मुद्दा: बलात्कार पर फांसी की सजा कितनी जायज

मुद्दा: बलात्कार पर फांसी की सजा कितनी जायज

हरियाणा सरकार ने आखिरकार बढ़ती बलात्कार और यौनिक हिंसा से निपटने के लिए फांसी का सहारा लिया है। राज्य की खट्टर सरकार ने राज्य विधानसभा में इस तरह का बिल पारित किया है। इस बिल के आने से यह देश का तीसरा राज्य बन गया है जबकि इस तरह के कानून मध्य प्रदेश और राजस्थान में पहले से बने हैं। नये विधेयक में हरियाणा में भी 12 साल से कम उम्र की लड़कियों से रेप के दोषियों को फांसी की सजा का प्रावधान किया गया है।
हाल के महीनों में हरियाणा में बच्चियों से रेप और फिर उनकी नृशंस हत्याओं के कई मामले आए जिससे मनोहर लाल खट्टर सरकार को कटघरे में खड़ा किया गया। इसी साल जनवरी के महीने में पांच दिन के अंदर सात बच्चियों के साथ हुईं रेप की घटना ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया था। हालांकि इस कानून को और व्यापक बनाने की जरूरत है लेकिन क्या हम फांसी के जरिए इस तरह की घटनाओं को रोक सकते हैं।
हमारे समाज में आज बेटियों की सुरक्षा कटघरे में है। समाज के हर परिवार की चिंता उनकी सुरक्षा है। स्कूल, कालेज और आफिस जाब करने वाली बेटी जब तक घर नहीं लौट आती, परिवार के सभी लोग परेशान रहते हैं। असुरक्षा का सवाल बढ़ता जा रहा है, फिलहाल इसका कोई हल निकला नहीं दिख रहा। बेटियों की सुरक्षा को तैयार सारी कानूनी कवायदें बेमतलब साबित हो रहीं हैं। बेटियां हर दिन सामाजिक विकृति का शिकार बन रहीं हैं। समाज की नैतिकता गिर गई है। सामाजिक मापदंडों का पतन हो चला है। तकनीकी और शैक्षिक रुप से जितने हम मजबूत और सभ्य हो रहे हैं, सामाजिक नैतिकता उतनी नीचे गिर रही है। बदलते दौर में सामाजिक सम्बन्ध की कोई परिभाषा नहीं बची है जो लांछित न हुईं हो। बेटियों की आबरू सरेआम सड़क पर लुट रही है। घर में भी बेटियां सुरक्षित नहीं हैं। हमारा समाज आधुनिक सोच का डंका पीट प्रगतिवादी होने का खोखला दम्भ भर रहा हैं। सामाजिक मनोवृत्ति में ऋणात्मक गिरावट दर्ज की जा रही है। समाज में असुरक्षा की भावना घर कर गई है।
महिलाएँ और बेटियाँ घर से लेकर कार्यस्थल और सड़क तक असुरक्षित हैं। हर मां - बाप की सबसे बड़ी चिंता उसकी बेटी है। बेटी बचाओ , बेटी बढ़ाओ का नारा शर्मिंदा हो रहा है। जिस राज्य से इसकी शुरुआत की गई थी, वहीं हरियाणा सबसे असुरक्षित हो चला है। वह यौन हिंसा का हब बन गया है। शहर से लेकर गाँव तक असुरक्षा का माहौल है। बलात्कार , कन्या भू्रण हत्या और एसिड अटैक भारत की सामाजिक त्रासदी बन गया है। हालात यहाँ तक पहुँच गए हैं कि रेपिस्टों के खिलाफ राज्यों को फांसी जैसे कानूनों पर विचार करना पड़ रहा है।
बलात्कार रोकने के लिए अब तक के सारे कानून बौने साबित हो रहे हैं। हरियाणा सरकार रेप के खिलाफ फांसी की सजा पर विचार कर रही है। मध्यप्रदेश और राजस्थान में बलात्कार का आरोप साबित होने पर आरोपी के खिलाफ फांसी का कायदा पहले से बना रखा है हालांकि अभी तक इसका उपयोग किसी भी फैसले में नहीं हुआ है जबकि एमपी रेप की मेरिट वाले राज्यों में शामिल है। उत्तर प्रदेश में भी स्थिति अच्छी नहीं है। बलात्कार का मनोविज्ञान समझने में मनोचिकित्सक, सरकार और समाज सभी फेल हो चुके हैं। देश में कानून के बाद भी इस त्रसदी का हल होता नहीं दिख रहा। आधुनिक भारतीय समाज की सबसे बड़ी विकृति 16 दिसम्बर 2012 की घटना थी जो निर्भया से जुड़ी थी। इस हादसे ने देश की छवि पूरी दुनिया में धूमिल किया जिस पर संयुक्तराष्ट्र संघ ने भी चिंता जताई।
