क्या आतंकवाद के बुझते चिराग की भड़कती लौ हैं ये हमले?

क्या आतंकवाद के बुझते चिराग की भड़कती लौ हैं ये हमले?

कश्मीर में चली आ रही पचास वर्षों की परम्परा को तोड़ते हुए कश्मीर की घाटी में आतंकवादी हमलों की संख्या में अभिवृद्धि समीक्षकों को आश्चर्यचकित कर रही है। आमतौर पर जब पहाडिय़ां और घुसपैठ के सरल रास्ते बर्फ से ढंक जाते थे तो आतंकवाद की घटनाओं में निश्चित रूप से कमी आती देखी जाती थी किन्तु इस बार का माहौल एकदम बदला हुआ लग रहा है।
इस बार बड़े हमले भयंकर बर्फबारी के बावजूद हो रहे हैं। ये हमलावर आतंकवादी पहले से घाटी में छुपे थे या फिर अन्य रास्तों से कश्मीर की घाटी में घुस रहे हैं, इसका पता अभी नहीं लगाया जा सका है। यह मान कर चला जा रहा है कि ये आतंकवादी पाकिस्तान से भारत के अन्य हिस्सों और वहां से कश्मीर घाटी में घुस रहे हैं। यह वास्तव में चिंता का विषय है। इससे भी अधिक चिंता का विषय यह है कि इस बार आतंकवादी दुस्साहसिक रूप से सेना और सुरक्षाबलों के शिविरों और मुख्यालयों पर हमले करने के प्रयास कर रहे हैं।
यह बात शतप्रतिशत सच है कि जितनी गंभीरता से इस समस्या से मोदी सरकार लड़ रही है, उतनी गम्भीरता से पिछली कोई सरकार नहीं लड़ सकी है। इसके बहुत से कारण गिनाए जा सकते हैं। अगर पिछली सरकारों के समय में परिस्थितियाँ विपरीत थीं तो अनुकूल परिस्थितियाँ तो अब भी नहीं हैं। हाँ अपनी दृढ़ इच्छाशक्ति के भरोसे मोदी सरकार परिस्थितियों को अपनी राष्ट्र के प्रति ईमानदार चालों को चलते हुए विपक्षियों के लांछनों को सहते हुए भी परिस्थितियों को अपने पक्ष में करने का भगीरथ प्रयत्न करती चली जा रही है। इसका पूरा श्रेय मोदी और उनके सलाहकारों की सफल चाणक्यनीति को दिया जा सकता है।
इस बार यह निर्विवाद रूप से कहा जा सकता है कि मोदी सरकार एक दीर्घगामी और सोची समझी रणनीति को लेकर कश्मीर के मैदान में उतरी है। विरोधी और उनके भोंपू लाख कहें कि भाजपा ने महबूबा मुफ्ती के नेतृत्व में सत्ता के लालच में सरकार बनाई है। यह सही नहीं लगता। अगर सत्ता के लालच में सरकार हथियाने का इरादा होता तो कश्मीर में राष्ट्रपति शासन लगाने के अनेक मौके और बहाने थे जिनका सीधा लाभ लेकर वहां राष्ट्रपति शासन लगाकर भाजपा राज स्थापित किया जा सकता था किन्तु भाजपा ने यह नहीं किया। इसबार भाजपा वहां कुछ सार्थक करने के लिए मैदान पर उतरी थी और उसने लोहे से लोहे को काटने की सही नीति पर अमल किया।
