विश्लेषण: पंजाब में आतंकवाद की दस्तक, सजगता जरूरी

विश्लेषण: पंजाब में आतंकवाद की दस्तक, सजगता जरूरी

आतंकवाद एक बार फिर पंजाब में सिर उठा रहा है। पिछले दिनों सेनाध्यक्ष जनरल बिपिन रावत ने खुफिया एजेंसियों से प्राप्त जानकारी के आधार पर सावधान किया था कि पड़ोसी मुल्क रेफरेंडम-2020 से पंजाब का माहौल खराब करने की ताक में है। अमृतसर में निरंकारी सत्संग पर आतंकी हमले ने उस आशंका की पृष्टि की। इस घटना के बाद पंजाब के मुख्यमंत्री ने भी इस हमले में पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई के स्थानीय सेल का हाथ होने की बात कहीं। इसीलिए उन्होंने पाकिस्तान जाने के निमंत्रण को ठुकराते हुए आतंकवाद के प्रति सख्ती का संकल्प दोहराया।

पूरी दुनिया की नजरों में आज आतंकवाद और पाकिस्तान एक ही सिक्के के दो पहलू बन चुके हैं। कश्मीर में 'भटके नौजवानों' और 'पत्थरबाजों' को पाकिस्तानी सहयोग की कहानी जगजाहिर है। दरअसल पाकिस्तान भारत विरोध की स्थायी ग्रंथि से पीडि़त है। तीन-तीन जंग में हार के बाद पाकिस्तान से बंगलादेश के अलग होने का बदला भारत से लेने के लिए सीमापार से आतंकवाद को बढ़ावा देने के लिए भारी भरकम खर्च करने वाला पाकिस्तान गंभीर आर्थिक संकट से जूझ रहा है परंतु सुधरने को तैयार नहीं। सर्जिकल स्ट्राइक' के बाद भारत से सीधे टकराने का साहस उसमें नहीं है इसलिए उसने पंजाब को आतंकवाद में झोंकने की अपनी योजना को एक बार फिर आगे बढ़ाना शुरू कर दिया है। इस बार भी उसने धार्मिक द्वेष बढ़ाने का रास्ता चुना है।

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दुखद आश्चर्य यह कि नब्बे के दशक में पंजाब की राजनीति में स्वयं को प्रभावी सिद्ध करने के लिए जिन्होंने भिंडरावाला को स्थापित किया था, इस बार भी उसी दल के क्रिकेटर से नेता बने और स्वयं को अपने 'नेता' और देश की सीमाओं से ऊपर समझने वाले विदूषक महोदय पाकिस्तान जाकर वहां के सेनाध्यक्ष से गले मिलते हैं। पाक अधिकृत कश्मीर के राष्ट्रपति के करीब बैठ उनसे बतियाते हैं और कुख्यात आतंकी हाफिज सईद के करीबी खालिस्तानी आतंकवादी गोपाल सिंह चावला के साथ तस्वीर खिंचवाते हैं। भारत को लगातार परेशान करने के लिए 'पाकिस्तान जीवेÓ का नारा लगाना और उसपर भी वे अपनी इन हरकतों को 'अपने कैप्टन के कैप्टन' के इशारे पर बताकर देश का किस तरह हित कर रहे हैं ये तो वे खुद अथवा उनका 'कैप्टन का कैप्टन' ही बता सकते हैं।

इसमें कोई दो राय नहीं हो सकती कि सुरक्षा बलों की सुनियोजित और आक्रामक रणनीति से कश्मीर में पाकिस्तान के पिटठुओं का आधार टूट रहा है। केन्द्र सरकार द्वारा पत्थरबाजों से निपटने के लिए सुरक्षा बलों को ड्रोन सहित खुली छूट देेने के निर्णय से आतंकवादी संगठनों के सामने अस्तित्व का संकट है। एक ओर आकाओं का दबाव तो दूसरी ओर सुरक्षाबलों की मुस्तैदी के कारण स्थानीय सहयोग घटने से बौखलाए आतंकी अब सरकार का ध्यान बांटने के लिए नशा माफिया के साथ मिलकर पंजाब में कुछ करने की फिराक में हैं। अपने इस कुकृत्य को धर्म का मुखौटा पहनाकर आतंकी स्थानीय सहयोग प्राप्त करने की चाल चल रहे हैं लेकिन पंजाब की जनता उस अनुभव को कभी भूल नहीं सकती जिसने एक ओर पंजाब में गुरु के समय से चली आ रही 'हिन्दू -सिक्ख' सांझ को तोडऩे के लिए असंख्य प्रपंच रचे तो दूसरी ओर विस्फोट, फायरिंग, अपहरण और वसूली सामान्य बात थीं। हजारों निर्दोषों की हत्या कर पंजाब को कलंकित और कमजोर करने में कोई कसर बाकी नहीं रखी थी। इसलिए वे अमृतसर में हुए आतंकी हमले में 1978 में निरंकारी अकाली भिडंत से शुरू हुए आतंकवाद के काले दौर की प्रतिछाया देख अंदर से शंकित हैं और सरकार से कठोर कदमों की अपेक्षा करते हैं।

