्रम घोटाले, खनन घोटाले में शामिल रहे। कुछ मंत्री जेल भी गए।
रोजगार के मसले पर कांग्रेस मोदी सरकार को कदम-कदम पर घेरती रही है। भारत में हर वर्ष लाखों नौकरियों की जरूरत है। मोदी ने चुनावों में युवाओं से रोजगार का वादा किया था। चार वर्ष के कार्यकाल में रोजगारों का सृजन कैसे किया जाए, मोदी के लिए चुनौती बना रहा। मोदी सरकार ने स्किल इण्डिया के मार्फत युवाओं को हुनरमंद बनाने का बड़ा काम किया है। भले ही आज कांग्रेस और विपक्ष यह कहकर कि स्किल इण्डिया अपने उद्देश्य में सफल नहीं है, मोदी सरकार की खिल्ली उड़ा सकता है लेकिन लाखों हुनरमंद युवा आने वाले समय में देश की सच्ची संपदा साबित होंगे। जिस अर्थव्यवस्था को मनमोहन सिंह ने पैदा किया और पोषित किया, उस की वजह से क्या नुकसान हुआ, इस का समाधान निकालने में मोदी और उनकी पूरी टीम जुटी हुई है।
पिछले अनुभवों से एक बात तो साफ है कि राहुल गांधी भाषणों में कितने भी जोशीले हो जाएं लेकिन जमीनी स्तर पर वे उतने प्रभावशाली नहीं हो पाते तो उसकी वजह वही दरबारी संस्कृति है जो उन्हें वास्तविकता से रूबरू नहीं होने देती। पार्टी अधिवेशन में अपनी मां सोनिया जी से राहुल के लिपटकर गले मिलने की जो तस्वीर सार्वजनिक हुई, वह बिना कुछ कहे ही बहुत कुछ कह गई। यदि श्री गांधी ऐसा ही चित्र डा. मनमोहन सिंह अथवा अन्य किसी वरिष्ठ नेता के साथ खिंचवाते तो उसका सन्देश कहीं अधिक सकारात्मक रहा होता। नरेंद्र मोदी को भ्रष्टाचार का प्रतीक, भाजपा को कौरव और वीर सावरकर को अंग्रेजों से माफी मांगने वाला बताने जैसी बातें कहकर श्री गांधी ने कुछ देर तक सुर्खियां जरूर बटोरी हों लेकिन पूरे अधिवेशन में वे इस बात का कोई फार्मूला नहीं बता सके कि देश की जनता के लिये उनकी पार्टी क्या सोच रही है। अगर वो सत्ता में आते हैं तो उनकी रीति-नीति क्या होगी।
राहुल गांधी को अपने भाषण में देश के आम आदमी की समस्याओं पर सिलसिलेवार बोलना चाहिए था। उन्हें बताना चाहिए था आखिरकार मोदी सरकार ने किस तरह देश को बर्बाद किया है। मोदी सरकार से किसान, युवा, महिलाएं परेशान हैं। सरकार जन विरोधी काम कर रही है। अर्थव्यवस्था का भ_ा बैठ गया है। देश तरक्की करने की बजाय पीछे धकेला जा रहा है। रोजगार, कृषि, आंतरिक सुरक्षा, विदेशी मामलों, पड़ोसी राष्ट्रों से संबंध, पर्यावरण के मुद्दों के अलावा तमाम मोर्चों पर सरकार पूरी तरफ फ्लाप साबित हुई है। राहुल को मोदी सरकार की कमियों को आंकड़ों व सुबूतों के साथ पार्टी पदाधिकारियों व देश के सामने पेश करना चाहिए था लेकिन उनका भाषण मोदी सरकार को कोसने, कहानी-किस्से सुनाने, लफ्फाजी में ही खत्म हो गया। पार्टी नेताओं, कार्यकर्ताओं और पदाधिकारियों की तालियों, तारीफों से कांग्रेस का भला होने वाला नहीं है, यह बात राहुल गांधी को जितनी जल्दी समझ आ जाए उतना बेहतर होगा।
