विश्लेषण: भारतीय कूटनीति के नवल आयाम

विश्लेषण: भारतीय कूटनीति के नवल आयाम

पहले चरण में पाकिस्तान को अपनी कूटनीति से विश्व पटल पर वनवासित कर, दूसरे चरण में रोज भारत को गीदड़ भभकियां देने के आदी चीन को नब्बे दिन तक उसी की तर्ज पर आँखें दिखाकर वापस होने को मजबूर करने और फिर दोस्ती का हाथ बढ़ाने की विवशता पैदा करने के उपरान्त मोदी की कूटनीति अब अपनी चमत्कारपूर्ण प्रगति के तीसरे चरण में पहुंचकर उस उच्च आयाम पर खड़ी है जहां से वह दोनों श्रेष्ठ महाशक्तियों को आँखें दिखाने में कोई गुरेज नहीं कर रही है।

इसे मोदी का कूटनीतिक साहस न कहें तो क्या कहें कि वह विश्व की सर्वोच्च सामरिक शक्ति अमरीका के विरोध और उसके नियमों को धता बताते हुए, बिना उसकी नाराजगी की परवाह किये, उसके दुश्मन नम्बर एक रूस से एस- 400 एयर डिफेन्स मिजाइल सिस्टम खरीदने का सौदा करता है, ईरान से कच्चा तेल खरीदता है और वही मोदी की रूस यात्र पर उन्हें स्थापित परम्परा से हट कर गर्मजोशी से अगवानी करने और विदा के समय भी गर्मजोशी से विदा करने की रस्म निभाने वाले रूस के राष्ट्रपति पुतिन की अगवानी और विदाई अपने घर से करने की मात्र औपचारिकता निभा कर मोदी ने जहाँ अमेरिका और रूस को यह जता दिया कि वह किसी भी दशा और दिशा में अब उनसे कम नहीं है, वहीं विश्व को भी यह जता दिया है कि वह संज्ञान लें कि पूर्व में एक और महाशक्ति का उदय हो चुका है जो वर्तमान में स्वयं को महाशक्ति कह कर अपना डंका बजाने की खुशफहमी पालने वाले चीन, रूस और अमेरिका को आँखें दिखाने की हिम्मत रखती है और उनसे आँख में आँख डाल कर बात कर सकती है।

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इस सन्दर्भ में हमें यह भी याद रखना होगा कि इस्राईल-फिलीस्तीन, ईरान और सीरिया जैसे एक दूसरे के दुश्मनों से मोदी समान मित्रतापूर्ण सम्बन्ध बनाए रखने में सफल रहे हैं। वहीं यूएई, सऊदी अरब, दुबई और अनेक मुस्लिम देशों से अपनी मुस्लिम विरोधी छवि बना दिए जाने के बावजूद दोस्ताना सम्बन्ध बनाने में भी सफल रहे हैं। वे यहीं नहीं रुकते। चीन को चारों ओर से घेरने में वे उसके लगभग सभी पड़ोसी देशों से सामरिक सम्बन्ध स्थापित कर उसे घेर चुके हैं। ग्वादर से उसकी पाकिस्तान के क्षेत्र से होकर बन रही सड़क के समानांतर काबुल तक सड़क भी बनाने में सफल हो चुके हैं। पाकिस्तान का हाल यह है कि वह आज आर्थिक बर्बादी के कगार पर खड़ा है और उसे कोई उधार देने वाला तक नहीं मिल पा रहा है। रोज भारत को आँखें दिखाने की हिम्मत करने वाला पाकिस्तान आज बिना कश्मीर समस्या का उल्लेख किये भी वार्ता शुरू करने को छटपटा रहा है। संक्षेप में हम यह कह सकते हैं कि आज भारत की विदेशनीति सफलता के उन आयामों को छू ही नहीं रही बल्कि इस सन्दर्भ में यह कहना सही होगा कि आज उन शीर्ष आयामों पर खड़ी है जिसकी कभी कल्पना तक भारत के कूटनीतिज्ञ करने से झिझकते थे।

इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि मोदी उचित समय पर उचित पग उठाने की नीति पर विश्वास करते हैं और उसी सम्यक नीति पर पूर्ण परीक्षण और हर पहलू पर विचार कर उसपर सतर्कतापूर्वक आगे बढऩे की रणनीति पर चलते हैं। वे यह भी जानते हैं कि कोई भी देश अपने अपने स्वार्थों और राजनैतिक हितों के चलते ही अपने मित्र चुनता है। वे यह भी भली प्रकार समझते हैं कि 'भय बिनु होय न प्रीति' का सिद्धांत देशों पर भी लागू होता है। इसलिए मोदी ने अन्य सरकारों से इतर देश को हर मोर्चे पर मजबूत करने की नीति का अनुसरण किया। पहले देश की अस्तव्यस्त और बरबादी के कगार पर खड़ी आर्थिक दशा को सुधारने के लिए उन्होंने कुछ दूरगामी सुधारात्मक पग उठाए और देश को आर्थिक दृष्टि से मजबूत किया। खजाने में पैसा आ जाने पर मोदी ने जहां आंतरिक-बाह्य सुरक्षा के दृष्टिकोण से आवागमन के संसाधनों के विस्तार और सुधार पर बल दिया, वहीं हथियारों की कमी से जूझ रही सेना को आत्मनिर्भर बनाने को शीर्ष प्राथमिकता दी और सेना को मजबूत करने के लिए हथियारों की रिकार्डतोड़ खरीदारी के सौदे पक्के किये। इस चाल से मोदी ने उन देशों से जिन से हथियारों की खरीद की उनसे अपने और देश के सम्बन्ध भी मजबूत किये और चीन को भारत को सुरक्षापरिषद में ले जाने के विरोध का प्रतिरोध खड़ा कर उसे इस प्रकरण पर अकेला कर दिया। केवल पिछलग्गू पाकिस्तान को छोड़ कर उसके साथ कोई नहीं रह गया। यह भी मोदी की एक बहुत बड़ी कूटनीतिक सफलता बन गयी।

आइय, एक एक कर इन महाशक्तियों से भारत के रिश्तों की अहमियत की समीक्षा करें। सबसे पहले चीन। वर्तमान समय में चीन महाशक्तियों में सबसे निचले तीसरे क्रम पर खड़ा होकर दूसरे और तीसरे क्रम को हथियाने के प्रयास कर रहा है। इन प्रयासों के चलते चीन अपने समकक्ष बराबरी के सन्निकट खड़े भारत से अपने रिश्तों को नये आयाम देने पर जरूरत से ज्यादा इसलिए बल दे रहा है कि चीन और भारत अगर मिल जाएं तो वे एक और एक ग्यारह बन कर महाशक्तियों का सिरमौर बन सकते हैं।

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इस समय चीन भारत को अपनी राजनैतिक परम्पराओं और विश्वासों से हट कर यह सुझाव दे रहा है कि वर्तमान में सारे स्थापित आग्रहों को त्याग कर बहुपक्षीय व्यापार व्यवस्था और दोनों देशों के बीच मुक्त व्यापार की सम्भावनाओं पर गंभीरता से विचार करें। हालांकि अब तक का इतिहास रहा है कि चीन केवल और केवल अपने हितों को सामने रख कर ही इस प्रकार के समझौते करता है किन्तु अगर भारत सरकार इन समझौतों का भारतीय हित और दूरगामी परिणामों के परिप्रेक्ष्य में परिक्षण कर अपने हित में झुका सकती है तो अवश्य विचार कर चीन के साथ अपने सम्बन्धों को और मजबूत कर पाकिस्तान को एक बहुत बड़ा झटका धीरे से दे सकने में समर्थ हो जाएगी।