लाख ना नुकर करने के बाद भी मुफ्ती और फिर उनकी बेटी को नेतृत्व संभालना पड़ा। इस चाल से मोदी के सलाहकारों ने बहुमुखी लाभ ले लिया। एक ओर तो उसके खिलाफ बौलिंग करने वालों में सबसे मुखर और अलगाववादियों के सबसे अधिक निकट कही जाने वाली पीडीपी को उसने ओपनिंग के लिए बैटिंग करने मैदान पर उतार दिया और विपक्षी दलों के साथ अलगाववादियों की गुगली को भी झेलने को विवश कर दिया। इस चाल से भाजपा को दोहरा लाभ भी हुआ। पहला यह कि अब विपक्षी और अलगावादियों के निशाने पर भाजपा अकेली नहीं रह गयी थी। अब उसके साथ पीडीपी भी थी जिसके प्रति अलगाववादियों की अव्यक्त सहानुभूति भी थी। इसके चलते जब तक अलगाववादी मोदी की इस चाल को समझते, तब तक मोदी सरकार अपनी बिसात बिछा चुकी थी। अलगावादियों के पैरों के नीचे बिछीं 'लाल कालीनÓ मोदी सरकार खींच चुकी थी। यह थी पहली सफलता।
इस चाल को चल कर मोदी सरकार को दूसरा लाभ यह हुआ कि विपक्षी और अलगावादियों के सीधे निशाने पर आने से वह बच गयी। धरातल पर बहुत सी नीतियाँ और कार्य अपनी आइडियोलाजी के सर्वथा विपरीत करने पड़ते हैं क्योंकि प्रशासनिक दृष्टिकोण से वे राज्यहित में आवश्यक होते हैं। इस प्रकार के निर्णय महबूबा सरकार को लेने पड़े जो अलगाववादियों और आतंकवादियों के हित में तो नहीं थे जबकि वे घाटी की शान्ति और व्यवस्था के लिए नितांत आवश्यक थे। न चाहते हुए भी अपनी जिम्मेदारी समझते हुए महबूबा ने वे निर्णय लिए और उनके दूरगामी परिणाम भी सामने आए। अलगाववादियों की कमर टूटने लग गयी। अगर राष्ट्रपति शासन रहते मोदी सरकार ने ये निर्णय लिए होते तो विपक्षी दल और स्वयं विपक्ष में रहते पीडीपी यह नीतियाँ लागू नहीं होने देती।
यह सही है कि कई बार ऐसा हुआ कि देश के लोगों को लगा कि इस राष्ट्र विरोधी काम में बीजेपी को सरकार से अलग हो जाना चाहिए था। जैसे आदित्य के विरुद्ध एफआईआर और पत्थरबाजों से केस वापसी के निर्णय बाहर से देखने में तो यह बहुत गलत लग सकते हैं, सरासर सेना के विरुद्ध लगते हैं किन्तु यह भी सच है कि इन फैसलों के माध्यम से, विरोधियों के इन तथाकथित पत्थरबाज बच्चों की आड़ लेकर की जाने वाली विषाक्त बयानबाजियों को रोकने और उनसे होने वाली घाटी की विषाक्त फिजा में और अभिवृद्धि को रोका जा सकता था हालांकि न तो आदित्य की सेहत पर इससे अफसाज् के चलते कोई असर होने वाला था और न ही कुछ पत्थरबाज छोड़ देने से घाटी का निजाम बदलने जा रहा था।
इसके चलते पीडीपी और मोदी सरकार घाटी के लोगों की उस मानसिकता को बदलने की ओर दूसरा कदम रख रही थी जिससे बाहर आने का पहला प्रयत्न सेना बाढ़ में घाटी के लोगों की निस्वार्थ सेवा करके और उनके बच्चों को आतंकवादी साए से मुख्य धारा में लाने के लिए कर चुकी थी और उसके सुपरिणाम भी सामने आने लगे थे। स्थानीय पुलिस का सेना को मन से सहयोग मिलने के कारण आतंकवादियों की मुखबिरी होने लगी थी और धड़ाधड़ आतंकवादी मारे जाने लगे थे। ऐसा इस से पहले कभी नहीं हुआ था।
