विश्लेषण: संघ बनाम कांग्रेस

विश्लेषण: संघ बनाम कांग्रेस

भारत का आम नागरिक नहीं जानता किन्तु वास्तविकता यह है कि इंडियन नेशनल कांग्रेस की स्थापना एक ब्रिटिश नागरिक ए ओ ह्यूम द्वारा भारत में राज कर रहे ब्रिटिश तानाशाहों की नीतियों और कार्यप्रणाली को समर्थन देने के लिए, मैकाले की अंग्रेजी शिक्षा प्रणाली के माध्यम से पढ़े और अंग्रेजों को दुनिया का सबसे सभ्य मानने की मानसिकता से ग्रसित उन कुलीन 72 भारतीय नागरिकों के उस समूह को लेकर की गयी थी जिनमें से अधिकाँश भारतीय संस्कृति को हेय दृष्टि से देखते थे। उनकी नजर में जन्मना हर भारतीय शासित होने योग्य और हर ब्रिटिश जन्मना शासक होने योग्य था।
अंग्रेजों की भारत विरोधी नीतियों, जिनके विरुद्ध समय-समय पर कुछ असफल विरोध होते रहते थे, को भारतीयों के माध्यम से ही दबाने के अंग्रेजों के प्रयासों को जन समर्थन देने के उद्देश्य से कांग्रेस का जन्म हुआ था। (इसका सबसे सटीक उदाहरण शहीद भगत सिंह की फांसी का विरोध न करना तथा उन्हें आतंकवादी तक कह देना है)। आज अपने आपको भारत की आजादी का जनक कहने वाली और आजादी का सारा श्रेय स्वयं लेने वाली कांग्रेस ने अपनी स्थापना के चवालीस साल बाद तक देश की पूर्ण आजादी की मांग कभी नहीं उठायी थी।
उस समय देश में कोई अन्य अवामपंथी दल था ही नहीं, इसलिए एक मात्र विकल्प कांग्रेस ही थी जिसके माध्यम से भारतीय अपनी दबी कुचली थोड़ी बहुत आवाज उठाने का प्रयास कर सकते थे। इसी नाते राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के जनक डा. हेडगेवार भी उसके सदस्य थे। वे बचपन से ही ब्रिटिश शासन के विरोधी थे और एक अंग्रेज विद्यालय निरीक्षक के विद्यालय में आने पर उसके स्वागत के समय अपने कुछ साथियों के साथ उसके विरोध में 'वंदेमातरम' का घोष करने पर उन्हें स्कूल से निकाल दिया गया था। जिस कारण उन्हें अपनी पढ़ाई पूना के एक स्कूल से करनी पड़ी थी। वर्ष 1910 में जब वे डाक्टरी की पढ़ाई के लिए कोलकाता गये तो वहां के क्रांतिकारी संगठन अनुशीलन समिति से जुड़ गये थे। नागपुर लौटने पर वे कांग्रेस से जुड़ गये और कुछ समय विदर्भ कांग्रेस के सचिव भी रहे।
1920 में जब नागपुर में कांग्रेस का देश स्तरीय अधिवेशन हुआ तो डा. केशव राव बलिराम हेडगेवार ने कांग्रेस में पहली बार पूर्ण स्वतंत्रता को लक्ष्य बनाने के बारे में प्रस्ताव प्रस्तुत किया तो तब वह पारित नहीं किया गया। 1921 में कांग्रेस के असहयोग आन्दोलन में उन्होंने सत्याग्रह कर गिरफ्तारी दी और उन्हें एक वर्ष की जेल हुयी। तब तक वह इतने लोकप्रिय हो चुके थे कि उनकी रिहाई पर उनके स्वागत के लिए आयोजित सभा को पंडित मोतीलाल नेहरु और हकीम अजमल खा जैसे दिग्गजों ने संबोधित किया।
कैसी विडम्बना है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को फूटी आँख न देखने वाली कांग्रेस के 1920 के नागपुर अधिवेशन की सभी व्यवस्थाओं की जिम्मेवारी डा. हेडगेवार पर थी जो उन्होंने प्राणपण से उठाई और अधिवेशन को सफल बनाने में अपना अमूल्य योगदान दिया किन्तु जल्द ही कांग्रेस के कुछ नेताओं की हिन्दू विरोधी अभारतीय नीतियों की जानकारी होने पर डा. हेडगेवार का कांग्रेस से मोह भंग हो गया और उन्होंने 1925 में राष्ट्रभक्त बालकों और भद्रजनों को साथ लेकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना के चार वर्ष उपरान्त सन 1929 में कांग्रेस ने पूर्ण स्वराज्य का प्रस्ताव पास किया।