आज चीन बार बार खुले मंचों से कह रहा है कि 'एक अरब से अधिक आबादी वाले दो देशों और उभरती हुई दो बाजार व्यवस्थाओं के रूप में चीन और भारत बहुध्रुवीय आर्थिक वैश्वीकरण की रीढ़ हैं।' यह भी सही है कि मोदी की आर्थिक नीतियों की ताबड़तोड़ सफलताओं ने चीन को यह अहसास दिला दिया है कि पश्चिमी देशों की सोच बहुत तेजी से उसके विरुद्ध होती चली जा रही है और इस समय वह शिद्दत से यह महसूस कर रहा है कि केवल भारत जैसा सशक्त पड़ोसी ही उसे इस संकट से उबार सकता है। जहां तक आपसी मतभेदों का प्रश्न है, पिछले दो तीन दशकों में चीन और भारत के बीच कई गंभीर मतभेद उभरे हैं जो किसी जादुई छड़ी के माध्यम से एक क्षण में समाप्त नहीं हो सकते किन्तु दोनों राष्ट्राध्यक्षों के बार-बार मिलने और वार्ताएं करने से यह लग रहा है कि इस दिशा में भी गम्भीर प्रयास चल रहे हैं और जैसी कि मोदी की आदत है वे देश को 'सरप्राइज' देने का आनन्द लेते हैं। शायद इस दिशा में भी उनकी अतुलनीय कूटनीति प्रयासरत है और हमें अपेक्षा करनी चाहिए कि कुछ सुखद परिणाम प्रक्रिया में हैं।

रूस इस समय निर्विवाद रूप से विश्व की दूसरी बड़ी महाशक्ति के रूप में माना जाता है। पिछले दो तीन वर्षों में कई मामलों में चीन उससे आगे निकला है और अमेरिका लगातार उसको धमकाने से बाज नहीं आ रहा है। स्वयं रूस कई देशों में अपनी टांग फंसाए पड़ा है और उसे वहां से बिना परिणाम दिये निकलना भारी पड़ सकता है। ऐसी परिस्थिति में वह स्वयं एक समर्थ मित्र की तलाश में है जो उसकी मुसीबत के समय उसका साथ दे सके। रूस के साथ भारत के प्रारम्भ से ही मित्रवत सम्बन्ध हैं और कई बार वक्त जरूरत पर वह भारत की साख बचा भी चुका है। इसलिए वह भारत पर भरोसा करके उससे बराबरी की दोस्ती की कोशिश कर रहा है। अब तक भारत को अपने से निचले स्तर की शक्ति समझ कर व्यवहार करने वाला रूस मोदी की सशक्तिकरण नीति के चलते सशक्त हुआ है और आज वही रूस कई प्रकरणों में झुक कर भारत से प्रगाढ़ सम्बन्धों के प्रयास कर रहा है। यह भारत के लिए एक बहुत सुविधाजनक और सुखद स्थिति है जिसका लाभ भारत जरुर उठाना चाहेगा।

अंत में अमेरिका। इसमें कोई शक नहीं है कि आज भी अमेरिका विश्व की सर्वोच्च महाशक्ति है किन्तु कई निर्णय सही न लेने और ट्रम्प की मुखर अनर्गल वाचालता और अपने धमकी भरे अंदाजों से अमेरिका को कई बार सांसत में डाल चुके हैं, इसके अतिरिक्त अमेरिका मुक्त हस्त अनुदान बांटने और पानी की तरह पैसा बहा कर जासूसी कराने की नीति के चलते आर्थिक संकट के दौर से भी गुजर रहा है। इस समय उसे एक बड़े बाजार और एक सशक्त भरोसेमंद मित्र की नितांत आवश्यकता है और इस समय उसे मोदी के नेतृत्व में प्रगति के शिखरों को लांघता भारत ही संकटमोचक लग रहा है। इसलिए वह रूस और चीन के आकर्षण से निकाल कर अपने पक्ष में करने का जी तोड़ प्रयास कर रहा है। अपने संकटों से निकल कर दूसरे देशों के संकटमोचक स्वरूप को पाने में मोदी ने कितना पसीना बहाया होगा, इसकी केवल कल्पना ही की जा सकती है।

कुल मिला कर इस समय भारत अपनी कूटनीति के शिखर के सन्निकट है और बहुत जल्दी वह शीर्ष आयामों को भी छुएगा और यह सब सम्भव हुआ है मोदी के राष्ट्र के प्रति अटूट समर्पण भाव और राष्ट्रभक्ति के चलते। हमें विश्वास करना चाहिए कि मोदी देश को पहले 'बैलेंसिंग पावर' और फिर विश्व का अगुआ बनने में कदम दर कदम आगे लेजा रहे हैं और बहुत जल्दी ही उनकी सफल कूटनीति के और सुखद परिणाम सामने आने वाले हैं।

- राज सक्सेना

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