यह भी सर्वविदित है कि पिछले दिनों पंजाब में कुछ स्थानों पर भिंडरांवाले की तस्वीर वाली टी-शर्टों, वाहनों पर एटकर और शैक्षणिक परिसरों में आपत्तिजनक पोस्टर चिपके दिखाई दिये। यह जांच का विषय है कि कहीं यह सब भी आतंकवाद को फिर से जीवित करने की कड़ी का हिस्सा तो नहीं है और इसके पीछे कौन-कौन लोग हैं? बिना किसी पक्षपात ऐसे तत्वों के साथ सख्ती से निपटने का स्थायी नियम होना चाहिए। राष्ट्रीय हितों में राजनीति के हस्तक्षेप की कतई कोई गुंजाइश नहीं होनी चाहिए।

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बेरोजगारी को आतंकवाद का कारण बताने के तर्क को स्वीकार नहीं किया जा सकता लेकिन जहां सीमान्त राज्यों में रोजगार के अवसर बढ़ाने पर बल देना चाहिए, वहीं तस्करी और नशा माफिया को सख्ती से कुचलना चाहिए। देशद्रोह को तत्काल नष्ट करना राष्ट्र धर्म है। तो मानवाधिकार और आतंकवाद को एक पलड़े पर तोलने के प्रयासों को दृढ़ता से अस्वीकार किया जाना आतंकवाद से भिडऩे की प्रथम और अनिवार्य शर्त है। ब्लैक लिस्ट से कुछ लोगों के नाम हटाने के प्रभावों की भी समीक्षा होनी चाहिए। यदि किसी पर संदेह हो तो उसे अविलम्ब उसी सूची में शामिल करना चाहिए।

यह भी विशेष स्मरणीय है कि कुछ विदेशी शक्तियां भारत को कमजोर करने के लिए उसे बांटने के काम में लगी हैं जिन्हें कुछ स्थानीय लोगों का भी सहयोग मिल रहा है। जहां एक ओर देश के किसी भी हिस्से में जारी आतंकवाद से नक्सलवाद तक की कमर तोडऩे के लिए उनपर कठोरतम प्रहार की आवश्यकता है वहीं ब्रिटेन, कनाडा आदि देशों में अलग राज्य की मांग हेतु 'रेफरेंडम-2020' अभियान को समझने और 'समझाने' की आवश्यकता है। अपने तुच्छ स्वार्थ के लिए देश की एकता और सद्भावना को दांव पर लगाने वाली राजनीति को हमेशा के लिए दफन करने का साहस दिखाना होगा।

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जहां तक पाकिस्तान का प्रश्न है, आज बेशक पश्चिमी देश उससे पल्ला झाड़ रहे हों लेकिन कभी अमेरिका ने ही अफगानिस्तान में रूस विरोध के नाम पर उसे फलने -फूलने का अवसर प्रदान किया है। उसे अनेक दशकों तक मदद देने वाले 9/11 की घटना का स्वाद चख कर भी नहीं सुधरे। आज उन देशों को भी स्पष्ट बताने की आवश्यकता है कि यदि वे किसी भी रूप में भारत विरोध को अपने देश में जारी रखने की अनुमति देते हैं तो उनसे राजनयिक और व्यापारिक संबंधों का कोई औचित्य नहीं होगा। अपराधियों के प्रत्यर्पण के लिए अंतर्राष्ट्रीय कानून बनाने के लिए दूसरे देशों की सरकारों पर दबाव बनाने के साथ-साथ विश्व जनमत बनाने के प्रयास तेज करने चाहिए।

पाकिस्तान के साथ संबंधों में बहुत सावधानी की आवश्यकता है। बेशक करतारपुर कोरिडोर का निर्माण एक अच्छा फैसला है लेकिन भावनाओं में बहने से बचते हुए सुरक्षा नियमों में किसी प्रकार की कोई ढील नहीं दी जानी चाहिए क्योंकि गलियारे के शिलान्यास केे अवसर पर इसे पाकिस्तानी प्रधानमंत्री द्वारा फेंकी 'गुगली' कहे जाने के निहितार्थ को समझना जरूरी है।

आतंकवाद,नक्सलवाद माओवाद, सांप्रदायिकता के रूप में जारी अव्यवस्था को रोकने के लिए मीडिया पर भी नकेल कसे जाने की आवश्यकता है। 'तेरेे टुकड़े होंगे हजार' वाली मानसिकता को महिमा मंडन किया जाना निश्चित रूप से विषैली पत्रकारिता है। उससे अन्य रूपों में जारी विभाजक तत्वों को भी प्रोत्साहन मिलता है। देश के हर संगठन को चाहे वह सामाजिक हो या राजनैतिक, धार्मिक हो या किसी अन्य प्रकार का यह स्पष्ट संकेत जाना चाहिए कि राष्ट्रद्रोही वाणी और व्यवहार हर्गिज बर्दाश्त नहीं होगा। देश के समक्ष ज्वलन्त समस्याओं और चुनौतियों के शीघ्र समाधान के प्रयास होने चाहिए। इस अति सहिष्णु देश को विभाजक तत्वों के प्रति अति असहिष्णु बनना होगा। तभी आतंकवाद व अलगाववाद को परास्त कर हर मन-मस्तिष्क में केवल और केवल भारतवाद को स्थापित किया जा सकता है।

- डा. विनोद बब्बर

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