राष्ट्ररंग: यह रोना है, कोई हंसी नहीं, थमेगी थमते-थमते

राष्ट्ररंग: यह रोना है, कोई हंसी नहीं, थमेगी थमते-थमते

पंजाब नेशनल बैक (पी.एन.बी.) में हुए 11356 करोड़ के घोटाले को लेकर कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष राहुल गांधी और दूसरे विरोधी दल प्रधानमंत्री मोदी पर तरह-तरह के आरोप लगा रहे हैं, कुछ इस अंदाज में कि जैसे घोटाले के मुख्य आरोपी नीरव मोदी और मेहुल चोकसी को उनका संरक्षण रहा हो और उन्होंने ही नीरव मोदी को देश से भगा दिया हो। राहुल गांधी ने तो यहां तक कह दिया कि पी.एम. खुद कराते हैं- भ्रष्टाचार। इतना ही नहीं, राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री को भ्रष्टाचार का उपकरण भी निरुपित कर दिया।
कुछ भी हो पर लोगों को पता है कि राहुल गांधी कुछ भी बोल सकते हैं क्योंकि प्रधानमंत्री की नीतियों को लेकर चाहे किसी को कितना भी मतभेद क्यों न हो पर उनकी ईमानदारी और निष्ठा पर कोई उंगली नहीं उठायी जा सकती। विगत वर्षों विजय माल्या को भागने को लेकर भी राहुल गांधी प्रधानमंत्री को ही जिम्मेदार ठहरा रहे थे यानी जैसे कि मोदी कोई इंसान न होकर कोई अतीन्द्रिय शक्ति हों जिन्हें अपने दिव्य चक्षुओं से पहले ही पता चल जाता हो कि कौन घोटालेबाज देश छोड़कर भागने वाला है?
एक बड़ी सच्चाई यह है कि यू.पी.ए. शासन के दौर में ऐसे घोटालेबाजों को कोई समस्या रही थी और वे देश में ही आराम फरमाते रहते थे। उनका कुछ बिगड़ जाएगा, ऐसी आशंका भी उन्हें नहीं रहती थी। सत्ता में बैठे लोगों के साथ इनकी 'दॉंत काटे की रोटी' की कहावत चरितार्थ होती थी। तस्वीर का बड़ा पहलू यह है कि अब ऐसे लोग अपनी चमड़ी बचाने को देश से भाग रहे हैं पर मोदी सरकार के दौर में वे देश से भाग कर कतई सुरक्षित और निश्चिंत नहीं हैं। चाहे विजय माल्या हो या नीरव मोदी हो, इन सभी को देश में लाने और इन्हें सजा दिलाने के लिए मोदी सरकार हर संभव प्रयास कर रही है।
तस्वीर का दूसरा पहलू यह है कि चाहे नीरव मोदी हो या कोई और, पहले जहां उनके घोटाले सामने आते ही नहीं थे, वहीं अब सरकार की सक्रियता और उसकी पारदर्शी नीतियों के तहत ऐसे घोटाले सामने आ रहे हैं। जैसा कि नीरव मोदी के बारे में बताया जा रहा है कि सिर्फ बैंक के अधिकारियों से ही नहीं वरन सरकार में बैठे लोगों के संरक्षण के चलते वह 2011 से ही पी.एन.बी. समेत दूसरे बैंकों को लूट रहा था। 2013 में स्वत: राजीव गांधी उसके एक इवेंट में देखे गए थे। कांग्रेस प्रवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी की भी नीरव मोदी के साथ संलिप्तता भी सामने आई है, जिसके चलते उनकी पत्नी अनीता सिंघवी को आयकर द्वारा नोटिस भेजा गया है।
तस्वीर का दूसरा पहलू यह भी है कि लोग प्रत्यक्ष तौर पर यह देख रहे हैं कि यह ऐसी सरकार है जो भ्रष्टाचार और घोटालों को किसी भी कीमत पर बर्दाश्त करने को तैयार नहीं है। इसी के तहत यह घोटाला जैसे ही सामने आया, वैसे ही सरकार ने ताबड़तोड़ कार्यवाही शुरु की। नीरव मोदी के आवासों और कार्यालयों पर छापों का अनवरत ऐसा सिलसिला चल पड़ा जो अभी तक जारी है। ये छापे इतने प्रभावी रहे कि नीरव मोदी के द्वारा लूटे गए रुपए की तुलना में सैंकड़ों-करोड़ों की सम्पत्ति ई.डी., सी.बी.आई. और आयकर विभाग द्वारा जब्त की जा चुकी है।
