राजनीति: महागठबंधन की कवायद: बहुत कठिन है डगर पनघट की

राजनीति: महागठबंधन की कवायद: बहुत कठिन है डगर पनघट की

कर्नाटक के विधान सभा चुनाव के नतीजों के साथ शरू हुए नाटक का पटाक्षेप के बाद जब कांग्रेस के समर्थन से कुमार स्वामी की सरकार बनी तब विपक्षी एकता का नजारा देखते ही बनता था। शायद ऐसा पहली बार हो रहा था किसी मुख्यमंत्री के शपथ ग्रहण समारोह में विपक्ष के तकरीबन सभी नेता एक ही मंच पर मौजूद थे। हालांकि कांग्रेस ने भी इससे पहले सभी विपक्षी दलों को रात्रि भोज पर आमंत्रण देकर राजग के खिलाफ एक साथ लाने की कोशिश की थी लेकिन जो कुमारस्वामी के शपथ ग्रहण समारोह में हुआ, वह ऐतिहासिक था। ऐतिहासिक इसलिए भी था क्योंकि इसमें क्षेत्रीय स्तर पर एक दूसरे के कट्टर विरोधी विपक्षी दलों के नेता भी प्रसन्न चित मुद्रा में एक साथ मंच साझा कर रहे थे।

बिहार उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में हुए कुछ उपचुनाव में राजग की करारी हार इस बात का संकेत भी है कि अगर सभी विपक्षी दल साथ आ गए तो राजग के लिए न सिर्फ आने वाले पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव अपितु 2019 के लोक सभा चुनाव की फतह भी बेहद मुश्किल होगी लेकिन विपक्षी दलों की एकता और महागठबंधन बनाने की कवायद के रास्ते में सबसे बड़ी मुश्किल यह है कि कांग्रेस को छोड़ कर कोई भी ऐसा राजनीतिक दल विपक्ष के साथ नहीं है जिसका जनाधार कमोबेश देश के सभी राज्यों में हो लेकिन कांग्रेस की दशा भी आज की हालत में वैसी नहीं है कि वो अपने दम पर सभी राज्यों में अकेले जीत दर्ज कर सके। राष्ट्रीय स्तर पर उसके कैडर वोटरों का प्रतिशत गिरा है इसलिए अधिकतर राज्यों में कांग्रेस को अपनी उपस्थिति बचाए रखने हेतु अन्य क्षेत्रीय दलों की बैसाखी की जरूरत है।

लेकिन अन्य क्षेत्रीय दलों की भी अपनी सीमाएं हैं। गौरतलब यह है कि ये सभी दल किसी न किसी जातिगत, धार्मिक या अन्य समीकरण के बदौलत अपना जनाधार और पहचान बना पाए हैं। ऐसे में कोई भी क्षेत्रीय दल जब महागठबंधन का हिस्सा होने की कोशिश करेगा तो उसके सामने दो चुनौती होगी। एक तो महागठबंधन का हिस्सा होते हुए भी अपनी अलग पहचान कैसे बना कर रखनी है ? दूसरे, दो विपक्षी दल जो क्षेत्रीय स्तर पर एक दूसरे के धुर विरोधी है , महागठबंधन में साथ रहकर भी एक दूसरे से कैसे दूरी बना कर रखेंगे, यह बड़ी चुनौती होगी। ऐसे में महागठबंधन के प्रधानमंत्री का चेहरा कौन होगा। यह तो एक बड़ा सवाल है ही जो राजग सरकार के लोग अक्सर पूछते रहते हैं लेकिन उससे भी बड़ी मुश्किल होगी सीटों का बंटवारा और क्षेत्रीय स्तर पर धुर विरोधी दलों का एक साथ एक ही मंच पर आना।

उत्तर प्रदेश देश का बङ़ा राज्य है और शायद इसीलिए ही कहते हैं कि दिल्ली की सत्ता तक पहुँचने का रास्ता यहीं से शुरू होता है। उत्तर प्रदेश की दो प्रमुख विपक्षी पार्टी सपा और बसपा क्षेत्रीय स्तर पर एक दूसरे के धुर विरोधी रहे हैं। सपा जहाँ अपने जातिगत यादव, मुस्लिम और दलित समीकरण के कारण कई बार उत्तर प्रदेश की सत्ता में रही है तो कई बार मुख्य विपक्षी दल की भूमिका में भी रही है जैसे आज है। वहीं बसपा को भी अपनी दलित राजनीति और समीकरण के बदौलत सत्ता में रहने का मौका मिला है लेकिन आज की तारीख में बसपा उत्तर प्रदेश में विपक्षी दल के तौर पर दूसरे नम्बर पर दिखती है। वहीं कांग्रेस की हालत ऐसी है कि उसे यह भी संदेश देना है कि कांग्रेस राष्ट्रीय स्तर की पार्टी है और उसकी ताकत उत्तर प्रदेश में इन क्षेत्रीय दलों से ज्यादा नहीं तो कम भी नहीं है , साथ इन्हीं क्षेत्रीय दलों से मिलकर कांग्रेस को अपनी साख भी बचानी है।