जनहित के मुद्दे छोड़कर कांग्रेस भाजपा को फांसने के लिये कोई न कोई मुद्दा उछालती रहती है। अभी हाल ही में पंजाब नेशनल बैंक का महाघोटाला चर्चा में था। इस मामले को लेकर राजनीति शुरू हो गई है। बीजेपी के शासन काल में यह मामला सामंने आया है लेकिन ये है यूपीए सरकार के समय का। कांग्रेस ने मोदी सरकार पर हमला तो कर दिया लेकिन उस ने अपने लिए भी मुद्दा तैयार कर लिया जिसका बीजेपी ने फायदा उठाना शुरू कर दिया है। मुद्दे की तलाश में बैठी कांग्रेस को यह मुद्दा हाथ तो लगा लेकिन इसका एक सिरा कांग्रेस तक भी जाता है जिस से ये मुद्दा बीजेपी के खिलाफ प्रभावी नहीं हो पाएगा। बिना अंजाम सोचे कांग्रेस ने बीजेपी और मोदी सरकार पर हमला कर दिया है। अगर कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व किसानों, बेरोजगारों, महिलाओं, अल्पसंख्यकों, दलितों की समस्याओं, मसलों और परेशानियों को राष्ट्रीय स्तर पर उठाता, सड़क और संसद में सरकार को घेरता तो उसे जनसमर्थन मिलना अवश्यंभावी था लेकिन कांग्रेस मोदी को कोसने की रणनीति पर ही काम कर रही है।
2०14 में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में बीजेपी को जितनी बड़ी जीत मिली थी, कांग्रेस के लिए उतनी ही अभूतपूर्व हार थी। 1984 के आम चुनाव में 415 सीटें जीतने वाली कांग्रेस 3० साल बाद उतनी सीट भी नहीं जीत पाई जितने प्रतिशत वोट उसे राजीव गांधी के समय में मिला था। 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद हुए चुनाव में कांग्रेस को 48 प्रतिशत वोट मिले थे जबकि पिछले आम चुनाव में वह 44 सीटों पर सिमटकर रह गई थी। पिछले चार वर्षों में भाजपा नीत एनडीए का विस्तार कश्मीर से कन्याकुमारी तक हुआ है। फिलवक्त 21 राज्यों में भाजपा की सरकारें हैं या वो सरकार में शामिल हैं।
वास्तव में मोदी ने देश की जनता को राजनीतिक स्तर पर जागरूक करने का भी काम किया है। लोगों में राजनीतिक चेतना का स्तर बढ़ा है। कई राज्यों में सत्ता परिवर्तन और बड़े बदलाव करके जनता में अपनी सूझबूझ और राजनीतिक चेतना के स्तर से परिचय कराया है। ऐसे में कांग्रेस के नेता बीजेपी की कमियां गिनवाकर अपना रास्ता आसान नहीं बना सकते। उन्हें देश हित और जनहित के मुद्दे पर देश के सामने अपनी राय साफ करनी होगी। वो भी छिटपुट नहीं, समवेत रूप से।
सबसे अहम यह है कि जिस मोदी को कोसने की राजनीति राहुल गांधी कर रहे हैं, उसी मोदी के मुकाबले खुद को मजबूत दिखाना होगा। उसके बाद 2०19 का सपना देखना चाहिए। चीखा-चिल्ली से ही चुनाव नहीं जीते जा सकते। राहुल गांधी को अभी लंबा सफर भारतीय राजनीति में तय करना है। उन्हें देश की जनता से जुडऩा चाहिए, उसकी समस्याएं समझनी चाहिएं और उन्हें दूर करने के उपायों पर ऊर्जा खर्च करनी चाहिए। मोदी सरकार की आलोचना और कोसने से किसी का भला नहीं होगा। देश की जनता चुपचाप सबकुछ देख रही है। अगर वो मोदी सरकार के रिपोर्ट कार्ड को देखेगी तो विपक्ष में बैठी कांग्रेस से भी हिसाब मांगा जाएगा।

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