जहां तक नीरव मोदी से जब्ती का सवाल है तो ई.डी. ने नीरव मोदी के ठिकानों से 5649 रुपए के जेवर, 9 लग्जरी कारें, 7.80 करोड़ रुपए के म्यूचुअल फंड और शेयर भी जांच एजेंसियों ने अपने कब्जे में लिए हैं। 44 करोड़ के बैंक डिपॉजिट और नींव की कंपनी गीतांजलि ज्वेलर्स के 86 करोड़ रुपए के शेयर भी जब्त किए गए हैं। इम्पोर्टेड वॉच से भरे 60 कंटेनर जो हीरा जडि़त घडिय़ॉ हैं और स्टील की 176 आलमारियॉ भी जब्त की गई हैं। इतना ही नहीं, नीरव मोदी के कंपनियों के कई अधिकारियों एवं जिम्मेदार बैंक कर्मचारियों को दिन-प्रतिदिन गिरफ्तार किया जा रहा है। पी.एन.बी. के अठारह हजार कर्मचारियों को स्थानान्तरित किया जा चुका है।
अब यू.पी.ए. सरकार के दौर में नीरव मोदी को किस हद तक संरक्षण दिया गया, इसके लिए एक ही उदाहरण काफी है। पी.एन.बी. के एक डायरेक्टर सुरेन्द्र दुबे ने जब नियम विरुद्ध ढंग से एवं अंधाधुंध नीरव मोदी की कंपनियों को सतत् कर्ज देने पर आपत्ति उठाई और इस संबंध में बैंक के वित्तमंत्रलय एवं बैंक के अधिकारियों को लिखा तो उन्हें डायरेक्टर पद से इस्तीफा देने को बाध्य किया गया। बावजूद इसके 'उल्टा चोर कोतवाल को डॉंटे' की तर्ज पर मोदी और उनकी सरकार पर निराधार आरोप मढ़े जा रहे हैं। इधर सरकार ने नीरव मोदी और मेहुल चोकसी के पासपोर्ट रद्द कर दिए हैं। साथ ही फ्राड में शामिल 64 लोगों के विरुद्ध उनकी सभी सम्पत्तियों को अटैच करने के लिए नेशनल कम्पनी लॉ ट्रिब्यूनल में याचिका दायर की जा चुकी है, जिसके चलते ये अपनी प्रापर्टी किसी को स्थानान्तरित नहीं कर पाएंगे।
इसी तरह से इस बीच एक और करीब तीन हजार करोड़ रुपए का रोटोमैक घोटाला भी सामने आया जिसमें रोटोमैक कंपनी के मालिक विक्रम कोठारी ने बैंकों के तीन हजार करोड़ रुपए धोखाधड़ी कर हड़प लिए। विक्रम कोठारी के घरों और दूसरे ठिकानों पर भी ताबड़तोड़ छापे मारे जा रहे हैं। विक्रम कोठारी को गिरफ्तार कर उससे पूछताछ जारी है। इधर ओरिएन्टल बैंक में भी एक हीरा कारोबारी द्वारा 389 करोड़ का फ्राड सामने आया है जिसमें तत्काल एफ.आई.आर. दर्ज कर गिरफ्तारी और छापेमारी की जा रही है। प्रधानमंत्री और वित्तमंत्री दोनों ने ही कहा है कि जनता के धन का इस तरह का अपव्यय बर्दाश्त नहीं किया जाएगा और घोटालेबाजों को बख्शा नहीं जाएगा।
निस्संदेह देश की जनता को यह पूरी उम्मीद है कि देश को लूटने वाले किसी भी कीमत पर बचने वाले नहीं हैं लेकिन एक बड़ी बात यह कि प्रधानमंत्री और उनके मंत्रियों को यह बहुत अच्छी तरह समझ लेना चाहिए कि भ्रष्टाचार का नासूर अब भी देश में कायम है। इसके चलते स्टार्टअप, स्टैण्डअप, मुख्यमंत्री सहायता योजना और दूसरे ऋण देने के मामलों में बैंक अधिकारियों द्वारा रिश्वत ली जा रही है। इसके चलते प्रत्येक जगह बैंक अधिकारी दलाल पाले हुए हैं। अतएव बैंकों में रिश्वतखोरी रोकना मोदी सरकार की एक बड़ी चुनौती है।
कुल मिलाकर निष्कर्ष में यही कहा जा सकता है कि उपरोक्त घोटाले मनमोहन सरकार की धारा का ही विस्तार है क्योंकि उस दौर में जैसे जागीर हो- कुछ इस अंदाज में देश को लूटा गया और इस स्थिति को एक झटके में समाप्त नहीं किया जा सकता। जैसा कि किसी शायर ने लिखा- 'यह रोना है, कोई हंसी नहीं, थमेगी थमते-थमते।' फिर भी यह उम्मीद की जा सकती है कि यह लूट का पैसा तो देश के पास आएगा ही, लूट की संस्कृति पर भी विराम लग सकेगा।
-वीरेन्द्र सिंह परिहार

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