बहस: क्या पकोड़े बेचना रोजगार नहीं है.......?

बहस: क्या पकोड़े बेचना रोजगार नहीं है.......?

किसी ने क्या कहा है और उसका क्या मतलब है, इसका अर्थ हर व्यक्ति अपनी मानसिकता के अनुसार निकालता है। अगर आपकी मानसिकता में नकारात्मकता भरी हुई है तो आप अच्छी से अच्छी बात में भी बुराई ढूंढ सकते हैं लेकिन सकारात्मक सोच वाले हर बुराई में भी भलाई ढूंढ निकालते हैं। मोदी जी ने जब कहा कि क्या पकोड़े बेचना रोजगार नहीं है तो विपक्ष ने उनका मजाक उड़ाना शुरू कर दिया और अब जगह-जगह पकोड़े बेचकर अपना विरोध जताया जा रहा है।
अब सवाल उठता है कि क्या सच में मोदी जी ने लोगों को पकोड़े बेचने की सलाह दी है। वास्तव में उनकी बात का मर्म समझने की जगह हम लोग केवल उनके शब्दों को पकड़कर बैठ गये हैं। पकोड़े बेचना केवल प्रतीक है जबकि उनका वास्तविक उद्देश्य स्वरोजगार से था और देखा जाये तो स्वरोजगार नौकरी करने से कहीं ज्यादा बेहतर विकल्प है।
यह हमारे देश का दुर्भाग्य है कि हमारी शिक्षा व्यवस्था हमें केवल नौकरी के ही लायक बनाती है इसलिये अपनी शिक्षा पूरी करने के बाद हमारे युवक एक नौकरी की तलाश में धक्के खाते रहते हैं और निराशाजनक हालातों में जिन्दगी गुजार देते हैं। नौकरी भी उन्हें खुशी नहीं दे पाती क्योंकि ज्यादातर युवा अपनी शिक्षा के अनुसार नौकरी हासिल नहीं कर पाते हैं और जल्दी ही नौकरी से भी निराश हो जाते है लेकिन जीवन गुजारने के लिये मजबूरी में नौकरी करते रहते हैं।
जब से मोदी सरकार आई है तब से लेकर अब तक कई मंचों से भाजपा के नेता यह बात कहते रहे हैं कि हर युवा को नौकरी देना सरकार के बस में नहीं है और युवाओं को स्वरोजगार की ओर ध्यान देना होगा। इस तरफ कदम बढ़ाते हुए सरकार ने कौशल विकास और मुद्रा योजना शुरू कर रखी है। काँग्रेस भी अपने शासन में स्वरोजगार की बात करती थी क्योंकि वो भी जानती है कि सबको नौकरी उपलब्ध करवाना संभव नहीं है इसलिये यूपीए शासन में मनरेगा योजना लाई गई और लोगों को गड्ढे खोदने के काम पर लगाया गया।
वरिष्ठ काँग्रेसी नेता चिदम्बरम पकोड़े बेचने के काम की तुलना भीख माँगने से करते हैं, ये काँग्रेसी नेताओं की छोटी सोच का नमूना है जो पकोड़े बेचने से ज्यादा गड्ढे खोदने को बेहतर मानते हैं।
वास्तव में सरकार द्वारा शुरू की गई योजनायें जनता तक सही प्रकार से पहुँच नहीं पाती हैं इसलिये जनता में निराशा पैदा होने लगती है, यही हाल भाजपा के शासन में भी हो रहा है। कौशल विकास से जितने युवाओं को प्रशिक्षित करने का वादा किया गया था धरातल पर वो सम्भव नहीं हो पाया है। मुद्रा योजना का लोगों ने फायदा तो उठाया है लेकिन वास्तविक जरूरतमन्दों तक कितनी मदद पहुँची है इसका आंकड़ा सरकार के पास भी नहीं है।
यह सच सरकार जानती है कि देश में रोजगार की हालत ठीक नहीं है क्योंकि जो विकास हो रहा है उससे ज्यादा रोजगार पैदा नहीं हो रहे हैं। यह समस्या हमारे देश की नहीं है बल्कि पूरी दुनिया में ऐसा हो रहा है, सारी दुनिया उस विकास की ओर चल पड़ी है जिसमें रोजगार कम पैदा हो रहे हैं। हमारे देश की बढ़ती जनसंख्या भी एक कारण है जिससे लोगों को रोजगार प्रदान करना किसी भी सरकार के बस में नहीं है। हमारे युवा दूसरे देशों की ताकत बन रहे हैं क्योंकि वो वहाँ नौकरी करके उन देशों की अर्थ-व्यवस्था में योगदान कर रहे हैं लेकिन एक सच यह भी है कि जो लोग पकोड़े बेचने का मजाक उड़ा रहे हैं, उन्हें यह नहीं पता है कि हमारे देश के ज्यादातर युवा विदेशों में छोटे-छोटे काम करके ही आगे बढ़ते हैं। जो काम हमारे युवा अपने देश में करने में शर्म महसूस करते हैं वही काम वो बड़ी शान से विदेश में करते हैं।
वास्तव में हमारे देश में काम को भी छोटा-बड़ा माना जाता है। आपकी पहचान आपके काम से होती है। कई बार ऐसा भी होता है कि आपसे कम आय वाला व्यक्ति ज्यादा सम्मान पाता है क्योंकि आपका काम छोटा माना जाता है। देश में बेरोजगारी को देखते हुए ही काँग्रेस ने अपने शासन में मनरेगा योजना द्वारा एक परिवार को 1०० दिन का रोजगार देने की व्यवस्था की थी, इससे ही साबित होता है कि उस वक्त भी देश में रोजगार के हालात क्या थे और ये भी सोचने का विषय है कि केवल सौ दिन के रोजगार से कैसे पूरे परिवार का पेट भरा जा सकता है। एक सवाल यह भी खड़ा होता है कि मनरेगा से लोगों को रोजगार देने के अलावा कोई उपयोगी काम किया गया है, इसका जवाब है नहीं क्योंकि यूपीए शासन के दौरान मनरेगा में किये गये काम की रिपोर्ट अच्छी नहीं है।
