राष्ट्ररंग: क्या सच में भ्रष्टाचार खत्म हो जायेगा?

राष्ट्ररंग: क्या सच में भ्रष्टाचार खत्म हो जायेगा?

हमेशा हमारे मन में एक सवाल गूंजता रहता है कि क्या एक दिन हमारा यह देश भ्रष्टाचार विहीन हो पायेगा ? हमारे जड़ तक जमी हुई अमीरी और गरीबी की खाई क्या एक दिन मिट जायेगी ? क्या पानी की तरह पसीना बहाकर मेहनत करने वाले मजदूर व किसान कभी उतने पैसे कमा पायेंगे जिससे उसे अपनी आम जरूरतों को पूरी करने के लिये किसी से कर्जा नहीं लेना पड़े ?
अगर ऐसा नहीं हो सकता तो क्या हम कह सकते हैं कि हमारा देश आजाद है और हम सभी उस आजाद देश के आजाद नागरिक हैं ? अगर नहीं तो क्या हम यह कह सकते हैं कि हम गुलाम हैं? अगर हम गुलाम हैं तो हमारे सामने अब अगला सवाल यह आ जाता है कि हम किसके गुलाम हैं ?
अगर हम गुलाम हैं तो आखिर वह कौन है जो हमारा मालिक है और परोक्ष रूप से हमारा शोषण कर रहा है ? उससे भी बड़ा सवाल यह है कि हम अपना शोषण होने क्यों दे रहे हैं ? क्या हम इतने कमजोर हैं या फिर मजबूर हैं जो सबकुछ जानकर भी सहने को लाचार हैं ?
जहां तक कानून और संविधान की बात है तो हमारे संविधान ने हमें सबसे ऊंचा स्थान यानी देश के मालिक का दर्जा दे रखा है। जहां हमारी सेवा व सुविधाओं का ख्याल रखने के लिये इतने सारे ऑफिसर्स व कर्मचारियों की नियुक्ति की गयी है, वहीं हमारी अविकसित सोच व जागरूकता की कमी के कारण हम मालिक होने के बावजूद खुद को नौकरों से बदतर जिन्दगी जीने को विवश हो जाते हैं।
हां, हमें कुछ पल के लिये एकबार ऐसा एहसास भी होता है और तब शायद हमें ऐसा लगने भी लगता है कि हम वास्तव में इस देश के मालिक हैं। वह तब होता है, जब बड़े-बड़े लोग अपनी महंगी-महंगी गाडिय़ों से उतरकर हमारे उस झोपड़ी में आते हैं और हाथ जोड़कर हमारे सामने खड़े हो जाते हैं और कहते हैं कि आप मुझे अपना वोट देकर सेवा का एक अवसर दें। तब कुछ पल के लिये हमें ऐसा लगने लगता है कि हम सचमुच में इतने बड़े हैं कि ये सारे बड़े लोग आज हमारे सामने छोटे पडऩे लगे हैं।
परंतु उसके तुरंत बाद में हमें अपने असली कद का भी एहसास हो जाता है जब हमें अपने उस सेवक से मिलने के लिये इजाजत मांगनी पड़ती है और वह इजाजत भी जब हमें नहीं दी जाती है, तब जाकर हमें यह ज्ञात हो जाता है कि हम वास्तव में कैसे मालिक हैं और सिर्फ नाम के लिये मालिक कहलाने वाले इस देश में हमारी औकात क्या है ?
हमारे देश में नेता, ब्यूरोक्रेट्स व व्यवसायी दिन पर दिन अमीर होते जा रहे हैं और दिन-रात मेहनत करने वाले, पसीना बहाने वाले देश की आम जनता और गरीब होती जा रही है। आज हमारे देश के आम लोग कितना भी मेहनत करके इतने पैसे नहीं कमा पाते कि अपनी आम जरूरतों की पूर्ति के लिये किसी साहूकार या बैंक से कर्जा न लेना पड़े या किसी सरकारी मदद के लिये किसी नेताओं या अफसरों के सामने अपना हाथ न फैलाना पड़े जबकि वही नेता, अफसर व व्यवसायी तीनों मिलकर हमारे मेहनत के फल की मलाई खा रहे हैं और हमें एक सूखी रोटी तक नसीब नहीं होने देना चाहते।
आज जो हमारी व्यवस्था है वह ऐसी है कि हमारे नेता, अफसर और व्यवसायी तीनों साथ मिलकर छप्पन भोग खाते रहते हैं और हम नीच कुत्तों की तरह उसके जूठन छोडऩे का इंतजार करते रहते हैं। फिर थोड़ा बहुत जो जूठन बच जाता है, उसपर हम सारे कुत्ते उसमें से अपने लिये कुछ अधिक पाने के लिये आपस में एक-दूसरे पर झपट पड़ते हैं। हम सभी आपस एक-दूसरे को चोट पहुंचाते हैं और छीना-झपटी भी करते हैं।