बहुसंख्यक होते हुए भी अंग्रेजी मानसिकता से ग्रसित और मुस्लिम संस्कृति से प्रभावित अधिसंख्य हिन्दू कांग्रेस नेता हिन्दू हितों के लिए मुखर नहीं थे। उन्होंने छद्म सेकुलरवाद का चोला ओढ़ कर हमेशा समानता के सिद्धांतों को तिलांजलि देकर मुस्लिम हितों को वरीयता देने का कार्य किया। डा. हेडगेवार ने भारतीय मानकों और भारतीय संस्कृति की आवाज को जन-जन की मुखर आवाज बनाने के उद्देश्य से ही संघ की स्थापना की थी जो इन चार वर्षों में व्यापक स्वरूप ले चुका था। कांग्रेस के इस पूर्ण स्वराज्य संकल्प का डा. हेडगेवार ने स्वयं तो अभिनन्दन किया ही, साथ ही देश भर के स्वयंसेवकों को भी अभिनन्दन सभाएं करने का निर्देश पत्र जारी कर तिरंगा फहराने का संदेश दिया था। जिसका अनुपालन देश की उस समय अवस्थित समस्त संघ शाखाओं में किया गया।
आज संघ को अंग्रेजों का दलाल सिद्ध करने की कोशिशों में जुटी कांग्रेस और भारत के आमजन को यह भी ज्ञात नहीं है कि आजादी के पूर्व हर शाखा में हर स्वयं सेवक प्रतिदिन अनिवार्य रूप से भारत की आजादी की शपथ लेता था और जनता के बीच जाकर उन्हें आजादी का महत्व बता कर आजादी के आन्दोलन में भाग लेने के लिए प्रेरित करता था। जिस संघ को आज कांग्रेस अपनी असलियत छिपाकर अंग्रेजों का समर्थक बताने का गोयबल्सीय (एक झूठ को सौ बार बोलने पर वह सत्य समझा जाएगा) सत्य बताने पर तुली है, उसकी असलियत यह कि वह पर्दे के पीछे रहकर नागरिकों को आजादी के राजनैतिक आन्दोलन में भाग लेने के लिए प्रेरित कर रही थी।
अपनी इन्हीं कारगुजारियों के चलते कांग्रेस अपनी साख खो बैठी है और अपनी राष्ट्रवादी नीतियों और भारतीय मानसिकता की सम्पोषक सोच के चलते जनसामान्य के दिलों में जगह बना कर संघ दिन दूनी रात चौगुनी गति से प्रगति कर रहा है। जो संघ की शाखा में कभी गये नहीं, जिन्होंने संघ विरोध का चश्मा उतार कर उसे देखने की कोशिश कभी की ही नहीं, वही लोग संघ में और उसकी कार्यप्रणाली में हिन्दू हित का पोषण और मुस्लिम विरोध की नीति पाते हैं जबकि वास्तविकता इससे उलट है। संघ किसी भी वर्ग और धर्म के तुष्टिकरण के विपरीत समतामूलक भारतीय समाज और संस्कृति का पोषक और समर्थक रहा है। बिना किसी भेदभाव के जितने सामाजिक कार्य राष्ट्रीय और दैवी आपदाओं में बिना भेदभाव के जनसामान्य के लिए त्वरित सहायता कार्य संघ करता है, उतना देश की कोई संस्था निष्पक्षता के साथ नहीं करती है, यह निर्विवाद सत्य है।
इसी निष्पक्ष और निर्विकार कार्यप्रणाली का असर है कि आरएसएस आज दुनिया का सबसे बड़ा असैनिक और अराजनैतिक संगठन है। अभी कुछ दिन पूर्व मेरठ में आयोजित आरएसएस का राष्ट्रीय समागम विश्व के इतिहास में सबसे अनुशासित गैर सैनिक संगठन के सम्मेलन के रूप में अपना नाम दर्ज करा चुका है। भारत में 1925 में थोड़े से लोगों की उपस्थिति से प्रारम्भ अपने तिरानवे वर्ष की लगातार यात्र में यह सौभाग्य प्राप्त करने वाला अकेला संगठन है। इसके पीछे कोई शातिराना चाल या द्वेषपूर्ण मानसिकता नहीं है। केवल निर्विकार और देशहित की सोच ही इसे इतना आगे तक लाने में सक्षम रही है।
संघ नफरत नहीं, राष्ट्रवादी समानता और सद्भाव का पक्षधर है और अपने सदस्यों को भी यही सिखाता है। अपनी इसी सोच के चलते आज देश में एक राष्ट्रवादी समतामूलक समाज बनाने के लिए अपने उपांगों के माध्यम से समाज के सदियों से दबे-कुचले वर्गों के उत्थान की योजनाएं बिना किसी सरकारी सहायता के ढाई सौ से अधिक प्रकल्प चलाने में सक्षम हुआ है। संध के किसी भी पदाधिकारी ने कभी भी कोई समाज तोडऩे वाला, उत्तेजनामूलक या वैमनस्य फैलाने वाला भाषण नहीं दिया किन्तु उनके समतामूलक, तुष्टिकरण विरोधी भाषणों को हमेशा आग्रही मीडिया और राजनैतिक दलों ने मुस्लिम विरोधी बताकर संघ को कट्टर हिन्दुत्ववादी सिद्ध करने का दुष्चक्र रचा और सत्ता में होने का लाभ उठा कर उसे नेस्तनाबूद करने के प्रयास किये किन्तु देश की निष्पक्ष न्याय व्यवस्था ने उसे हमेशा ससम्मान बरी किया है। आज भी सारे वामपंथी और अपने आपको सेकुलर कहने वाले वोट के लिए एक वर्ग विशेष का तुष्टिकरण करने की नीति पर चलने वाले राजनैतिक दल संघ के विरोध में अपने समस्त अंतर्विरोधों को भुला कर एक मंच पर आ गये हैं। यह संध की अपरिमित शक्ति का प्रमाण नहीं तो क्या है?