उस समय की यूपीए सरकार ने महिलाओं की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए एक हजार करोड़ रुपयों का निर्भया फंड भी शुरू किया। फंड के सही इस्तेमाल की जिम्मेदारी अलग-अलग मंत्रालय को सौंपी गई जिसका इस्तेमाल राज्यों की सरकारें बेटियों के हितों को ध्यान में रखते हुए कर सकती हैं लेकिन सच्चाई यह है कि निर्भया फंड में दो हजार करोड़ रूपये की वृद्धि होने के बावजूद जमीनी स्तर पर महिलाओं की सुरक्षा पर कोई ठोस नीति नहीं बन पाई है। 2014 में एक अध्ययन में चौंकाने वाले आंकड़े सामने आए जिसमें पता चला कि देश भर में 52 फीसदी लड़कियों के साथ घर से स्कूल जाते या फिर वापस आते हुए छेडख़ानी होती है जबकि स्कूल या कालेज जाते हुए 32 फीसदी लड़कियों का पीछा किया जाता है।
उत्तर भारत का राज्य हरियाणा बलात्कार को लेकर सुर्खियों में है। बेटियों के लिए वह सबसे असुरक्षित राज्य साबित हो रहा है। हरियाणा पुलिस ब्यूरो के आंकड़ों के मुताबिक साल 2017 में 30 नवंबर तक बलात्कार के कुल 1238 मामले दर्ज किए गए यानी हर दिन 3.69 बलात्कार के मामले दर्ज हुए। इस दौरान प्रदेश में महिलाओं के खिलाफ अपराध के कुल 9523 मामले दर्ज हुए जबकि 44 फीसदी नाबालिग लड़कियां शिकार हुईं जबकि हरियाणा के पड़ोसी राज्य पंजाब और हिमाचल प्रदेश के अलावा राजस्थान में बच्चियों के साथ दरिंदगी के मामले कम हुए।
नाबालिग बालिकाओं के साथ बलात्कार को लेकर मध्यप्रदेश देश में अव्वल है। मध्यप्रदेश में इस तरह के 2479 मामले दर्ज किए गए जबकि इस मामले में महाराष्ट्र 2310 और उत्तर प्रदेश 2115 के आंकड़े के साथ क्रमश: दूसरे और तीसरे स्थान पर है। पूरे भारत में 16,863 नाबालिग बालिकाओं के साथ बलात्कार के मामले दर्ज किए गए हैं। 2016 में बलात्कार के कुल मामले 39,068 हुए जिसमें 18 साल से कम आयु की लड़कियों की संख्या 16,863 थी जबकि 6 साल से कम आयु की लड़कियों के साथ बलात्कार के 52० मामले हुए। 6 से 12 साल के बीच की 1596 मासूम बालिकाएं ऐसी घटना की शिकार हुईं। 12 से 16 साल की उम्र में यह आंकड़ा चार अंकों यानी 6091 पहुँच गया। 16 से 18 साल की लड़कियों से जुड़ी 8656 घटनाएं हुईं।
यह प्रमाणित हो गया है कि कानून के भय से किसी समस्या का समाधान नहीं हो सकता। समाज में जब तक हर व्यक्ति का नैतिक विकास नहीं होगा, इस तरह की घटनाओं को रोकना सम्भव नहीं दिखता। सरकारों को स्कूलों में नैतिक शिक्षा और सामाजिक संबंधी विषयों पर अधिक जोर देना चाहिए। तभी हम देश की युवा पीढ़ी को सहेज पाएंगे। अगर वक्त रहते हम नहीं चेते तो यह समस्या नासूर बन जाएगी। बेटियों को हर हाल में बचाना होगा, उन्हें सुरक्षित माहौल देना होगा। तभी समाज सुरक्षित रह पाएगा। कन्या भ्रूणहत्या रोकने के लिए कानून बने हैं लेकिन बेटियों की संख्या लगातार घट रही है। हाल में आयी नीति आयोग की रपट हमें सोचने पर बेबस करती है। खुद पीएम मोदी के गृहराज्य की स्थिति सबसे बुरी है। मध्यप्रदेश और राजस्थान में बलात्कार के खिलाफ फांसी की सजा पहले से है, फिर वहाँ क्या इस तरह की घटनाओं पर रोक लगी। दोनों राज्यों में अब तक कितने लोगों को फांसी दी गई। इस पर समाज , संसद और परिवार को सोचना होगा।
जमीनी सच्चाई यही है कि हम जितने आधुनिक होने की ताल ठोंकते हैं, हमारे समाज का उतना ही पतन हो रहा है। समाज के बदलते इस मनोविज्ञान को समझना होगा। हम कानून के जरिए भय पैदा कर सकते हैं, लेकिन समस्या का निदान पूरी तरह नहीं कर सकते। मतलब साफ है कि हम मात्र कानून बना कर कुछ नहीं हासिल कर सकते। जब तक समाज में नैतिक विकास नहीं होगा। फांसी जैसे कड़े कानून बना कर हम इन घटनाओं को नहीं रोक सकते हैं। उस स्थिति में और नहीं जब दुनिया में फांसी को काला कानून मानकर इसे खत्म करने की अपील मानवाधिकारवादी संस्थाएं कर रही हैं।
- प्रभुनाथ शुक्ल

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