स्वतंत्रता दिवस विशेष: अजेय क्रांतिकारी सरदार अजीत सिंह

स्वतंत्रता दिवस विशेष: अजेय क्रांतिकारी सरदार अजीत सिंह

वतन की आजादी के लिए मर मिटने वाले अनगिनत क्रांति के मतवालों में से एक थे महान क्रांतिकारी सरदार अजीत सिंह जिनके महान बलिदान को कृतज्ञ राष्ट्र विस्मृत कर चुका है परंतु हर वर्ष जब 15 अगस्त को भारतीय स्वाधीनता संग्राम के अतीत की वीणा के तार झंकृत होते हैं तो स्मृति के दृश्य पटल पर धुंधली होती भूले बिसरे क्रांति दूतों की यादों में कहीं छिपी होती है सरदार अजीत सिंह के राष्ट्रप्रेम की अनुपम गाथा।

अधिकांश लोग सरदार अजीत सिंह को मात्र अगर शहीद सरदार भगत सिंह के चाचा के रूप में ही जानते हैं पर वास्तव में सरदार अजीत सिंह अपने राष्ट्रवादी परिवार की नींव के वह प्रथम पत्थर थे जिसकी परिणति भगत सिंह की शहादत की बुलंदियों से हुई थी।

सरदार अजीत सिंह का जन्म लायलपुर में हुआ था उनमें अपने यशस्वी पिता सरदार अर्जुन सिंह के समान ही बहादुरी, निर्भीकता एवं देशभक्ति कूट-कूट कर भरी हुई थी पर अपने पिता एवं सभी भाईयों में सबसे अधिक विद्रोही एवं अडिग क्रांतिकारी सरदार अजीत सिंह ही थे।

सरदार अजीत सिंह ने सन् 1907 में शेर-ए-पंजाब लाला लाजपतराय के साथ मिलकर समूचे पंजाब के किसानों को संगठित कर विरोध आंदोलन का नेतृत्व किया था, इस दौर में पगड़ी संभाल जट्टा का राष्ट्रवादी गीत काफी लोकप्रिय हुआ था।

उन्हें सरदार किशन सिंह, अंबाप्रसाद सूफी तथा लाला लाजपत राय के साथ गिरफ्तार कर लिया गया। सरदार अजीत सिंह को उनके मामले की जांच किये बिना ही ब्रिटिश हुकूमत ने सजा सुना दी और उन्हें भारत से दूर बर्मा की राजधानी रंगून को मांडले जेल में बंदी रखा गया। भगत सिंह के जन्म के तुरंत बाद सरदार अजीत सिंह जेल से रिहा हुए।

सरदार अजीत सिंह ने जेल से रिहा होने के बाद भारत आने पर ब्रिटिश पुलिस के हाथ पकड़कर जेल में सडऩे की अपेक्षा फरार होकर संघर्ष करना अधिक उपयुक्त समझा। वह बहुत दिनों तक अंबाप्रसाद सूफी के साथ भारत में अनेक भागों में और फिर नेपाल की तराई आदि में छिप कर अंग्रेजों से संघर्ष करते रहे। फिर भारत में अपने स्वभाव के अनुरूप कुछ न कर पाने की स्थिति देखकर वह विदेश चले गये।

अजीत सिंह ईरान, तुर्की, स्पेन, ब्राजील, दक्षिण अमेरिका तथा ऑस्ट्रेलिया होते हुए जर्मनी पहुंचे। विदेशों में वह लाला हरदयाल, बरकतुल्ला, राजा महेन्द्र प्रताप आदि प्रवासी क्रांतिकारियों के सहयोग से भारत में राजनीतिक क्र ांति की ज्वाला प्रज्ज्वलित करते रहे। उनका नेताजी सुभाष चन्द्र बोस से भी सम्पर्क रहा।

द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान इटली से रेडियो पर हिन्दुस्तानी भाषा में जो ब्रिटिश विरोधी प्रचार होता था और ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ घृणा का जो विषवमन होता था, वह प्रखर देश भक्त सरदार अजीत सिंह के विदेश चले जाने की घटना का अमिट प्रभाव पड़ा था। जब उनकी चाची पति वियोग में बार-बार रोती थी तो बालक भगत सिंह कहते थे, चाची मत रो, जब मैं बड़ा हो जाऊंगा, तब मैं अंग्रेजों को देश से बाहर भगा दूंगा और चाचा को वापस ले आऊंगा।

अंतत: भगत सिंह का दिवास्वप्न साकार हुआ। जब भारत माता को गुलामी की जंजीरों से मुक्ति के क्षण निकट थे, तब सरदार अजीत सिंह पंडित जवाहर लाल नेहरू के प्रयासों से 37 वर्ष पश्चात् सन् 1947 में अपने वतन वापस लौटे और जब राष्ट्र स्वाधीनता की खुशियां और विभाजन का गम मना रहा था, तब वतन के बंटवारे से दुखी सरदार अजीत सिंह ने स्वाधीन भारत के प्रथम दिन 15 अगस्त सन् 1947 को डलहौजी के निकट एक कुटिया में सदैव के लिए आंखें मूंद ली और वह उसी माटी में विलीन हो गए जिसमें उनका जन्म हुआ था।

आज भी डलहौजी से 5 किमी दूर मंचपुल्ला की मनोरम वादियों में स्थित सरदार अजीत सिंह का विशाल स्मारक उनके राष्ट्रप्रेम एवं बलिदान के गौरवशाली इतिहास को अपने वजूद में समेटे हुए है।

- अनिल वर्मा

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