ये सारे के सारे तथाकथित सेकुलर दल एक साथ इक_े होकर संघ और उसके उपांग राजनैतिक दल भाजपा की राष्ट्रभक्ति का तो मजाक बनाते हैं मगर देश तोडऩे वाले नारे लगाने वाले लोगों का बोलने की आजादी के नाम पर समर्थन करते हैं। इन दलों द्वारा वामपंथी और तथाकथित सेकुलर विचारधारा से प्रभावित इतिहासकारों द्वारा लिखित इतिहास जिसमें कांग्रेस के नेताओं और उसमें भी एक दो परिवारों के अतिरिक्त किसी भी अन्य वर्ग या विचारधारा के स्वतंत्रता सेनानियों या उनके परिवारों के योगदान को उचित महत्व देकर उल्लिखित न करने या गलत प्रसंगों में उल्लिखित करने की षडय़ंत्रपूर्ण धूर्त चालों के चलते उनकी छवि खराब करने की कपटपूर्ण नीति के अनुपालन में आग्रही वामपंथी लेखकों द्वारा लिखित इतिहास के उद्धरण जनसामान्य को भ्रमित करने के लिए दिए जाते हैं। इसके लिए एक बड़ा सटीक उदाहरण दिया जा सकता है जिसका जिक्र भारत के इतिहास में प्रमुखता से नहीं किया गया है।
26 जनवरी, 1950 को जब भारत को गणतन्त्र घोषित किया गया तो भारत में अपने उपनिवेश पांडिचेरी को फ्रांस सरकार ने भारत सरकार को स्वयं सौंप दिया किन्तु पुर्तगाल सरकार ने अपने भारतीय उपनिवेश गोवा, दमन-दीव, दादरा और नगर हवेली को भारत सरकार के आग्रह के उपरान्त भी सौंपने से मना कर दिया जिससे उपनिवेश के नागरिकों में आक्रोश फैल गया और इससे क्षुब्ध होकर गोवा सरकार के एक बैंक कर्मचारी - अप्पासाहेब कर्मलकर ने नेशनल लिबरेशन मूवमेंट संगठन की बागडोर संभाली ताकि वह पुर्तगाल-शासित प्रदेशों को पुर्तगाली शासन से मुक्ति दिला सकें। साथ ही साथ आजाद गोमान्तक दल (विश्वनाथ लावंडे, दत्तात्रोय देशपांडे, प्रभाकर सीनरी और श्री गोले के नेतृत्व में) और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ अपने स्वयंसेवक (राजा वाकणकर और नाना काजरेकर के नेतृत्व में) दादरा और नगर हवेली को मुक्त कराने के लिए सशस्त्र हमले की तैयारी में जुट गये।
वाकणकर और काजरेकर ने स्थलाकृ कृति अध्ययन और स्थानीय कार्यकर्ताओं और नेताओं जो पुर्तगाली क्षेत्र की मुक्ति के लिए आंदोलन कर रहे थे, से परिचय और हमले की सटीक योजना बनाने के लिए 1953 में दादरा और नगर हवेली का कई बार दौरा किया । अप्रैल, 1954 में तीनों संगठनों ने मिलकर एक संयुक्त मोर्चा (युनाइटेड फ्रंट) बनाया और एलफिंस्टन गार्डन की एक बैठक में, एक सशस्त्र हमले की योजना बनाई । स्वतंत्र रूप से कार्यरत एक और संगठन, युनाइटेड फ्रंट आफ गोअन्स ने भी इसी तरह की एक योजना बनायी।
फ्रांसिस मैस्करेनहास और विमान देसाई के नेतृत्व में युनाइटेड फ्रंट आफ गोअन्स के करीब 15 सदस्यों ने 22 जुलाई 1954 की रात को गुजरात के रास्ते घुसकर दादरा पुलिस स्टेशन पर आक्रमण कर दिया। उन्होंने पुर्तगाली उप-निरीक्षक अनिसेतो रोसारियो की हत्या कर दी। अगले ही दिन सुबह पुलिस चौकी पर भारतीय तिरंगा फहरा दिया गया और दादरा को मुक्त प्रान्त घोषित कर दिया गया । जयंतीभाई देसाई को दादरा के प्रशासन हेतु प्रशासनिक पंचायत का गठन कर उसका