राजनीति: ऐसी बानी बोलिए

राजनीति: ऐसी बानी बोलिए

किसी भी इंसान की भाषा उसके किरदार का आईना हुआ करती है। उसकी भाषा से, उसके शब्दों से न सिर्फ उसके विचारों का पता चलता है बल्कि उसके संस्कार भी प्रदर्शित हो जाते हैं। अच्छे लोग, संस्कारी लोग गुस्से में भी अपशब्दों को इस्तेमाल नहीं करते।
दरअसल, भाषा एक आग है। वह सभ्यता की बुनियाद है तो बर्बादी की जड़ भी है। भाषा बहता शीतल जल भी है जो वीरानों को आबाद कर देता है, उनमें फूल खिला देता है। भाषा सैलाब भी है जो अपने साथ न जाने कितनी आबादियां बहा ले जाता है। खुशहाल बस्तियों को वीरानियों में बदल देता है।
यह इंसान के अपने हाथ में है कि वह भाषा रूपी इस आग का, इस पानी का किस तरह इस्तेमाल करता है। ये भाषा ही तो है जो दोस्तों को दुश्मन बना देती है और दुश्मनों को दोस्त बना लेती है। ये भाषा ही तो है जिसके जख्म कभी नहीं भरते, हमेशा हरे रहते हैं जबकि तीर-तलवार के जख्म भी वक्त के साथ कभी न कभी भर जाया करते हैं।
भारत जैसे देश में जहां पत्थर तक को पूजा जाता है, तिलक लगाकर उसका अभिनंदन किया जाता है, जहां कण-कण में ईश्वर के अस्तित्व को माना जाता है, वहां अमर्यादित भाषा का इस्तेमाल हजारों बरसों की संस्कृति पर कुठाराघात करता है। बेशक हमारा भारत एक लोकतांत्रिक देश है और किसी भी लोकतांत्रिक देश में, प्रजातांत्रिक देश में सबको अपनी बात कहने की आजादी होती है, अपने विचारों को व्यक्त करने की स्वतंत्रता होती है।
लोकतंत्र के नाम पर, प्रजातंत्र के नाम पर, अभिव्यक्ति के नाम पर क्या किसी व्यक्ति को किसी दूसरे व्यक्ति के बारे में अपशब्द बोलने की आजादी दी जा सकती है ? कतई नहीं क्योंकि ऐसा करना सामाजिक अपराध माना जाएगा। अपशब्दों के जरिये किसी का चरित्र हनन करना, किसी के मान-सम्मान को चोट पहुंचाना, किसी भी सूरत में सही नहीं कहा जा सकता। इस बारे में कोई भी दलील काम नहीं करेगी। ठीक है, आपको किसी से शिकायत है, किसी से नाराजगी है, आप किसी से गुस्सा हैं तो आप सभ्य भाषा में भी अपनी बात रख सकते हैं।
यह बेहद अफसोस और शर्म की बात है कि भारतीय राजनीति में अमर्यादा का समावेश होता जा रहा है। जहां सत्ता हासिल करने के लिए राजनेता साम-दाम-दंड-भेद का इस्तेमाल कर रहे हैं, वहीं भाषा के मामले भी रसातल में जा रहे हैं। राजनेताओं की भाषा दिनोंदिन अमर्यादित होती जा रही है। ताजा मिसाल भारतीय जनता पार्टी में देखने को मिली है। हुआ यूं कि कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने जब पंजाब नेशनल बैंक के घोटाले पर सवाल दागे तो भारतीय जनता पार्टी के सांसद ब्रज भूषण शरण ने उनके बारे में विवादित बयान दिया। उन्होंने राहुल गांधी के बारे में न सिर्फ विवादित बयान दिया बल्कि अपशब्दों का इस्तेमाल तक कर डाला।
इससे पहले इसी पार्टी की केंद्रीय मंत्री मेनका गांधी ने अमर्यादित शब्दों का इस्तेमाल किया था। खबरों के मुताबिक मेनका गांधी ने बहेड़ी में जनता दरबार लगाया था। इस दौरान वह आग बबूला हो गईं और उन्होंने अधिकारियों को जनता के सामने ही डांट-फटकार लगाई। वह यहीं नहीं रुकीं। उन्होंने एक इंस्पेक्टर से उसके मोटापे पर अभद्र टिप्पणी करते हुए कहा कि उसकी कोई इज्जत नहीं है। वह एक बुरा आदमी है और उसकी आमदनी से ज्यादा संपत्ति की जांच कराई जाएगी।
ऐसा भी नहीं है कि सिर्फ भारतीय जनता पार्टी के नेता ही अमर्यादित और विवादित बयान देते हैं। इस मामले में इस मामले में कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी आदि के नेता भी पीछे नहीं हैं।
विवादित बयानों के मामले में भारतीय जनता पार्टी से जुड़े साधु-संत भी कम नहीं हैं। इस मामले में साध्वियां भी कम नहीं हैं। उनके विवादित बयान भी सुर्खियों में रहते हैं।
आखिर क्यों कोई अमर्यादित भाषा का इस्तेमाल करता है। क्या सहनशीलता नाम की कोई चीज बाकी नहीं रह गई है कि लोग अपनी जरा सी आलोचना भी सहन नहीं कर पाते। जीवन में सबकुछ अपनी मर्जी का तो नहीं हो सकता। सृष्टि की तरह ही जीवन के भी दो पहलू हैं, दो पक्ष हैं। हमारी संस्कृति में तो निंदक नियरे रखने की बात कही गई है। संत कबीर कहते हैं-
निंदक नियरे राखिए, आंगन कुटी छवाय
बिन पानी, साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय
यानी जो हमारी निंदा करता है, उसे अपने ज्यादा से ज्यादा करीब रखना चाहिए। वह तो बिना साबुन और पानी के हमारी कमियां बताकर हमारे स्वभाव को साफ करता है।
यह बेहद चिंता का विषय है कि सियासत में भाषाई मर्यादा खत्म होने लगी है। देश के प्रधानमंत्री से लेकर कार्यकर्ता तक सब ऐसी भाषा इस्तेमाल करने लगे हैं जिसे किसी भी हाल में सभ्य नहीं कहा जा सकता। देश में ऊंचे ओहदों पर बैठे लोगों को कम से कम अपने ओहदे का ही ख्याल कर लेना चाहिए।
शायद ऐसे ही लोगों के लिए संत कबीर कह गए हैं-
ऐसी बानी बोलिए, मन का आपा खोय
औरन को शीतल करै, आपहु शीतल होय
-फिरदौस खान

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