घाटी में भाजपा भी पैर पसारने लगी थी और भारत को गरियाने वाले लोगों में कमी आना शुरू हो चुकी थी। आतंकवादियों के साए की दहशत में अपना मुंह बंद कर घुट रहे अधिसंख्य कश्मीरियों को उनके तेजी से होने वाले सफाए के बाद राहत की सांस और मुखर होने की आजादी भी मिली जिसका प्रमाण समय-समय पर कश्मीर के भारतीय सेना या अर्धसैनिकबलों में कार्यरत सैनिकों के मरने पर उनके जनाजों में मातमजदा उमड़ी भीड़ और उनके नारों और बातचीत के अंदाज से लगाया जा सकता था कि अब घाटी का माहौल बदल रहा है और इसका सारा श्रेय महबूबा मुफ्ती का अपनी सरकार होने के नाते कश्मीर के लोगों के सामने हवाई सपनों के बजाय उन वास्तविकताओं को रखना है जो अलगावादियों द्वारा परोसे गये सपनों से एकदम उलट है।
कश्मीर मामले में मोदी सरकार चहुंमुखी नीति पर विचार कर चल रही है। एक ओर वह घाटी की आंतरिक स्थिति में बदलाव के लिए हर सम्भव प्रयास कर रही है वहीं आतंकवाद के मुद्दे पर पाकिस्तान को घेर कर उसे अकेला करने की नीति पर भी चल रही है। हद तो तब हो जाती है जब कल तक खाड़ी देशों के समर्थन का हौआ दिखा कर अपनी आँखें दिखाने वाला पाकिस्तान अपने बनाए रेगिस्तान में अकेला खड़ा नजर आता है। इसे मोदी की चाणक्य नीति की सफलता न कहें तो क्या कहें कि फिलिस्तीन के मुद्दे पर संयुक्तराष्ट्र में फिलिस्तीन का साथ देने वाले मोदी के सम्बन्ध इजराइल से बिलकुल खराब नहीं होते और उलटे मोदी की सुरक्षित फिलिस्तीन यात्र के लिए वह अपनी हवाई सुरक्षा उपलब्ध कराता है और दूसरे देश जोर्डन के मोदी को अपने हवाई जहाज से पहुंचाने पर एतराज तक नहीं जताता है। मोदी की इस्राइली प्रधानमन्त्री नेतान्याहू से व्यक्तिगत सर्वज्ञात मित्रता के बावजूद फिलिस्तीन के राष्ट्रपति प्रोटोकाल तोड़ कर मोदी को हवाई अड्डे पर सत्कार के लिये उपस्थित होते हैं और उन्हें अपने देश का सर्वोच्च नागरिक सम्मान प्रदान करते हैं।
क्या यह आश्चर्यजनक नहीं लगता कि खाड़ी देशों के साथ भारत सांस्कृतिक, आर्थिक और सामरिक समझौते कर रहा है और इस प्रकार धीरे-धीरे पाकिस्तान को किनारे किया जा रहा है। कश्मीर के मसले पर अब खाड़ी देश पाकिस्तान के बजाय भारत की ओर झुकते नजर आ रहे हैं। क्या इसे चाणक्यनीति की सफलता नहीं कहेंगे ? इन सब का प्रभाव कश्मीर के सामान्य नागरिक और राजनैतिक सोच पर भी पड़ रहा है और इन सब के चलते अलगावादियों की हालत पतली होती जा रही है। मोदी सरकार केवल यहीं पर नहीं रुक रही है। उसने अलगावादियों की विदेशी सहायता के सारे रास्ते बंद कर दिए हैं। नोटबंदी से जमा पूंजी शून्य कर दी है और उनपर कानूनी प्रक्रिया प्रारम्भ कर उन्हें गिरफ्तार कर जेलों में या फिर घरों में नजरबंद कर दिया गया है।