मुखिया बना दिया गया । एक सप्ताह के अंदर ही 28 जुलाई 1954 को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और आजाद गोमान्तक दल के स्वयंसेवकों ने भी गुजरात के रास्ते घुस कर नारोली की पुलिस चौकी पर हमला बोला और पुर्तगाली अफसरों को आत्मसमर्पण करने पर मजबूर कर दिया और नारोली को आजाद करा लिया । अगले दिन, 29 जुलाई 1954 को स्वतंत्र नारोली की ग्राम पंचायत की स्थापना करके उसे नारोली का प्रशासन सौंप दिया गया ।
कप्तान फिदाल्गो के नेतृत्व में अभी भी पुर्तगाली सेना ने नगर हवेली में अवस्थित सिलवासा में अधिकार जमाया हुआ था । राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और आजाद गोमान्तक दल के स्वयंसेवकों ने मौका देखते ही सिलवासा की परिधि में स्थित पिपरिया पर कब्जा जमा लिया । क्रांतिकारियों को करीब आते देख कप्तान फिदल्गो ने स्वतंत्रता सेनानियों को आत्मसमर्पण करने की चेतावनी दी परन्तु वे सिलवासा की और बढ़ते रहे । अपनी पराजय को निश्चित देखते हुए कप्तान फिदल्गो 150 सैन्य कर्मचारियों के साथ सिलवासा से 15 किमी दूर खान्वेल भाग गया । 02 अगस्त 1954 को सिलवासा मुक्त (स्वतंत्र) घोषित कर दिया गया । कप्तान फिदाल्गो, जो नगर हवेली के अंदरूनी हिस्से में छुपा हुआ था, को आखिरकार 11 अगस्त 1954 को आत्मसमर्पण करना पड़ा। स्वतंत्र करा लेने के पश्चात एक सार्वजनिक बैठक में अप्पासाहेब कर्मलकर को स्वतंत्र कराए गये दादरा, नगर हवेली क्षेत्र का प्रथम प्रशासक चुना गया और उनकी सहायता के लिए एक पंचायत का गठन कर दिया गया ।
स्मरणीय है कि स्वतंत्र होने के बावजूद अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय द्वारा दादरा-नगर हवेली को पुर्तगाली संपत्ति के रूप में मान्यता प्राप्त थी और तत्कालीन भारत सरकार ने इस क्षेत्र को बार-बार निवेदन के बावजूद भी अपने नियन्त्रण में नहीं लिया, फलस्वरूप भारत के अंदर स्थानीय निवासियों द्वारा प्रशासित यह क्षेत्र एक स्वयंभू राष्ट्र के रूप में कार्यरत रहा जिस पर न तो भारत का अधिकार था और न ही पुर्तगाल का । 1954 से 1961 तक दादरा और नगर हवेली वरिष्ठ पंचायत द्वारा संचालित भारत की सीमाओं से चारों ओर से घिरा एक मुक्त (स्वतंत्र) क्षेत्र के रूप में अवस्थित रहे। जिस क्षेत्र के निवासी अपने अधिकृत क्षेत्र के साथ भारत में विलय को तैयार हों और भारत की सरकार उसे लेने को तैयार न हो इसे विडम्बना न कहा तो क्या कहा जाय।
1961 में जब भारत ने सैनिक अभियान से गोवा को पुर्तगाली कब्जे से मुक्त किया, तब श्री बदलानी को एक दिन के लिए राज्य-प्रमुख बनाया गया । उन्होंने तथा भारत के प्रधान मंत्री, जवाहर लाल नेहरु ने एक विलय-समझौते पर हस्ताक्षर किये और इस समझौते के अधीन दादरा और नगर हवेली का भी औपचारिक रूप से भारत में विलय सम्पन्न कर दिया गया । यह है संघ की गौरवशाली परम्परा जिसे कांग्रेस अंग्रेजों का समर्थक सिद्ध करने का प्रयास करती रहती है।
-राज सक्सेना

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