उदारीकरण के बाद हमारे देश में करोड़पति व्यापारियों का बड़ा वर्ग खड़ा हो गया है और इनमें से ज्यादातर लोग पहले कोई छोटा व्यापार ही किया करते थे। आप अपने आसपास देखेंगे तो पायेंगे कि ऐसे कितने ही लोग हैं जो छोटे-छोटे काम करते हुए आज बड़े बिजनेसमैन बन चुके हैं। नौकरी से व्यक्ति केवल अपना और अपने परिवार का पेट भर सकता है लेकिन स्वरोजगार से वो अपने साथ-साथ औरों के लिये भी रोजगार का प्रबन्ध कर सकता है। कितने ही ऐसे लोग हैं जो चाय-पकोड़े बेचते-बेचते होटलों के मालिक बन गये और यह भी सच है कि ज्यादातर लोग आज भी चाय पकोड़े ही बेच रहे होंगे लेकिन वो अपने गुजारे लायक जरूर कमा लेते होंगे। निजी उद्योगों में निचले पदों पर काम करने वाले व्यक्ति को जितना वेतन मिलता है उससे ज्यादा पैसे फेरीवाला कमा लेता है।
मैं यहाँ किसी व्यक्ति विशेष का उदाहरण नहीं देना चाहती लेकिन आप खुद ढूंढना शुरू कीजिये तो आपको हजारों व्यक्तियों के बारे में पता लग जायेगा जिन्होंने बेहद छोटी पूंजी से शुरूआत करके एक बड़ी कम्पनी खड़ी की है। अमेरिका आज इसलिये सारी दुनिया पर राज कर रहा है क्योंकि उसके लोगों ने ऐसी कम्पनियाँ खड़ी की जो सारी दुनिया में काम कर रही हैं। आज जो बच्चे चांदी का चम्मच लेकर पैदा हो रहे हैं, उनके माँ-बाप बेहद साधारण घरों में पैदा हुए थे क्योंकि आज से 40 साल पहले हमारे देश में अमीरों की संख्या बेहद कम थी। नौकरी में कमाई केवल भ्रष्टाचार से ही हो सकती है, ईमानदारी से तो केवल परिवार का भरण-पोषण ही किया जा सकता है। हां, अगर भ्रष्टाचार करने का मौका मिले तो कुछ भी संभव हो सकता है।
वास्तव में हमारे देश के 90 प्रतिशत से ज्यादा युवा जब अपनी शिक्षा पूरी करके बाहर निकलते हैं तो पाते हैं कि वे केवल नौकरी कर सकते हैं। वे अपने दम पर कुछ भी नहीं कर सकते क्योंकि उनके पास कोई हुनर नहीं है। सरकार शायद यही सोचकर कौशल विकास की योजना लाई है क्योंकि वो जानती है कि हमारे शिक्षित युवक अकुशल हैं। आप यह सच जानते हैं कि शहरों में कितने ही छोटे-छोटे काम हैं जिनके लिये आदमी ढूंढना मुश्किल होता है और अगर वो मिल जाये तो उसके पास समय नहीं होता। वास्तव में हमारे देश में शिक्षा का मतलब ही टेबल जाब करना माना जाता है इसलिये थोड़ी सी भी शिक्षा प्राप्त युवा नौकरी पाना चाहता है।
सरकारी नौकरी को हमारे देश में ऐसी नौकरी माना जाता है जहाँ आपको बिना काम किये अच्छे पैसे मिलते हैं और आर्थिक सुरक्षा अलग से, यही कारण है कि चपरासी बनने के लिये भी बड़े-बड़े डिग्रीधारी लाइन में लग जाते हैं। विदेशों की प्रगति का कारण है कि वो काम को पूजा मानते हैं। उनके यहाँ काम को छोटा-बड़ा नहीं माना जाता जबकि दूसरी तरफ हमारे देश में हाथ से काम करने या छोटी वस्तुओं का व्यापार करने को नीची नजर से देखा जाता है।
पकोड़े बेचने के बयान पर हल्ला मचाने वाले लोग यही लोग हैं जो पकोड़े बेचने से बेहतर भीख माँगना समझते हैं। वैसे यह सच भी है कि ज्यादातर सरकारें अभी तक गरीबों को भिखारियों की तरह खैरात बाँटकर वाहवाही बटोरने के चक्कर में रही है जबकि वो पैसा गरीबों का ही होता है लेकिन उन्हें इस तरह से दिया जाता है जैसे उन पर कोई अहसान किया जा रहा हो। छोटे काम करने वालों का मजाक उड़ाना ठीक नहीं है। इन लोगों का हमारी अर्थव्यवस्था में अहम योगदान है। पकोड़े बेचने वाले तो अपने परिवार को पाल रहे हैं जबकि हीरे बेचने वाले लोग तो देश को बेचकर विदेश भाग रहे हैं, बड़े-बड़े अफसर और नेता लोग ऐसे लोगों की मदद कर रहे हैं। कौन छोटा है कौन बड़ा, यह फैसला आप ही करिये।
- सीमा पासी

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