ऐसी विषम परिस्थिति और अंतद्र्वंद्व के बीच सिर्फ प्रधानमंत्री की कुर्सी की दावेदारी ही नहीं अपितु सभी विपक्षी दलों को एक मंच पर आकर सीटों का बटवारा आसानी से कर लेना भी बेहद मुश्किल होगा। शायद यही कारण रहा कि विगत दिनों बसपा प्रमुख मायावती ने आने वाले छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश और राजस्थान के विधानसभा चुनाव में न सिर्फ कांग्रेस से तालमेल से इंकार कर दिया अपितु कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह पर बीजेपी का एजेंट होने का गंभीर आरोप लगाते हुए तल्ख टिप्पणी की जिसने महागठबंधन की कवायद को गहरा झटका लगा है।

लोक सभा चुनाव की दृष्टि से जो दूसरा महत्त्वपूर्ण राज्य है वो है बिहार जो लोकसभा चुनाव में दिल्ली की सत्ता पर कौन काबिज होगा, इसकी दिशा तय करता है। सर्वज्ञात है कि बिहार की चुनावी रणनीति जातिगत आधार पर लिखी जाती है। शायद यहीं कारण रहा कि माई समीकरण ( मुसलमान और यादव) और दलित समीकरण के बदौलत राजद लगातार 15 वर्षों तक सत्ता पर काबिज रही और ठीक वैसे ही नीतिश कुमार राजग से हाथ मिला सवर्ण और पिछङी जाति के मतों के समीकरण के दम पर सत्ता में बने रहे। इसी समीकरण के कारण राजद और उसके साथी दलों को 2014 के लोकसभा चुनाव में भारी हार का सामना करना पड़ा और इसी जातिगत समीकरण का जादू रहा कि जब नीतीश कुमार राजद से हाथ मिला राजग के विरोध में हुए तो राजग को भी बिहार विधानसभा चुनाव में हार का सामना करना पड़ा लेकिन नीतीश कुमार के वापस राजग के साथ आ जाने से तथा राम बिलास पासवान और उपेन्द्रनाथ कुशवाहा जैसे नेताओं के साथ के बाद बिहार लोकसभा चुनाव में राजग को हराना मुश्किल होगा। ऐसी हालत में जब नीतीश राजग के साथ हैं, महागठबंधन की कवायद से राजद को बहुत फायदा नहीं होगा क्योंकि आम तौर पर कांग्रेस को मिलने वाला मुसलमान वोट जो जीत में उत्प्रेरक का काम करता है। हमेशा से बिहार में राजद को ही मिलता रहा है। भाजपा, जेडीयू , राजद और कांग्रेस के अलावा किसी भी दूसरे दल का कोई केडर वोट बिहार में नहीं है। ऐसी हालत में अगर महागठबंधन हुआ तो सीटों का बंटवारा कैसे होगा, यह बड़ा सवाल है?

पश्चिम बंगाल में आज की तारीख में भी संगठनात्मक स्तर पर टी एम सी की हालत बेहद मजबूत है। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी विपक्ष की पहली ऐसी नेत्री है जिन्होंने खुलकर खुद को प्रधानमंत्री के दावेदार के तौर पर पेश करने की कोशिश की है और शायद यही कारण है कि बी जे पी के किसी भी कदम के विरोध में वो एकदम मुखर दिखती हैं लेकिन टी एम सी की भी क्षेत्रीय स्तर पर अपनी सीमाएं हैं। तकरीबन 35 साल तक सत्ता में रहे वामपंथी दल भी अगर महागठबंधन का हिस्सा होते हैं तो उनके लिए साथ मिलकर चुनाव लडऩा बेहद मुश्किल होगा। वहीं कांग्रेस जिसका जनाधार बेहद कम है, उससे सीटों का बटवारा कैसे हो, यह पश्चिम बंगाल में भी एक बङा प्रश्न है। जहां कांग्रेस राहुल गांधी को महागठबंधन का नेता बनाना चाहती है वहीं ममता बनर्जी की भी अपनी महत्त्वाकांक्षा है और धुर विरोधी वामपंथी दल के साथ सामंजस्य बैठाते हुए महागठबंधन का पश्चिम बंगाल में भी आकार लेना मुश्किल ही प्रतीत होता है।

दिल्ली के मुख्यमंत्री तथा नरेन्द्र मोदी के भौगोलिक स्तर पर निकटतम विरोधी अरविंद केजरीवाल भी कांग्रेस के विरोध के बाद ही सत्ता में आए है। हालांकि अरविंद केजरीवाल भी कुमार स्वामी के सपथ ग्रहण पर विपक्षी एकता और महागठबंधन का दम भरते जरूर उपस्थित थे लेकिन उनके लिए भी कांग्रेस के साथ महागठबंधन का हिस्सा होना मुश्किल होगा।

कर्नाटक में भी जहाँ इस महागठबंधन की बुनियाद पड़ती दिख रही थी। कुमार स्वामी सार्वजनिक रूप से भी यह बयान देने से गुरेज नहीं करते कि वे कांग्रेस की मदद से सरकार चला तो रहें हैं लेकिन असहजता की स्थिति है। ऐसे में यह गठबंधन लोकसभा चुनाव तक महागठबंधन में तब्दील हो पाएगा, ऐसा प्रतीत नहीं होता है।

उपरोक्त सभी ऐसे राज्य हैं जो लोकसभा चुनाव में दिल्ली की सत्ता का रास्ता प्रशस्त करते हैं लेकिन अगर महागठबंधन की कवायद इन राज्यों में ही असफल रही तो कहने में कोई अतिशयोक्ति नहीं कि विपक्ष के लिए बहुत कठिन है डगर पनघट की।

-अमित कुमार अम्बष्ट आमिली

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