इस चाल से सामान्यजन और अलगाववादियों के बीच सीधा सम्पर्क और समन्वय समाप्त हो गया है। पत्थरबाजों की फंडिंग बंद हो चुकी है। दूसरी ओर कश्मीर सरकार आतंकवादी गिरोहों में जा चुके भटके नौजवानों को वापस ला रही है और पत्थरबाजों को माफी देने की नीति पर आगे बढ़ कर उन्हें वापस मुख्य धारा में लाने के प्रयास कर रही है। इससे आतंकवादियों को छिपने के ठिकानों की कमी पड़ गयी है और वे अब सुख-सुविधा में ऐश लेने के बजाय अपनी जान बचाने के लिए जंगलों में छिपने के लिए विवश हो रहे हैं। आतंकवादियों के आतंक के साए से बहुसंख्यक घाटीवासी निकल कर आज भारत के साथ सहयोग की नीति को अच्छा समझ रहे हैं और मुखर होकर भारत को अपना देश कहने की हिम्मत करने लगे हैं। यदाकदा पाकिस्तान मुर्दाबाद के नारे भी सुनाई देने लगे हैं।
मोदी सरकार केवल इतने पर ही नहीं रुकी और उसने अपनी अमेरिका से नजदीकी का लाभ उठा कर अमेरिका से पाकिस्तान को मिलने वाली आर्थिक सहायता बंद कराने में सफलता पाई है जिसे वास्तव में पाकिस्तान आतंकवाद के खात्मे पर नहीं, कश्मीर में आतंकवादी गतिविधियों के उन्नयन में खर्च करता था। यह मोदी सरकार की कूटनीतिक सफलता ही है कि आज संयुक्तराष्ट्र की वित्तीय एक्शन टास्कफोर्स (एसटीएफ) की से फरवरी को होने वाली बैठक में जबावदेही के चलते पाकिस्तान को न चाहते हुए भी जमात-उद-दावा और अन्य आतंकी संगठनों के खाते और कार्यालयों को सील करना पड़ा है। जिससे आतंकी संगठनों पर भारी मनोवैज्ञानिक प्रभाव पड़ा है और उनकी स्वीकार्यता पर भी असर पड़ रहा है।
सिर्फ इतना ही नहीं, मोदी सरकार चीन-पाकिस्तान गलियारे की सफलता को भी पलीता लगाने की योजना पर भी काम कर रही है। ग्वादर को घेरने के लिए उसके पड़ोस में चारबहार तो ईरान के सहयोग से बन ही रहा है। सेशेल्स और मारीशस से द्वीपों को किराए या लीज पर लेकर और ओमान से उसका एक आइलैंड लेकर इस गलियारे और ग्वादर की घेराबंदी की जा रही है। अब लीक से हट कर सिंध और बलूचिस्तान के पीडि़तों को भारत के समर्थन की नीति पर अमल पर विचार कर पाकिस्तान को उसी नीति से घेरा जाएगा जिस नीति पर चल कर वह कश्मीर को अशांत कर रहा है।
कुल मिला कर मोदी सरकार भारत के इतिहास में पाकिस्तान और आतंकवादियों की सफल और सार्थक घेराबंदी कर चुकी है और इसी का परिणाम है कि आतंकवादी पाकिस्तान के उकसावे और सहायता से अपने वर्चस्व की आखिरी लड़ाई लड़ रहे हैं क्योकि वे जानते हैं कि विभिन्न देश घुसपैठ रोकने के अत्याधुनिक उपकरण भारत को शीघ्र उपलब्ध कराने जा रहे हैं जिससे सीमा पर घुसपैठ असम्भव हो जाएगी। शेष भारत भी अब पुराने दौर से निकल चुका है और देश में उभरती राष्ट्रवादी सोच भी अब अन्य माध्यमों और रास्तों से घाटी में प्रवेश असम्भव करने जा रही है। इसलिए निर्विवाद रूप से यह कहा जा सकता है कि आतंकी घटनाओं में यह तेजी कश्मीर में बुझते आतंकवाद के चिराग की भड़कती लौ है जो बुझने की ओर तेजी से अग्रसर हो रही है।
- राज सक्सेना

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