परंतु जब हम आपस में लड़कर भी किसी नतीजे पर नहीं पहुंच पाते, तब हम सारे कुत्ते अपने झगड़े को सुलझाने के लिये फिर उसी के पास जाते हैं और तब वह उसके एवज में भी अपना कमीशन मांगता है और हम खुशी-खुशी उसके लिये राजी हो जाते हैं। जैसा कि सरकारी राशन की दुकान में 10 किलो अनाज के बदले 08 किलो अनाज दिया जाता है जिसे हम बिना किसी विरोध किये ग्रहण कर लेते हैं। यहां हम 10 किलो की जगह 08 किलो अनाज क्यों ग्रहण करते हैं तो इसके जवाब में कई लोगों का कहना है कि अगर हम 08 किलो न लेकर और 02 किलो देने की मांग पर कायम रहे तो शायद वह वह 08 किलो मिलना भी कहीं सदा के लिये बन्द न हो जाय।
यह तो सिर्फ हमारे जीने और सोचने के स्तर का एक छोटा-सा उदाहरण है। यही हमारी हकीकत की जिंदगी है और हम ऐसे ही हैं। यही कारण है कि हम मालिक होते हुए भी भूखे सोते हैं, क्योंकि हमारे पास में खाने का इंतजाम नहीं है।
आज हम किसान फसल बोने के लिये कर्जा लेते हैं और उसे चुका पाने में असमर्थ हो जाते हैं, फिर हम भिखारी की तरह सरकार की ओर से अपनी कर्ज माफी की घोषणा होने का इंतजार कर रहे होते हैं परंतु अगर ऐसा नहीं हो पाता है तो आत्महत्या करने के सिवा हमारे पास कोई और चारा नहीं होता है क्योंकि एक तरफ बैंक का तगादा और दूसरी तरफ अपने घर की जरूरतों की पूरी न कर पाने के दर्द के बीच खुद को संतुलन बनाये रखना बहुत ही मुश्किल हो जाता है।
आखिर ऐसा क्यों हो रहा है हमारे साथ ? हम क्यों घूंट-घूंट कर जीने को मजबूर हैं ? आखिर कौन है हमारा दुश्मन जो हमारा अपना हक हम तक पहुंचने नहीं दे रहा ?
अगर हम इसकी गहराई में जाकर देखें तो हम पायेंगे कि वह हैं खुद हम और हमारी वह सोच जो हमें कदम-कदम पर सिर्फ भ्रष्टाचार के रास्ते की तरफ ले जाती है। हमारा सबसे बड़ी दुश्मन है हमारी यह व्यवस्था जहां बिना रिश्वत दिये हुए चैन की एक सांस तक लेना संभव नहीं हो पाता।
हम आज ऐसी व्यवस्था से गुजरते हैं जहां हमारे बच्चों की प्रारंभिक शिक्षा से लेकर नौकरी पाने तक के लिये रिश्वत को ही सहारा बनाना पड़ता है। फिर जब हमारे यही बच्चे इस देश का कोई जिम्मेवार आफिसर या नेता बनता है तब उसके घर वालों की भी जिन्होंने उसे इस मुकाम तक पहुंचाने के लिये काफी कुछ कुर्बानियां दी है, को एक नया सवेरा के साथ नई जिन्दगी मिलने की उम्मीदें लगी होती है और उनकी उस उम्मीद को बचाये रखना भी उसका फर्ज होता है। फिर हम कैसे यह उम्मीद भी करते हैं कि हम अपने सपनों के उस भारत के निर्मांण का, जहां जीरो प्रतिशत भ्रष्टाचार होगा और कोई भी भूखा, नंगा व बेघर नहीं होगा ?
जहां तक कानून बनाने की बात है तो हमारे संविधान में पहले से ही इतने कानून बने हुए हैं जो भ्रष्टाचार को रोकने व भ्रष्टाचारियों को सजा देने के लिये कम नहीं है परंतु जरूरत आज हमारे किसी कानून में नहीं बल्कि पूरी व्यवस्था में बदलाव की है। जरूरत हमें ऐसी व्यवस्था विकसित करने की है जहां हमारे सरकारी कर्मचारी, अफसर व नेता का दर्जा व आमदनी देश के असली मालिक यानी आम जनता की औसत आय से अधिक किसी भी हाल में न हो।
तब सिर्फ वही लोग राजनीति में व सरकारी सेवाओं में आना चाहेंगे जिनकी वास्तविक चाहत हमारे मेहनत से बने मेवा खाने की नहीं बल्कि सच्चे मन से हमारी सेवा करने की होगी परंतु यहां बहुत बड़ा सवाल यह है कि क्या ऐसा असल में कभी संभव हो पायेगा या यह हमारा महज एक सपना है जो रात के अंधेरे में शुरू होता है और सुबह आने से पहले खत्म हो जाता है ?
- अशोक कुमार झा

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